पटना। बांग्लादेश के साथ फरक्का जल संधि को लेकर बिहार की राजनीति गरमा गई है। संधि के नवीनीकरण के मुद्दे पर जनता दल यूनाइटेड और राष्ट्रीय जनता दल आमने-सामने आ गए हैं। जदयू ने मौजूदा स्वरूप में संधि के नवीनीकरण का विरोध करते हुए इसे बिहार और देश के हितों के खिलाफ बताया है। पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और उपमुख्यमंत्री विजय चौधरी लगातार इस मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहे हैं। वहीं जदयू के आरोपों के बाद राजद की ओर से पलटवार किए जाने से सियासी तकरार तेज हो गई है।

फरक्का जल संधि का मामला बिहार के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। गंगा के जल बंटवारे और फरक्का बैराज से नदी के प्रवाह पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर राज्य में समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। अब संधि के नवीनीकरण का विषय सामने आने के बाद जदयू ने इसे राजनीतिक और राज्यहित से जुड़े बड़े मुद्दे के रूप में उठाया है।

जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा लगातार इस विषय पर अपनी बात रख रहे हैं। उनका कहना है कि किसी भी नई व्यवस्था या संधि के नवीनीकरण से पहले बिहार के हितों और राज्य पर पड़ने वाले प्रभावों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पार्टी का तर्क है कि फरक्का से जुड़ी जल व्यवस्था का बिहार की नदियों और उनके आसपास रहने वाली बड़ी आबादी पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।

उपमुख्यमंत्री विजय चौधरी ने भी फरक्का जल संधि के नवीनीकरण को लेकर जदयू का पक्ष मजबूती से सामने रखा है। उनका कहना है कि बिहार से जुड़े हितों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। जदयू का मानना है कि संधि से संबंधित कोई भी निर्णय लेने से पहले बिहार की चिंताओं को सुना जाना और उनका समाधान किया जाना जरूरी है।

जदयू की तरफ से इस मुद्दे पर राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद को भी निशाने पर लिया गया है। पार्टी का आरोप है कि जब लालू प्रसाद सत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका में थे, उस समय फरक्का जल संधि को लेकर उन्होंने पर्याप्त विरोध नहीं किया और मौन रहे। जदयू अब सवाल उठा रहा है कि यदि संधि बिहार के हितों को प्रभावित करती थी तो उस समय राजद की ओर से इसे प्रमुखता से क्यों नहीं उठाया गया।

इसी आरोप के बाद राजद की ओर से पलटवार किया गया और दोनों दलों के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई। राजद ने जदयू के आरोपों को लेकर सवाल खड़े किए हैं। इसके बाद फरक्का जल संधि का मुद्दा केवल जल बंटवारे और नदी प्रबंधन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बिहार की सियासत में आरोप-प्रत्यारोप का नया विषय बन गया है।

फरक्का से जुड़ा मुद्दा बिहार में गंगा नदी के प्रवाह, गाद और बाढ़ जैसी समस्याओं के संदर्भ में भी उठता रहा है। राज्य में हर वर्ष बड़ी आबादी बाढ़ और नदी कटाव से प्रभावित होती है। यही कारण है कि गंगा और उसकी सहायक नदियों के प्रबंधन से जुड़े किसी भी बड़े फैसले का बिहार के लिए विशेष महत्व है।

जदयू का जोर इस बात पर है कि अंतरराष्ट्रीय जल समझौते में बिहार की परिस्थितियों और आवश्यकताओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। पार्टी नेताओं का कहना है कि फरक्का जल संधि के भविष्य को लेकर निर्णय लेते समय बिहार के हितों को केंद्र में रखा जाना चाहिए। इसके लिए राज्य की चिंताओं को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से रखने की आवश्यकता है।

भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा के पानी के बंटवारे से जुड़ा फरक्का समझौता दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। अंतरराष्ट्रीय जल समझौते होने के कारण इसके कूटनीतिक पहलू भी हैं। इसलिए संधि के नवीनीकरण या उसमें किसी बदलाव का निर्णय केवल राज्य स्तर पर नहीं, बल्कि केंद्र सरकार और बांग्लादेश के बीच बातचीत तथा व्यापक विचार-विमर्श के आधार पर होगा।

हालांकि बिहार की तरफ से उठ रही आपत्तियां इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण राजनीतिक और नीतिगत मुद्दा बन सकती हैं। जदयू की कोशिश है कि संधि से संबंधित बातचीत में बिहार की चिंताओं को पर्याप्त महत्व मिले। संजय झा और विजय चौधरी के लगातार बयान देने से यह स्पष्ट है कि पार्टी आने वाले दिनों में भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाती रहेगी।

दूसरी ओर राजद के पलटवार से यह मुद्दा बिहार की सत्ता और विपक्ष के बीच नई राजनीतिक लड़ाई का आधार बन गया है। दोनों दल अब एक-दूसरे के पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड और फरक्का के मुद्दे पर अपनाए गए रुख को लेकर सवाल उठा रहे हैं। इससे आने वाले दिनों में बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।

फरक्का जल संधि पर पैदा हुई राजनीतिक बहस के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न बिहार के हितों का है। यदि संधि के नवीनीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो बिहार सरकार और राज्य के राजनीतिक दल इस पर अपना पक्ष केंद्र के सामने रख सकते हैं। नदी के प्रवाह, बाढ़, कटाव और गाद से जुड़ी समस्याओं को लेकर भी बिहार अपनी चिंताएं सामने रख सकता है।

जदयू ने फिलहाल साफ कर दिया है कि वह मौजूदा परिस्थितियों में संधि के नवीनीकरण के पक्ष में नहीं है। पार्टी इसे बिहार और राष्ट्रीय हित से जोड़कर देख रही है। वहीं राजद की ओर से जवाबी हमला होने के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है।

फरक्का जल संधि का मुद्दा आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में और प्रमुखता हासिल कर सकता है। जदयू जहां इसे बिहार के अधिकार और हित से जोड़कर उठा रहा है, वहीं राजद सरकार और जदयू के रुख पर सवाल खड़े कर रहा है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि संधि के नवीनीकरण को लेकर केंद्र सरकार क्या रुख अपनाती है और बिहार की आपत्तियों तथा सुझावों को बातचीत में कितना महत्व मिलता है।

Tags: