शिवहर: बिहार के शिवहर जिले में विकास योजनाओं को लेकर एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। सड़क, पुल और अस्पताल के बाद अब सामुदायिक भवन के निर्माण पर सवाल खड़े हो गए हैं। सरकारी रिकॉर्ड में जिस जगह सामुदायिक भवन का निर्माण दिखाया गया है, वहां मौके पर जमीन तो मौजूद है, लेकिन भवन दिखाई नहीं दे रहा है। मामला डुमरी कटसरी प्रखंड के उमेद छपरा गांव का है।
बताया जा रहा है कि गांव में करीब 10 लाख रुपये की लागत से सामुदायिक भवन का निर्माण कराया जाना था। सरकारी फाइलों में निर्माण के नाम पर राशि की निकासी भी हो चुकी है। लेकिन जब ग्रामीणों की शिकायत के बाद स्थल की जांच की गई तो वहां भवन नहीं मिला। अब इस मामले में सरकारी राशि के कथित गबन और निर्माण कार्य से जुड़े रिकॉर्ड की जांच की जा रही है।
जनता दरबार में पहुंची शिकायत
सामुदायिक भवन के गायब होने का मामला तब सामने आया जब इस संबंध में शिकायत जिलाधिकारी के जनता दरबार में पहुंची। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उमेद छपरा गांव में सामुदायिक भवन के निर्माण के लिए सरकारी राशि खर्च दिखाई गई है, लेकिन मौके पर भवन मौजूद नहीं है।
शिकायत मिलने के बाद प्रशासनिक स्तर पर मामले की जांच शुरू कराई गई। संबंधित अधिकारियों से निर्माण स्थल और सरकारी रिकॉर्ड की जानकारी मांगी गई। इसके बाद डुमरी कटसरी के प्रखंड विकास पदाधिकारी यानी बीडीओ ने मामले की जांच की।
जांच में सामने आया राशि गबन का मामला
डुमरी कटसरी बीडीओ की जांच रिपोर्ट में भवन निर्माण के नाम पर सरकारी राशि के गबन की बात सामने आने का दावा किया गया है। जांच के दौरान मौके पर भवन नहीं मिलने और सरकारी रिकॉर्ड में निर्माण के लिए राशि खर्च होने के बीच अंतर पाया गया।
अगर सरकारी रिकॉर्ड में किसी निर्माण कार्य को पूरा दिखाया गया हो और स्थल पर वह निर्माण मौजूद न हो तो यह गंभीर प्रशासनिक मामला बन जाता है। ऐसे में निर्माण की स्वीकृति से लेकर राशि की निकासी और भुगतान तक सभी स्तरों के रिकॉर्ड की जांच जरूरी हो जाती है।
फिलहाल मामले में संबंधित दस्तावेजों और अधिकारियों की रिपोर्ट का मिलान किया जा रहा है।
सरकारी रिकॉर्ड में निर्माण का दावा
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण से जुड़े अभियंता ने अपनी रिपोर्ट में सामुदायिक भवन के निर्माण की बात कही है।
यानी एक तरफ बीडीओ की जांच में भवन मौके पर नहीं मिलने और निर्माण के नाम पर राशि के कथित गबन की बात सामने आई है, वहीं अभियंता की रिपोर्ट में भवन निर्माण होने का उल्लेख किया गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि भवन वास्तव में बनाया गया था तो वह कहां है। सरकारी रिकॉर्ड में जिस स्थान पर भवन निर्माण बताया गया है, वहां मौके पर खाली जमीन क्यों मिली? यही सवाल इस मामले की जांच का मुख्य बिंदु बन गया है।
करीब 10 लाख रुपये की लागत
बताया गया है कि सामुदायिक भवन के निर्माण पर करीब 10 लाख रुपये खर्च किए जाने थे। सरकारी फाइलों में इस निर्माण से जुड़ी राशि की निकासी भी हो चुकी है।
ऐसे में अब यह पता लगाने की जरूरत है कि राशि किस खाते या किस प्रक्रिया के तहत जारी हुई, निर्माण कार्य के लिए किस एजेंसी या विभाग की जिम्मेदारी थी और भुगतान से पहले निर्माण की भौतिक जांच किस स्तर पर की गई थी।
यदि बिना निर्माण के राशि जारी या निकाली गई है तो जिम्मेदारी तय करने के लिए भुगतान से जुड़े सभी दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण होगी।
खाली जमीन ने खड़े किए सवाल
शिकायत के बाद जब मौके की स्थिति देखी गई तो वहां सामुदायिक भवन दिखाई नहीं दिया। जिस स्थान पर सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार निर्माण होना बताया जा रहा है, वहां जमीन खाली होने की बात सामने आई है।
ग्रामीणों के लिए भी यह सवाल महत्वपूर्ण है कि यदि भवन बना था तो वह कहां गया। किसी स्थायी भवन का पूरी तरह गायब हो जाना सामान्य स्थिति नहीं हो सकती। ऐसे में प्रशासन के सामने निर्माण की वास्तविकता और रिकॉर्ड में दर्ज दावों की जांच करना चुनौती है।
ग्रामीणों को मिलना था सामुदायिक भवन का लाभ
सामुदायिक भवन जैसी योजनाओं का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय लोगों के लिए सार्वजनिक उपयोग की सुविधा उपलब्ध कराना होता है। गांव में सामाजिक, सामुदायिक और अन्य सार्वजनिक गतिविधियों के लिए ऐसे भवनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
यदि योजना के तहत भवन का निर्माण नहीं हुआ है तो ग्रामीणों को उस सुविधा का लाभ नहीं मिल पाया। साथ ही सरकारी राशि खर्च होने के बावजूद सार्वजनिक संपत्ति का निर्माण नहीं होने का मामला भी सामने आता है।
निर्माण से जुड़े रिकॉर्ड की जांच जरूरी
अब जांच में यह देखा जाना जरूरी है कि भवन के निर्माण से संबंधित कौन-कौन से दस्तावेज उपलब्ध हैं। इसमें प्रशासनिक स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, कार्यादेश, माप पुस्तिका, बिल, भुगतान संबंधी रिकॉर्ड और निर्माण की तस्वीरें या अन्य प्रमाण शामिल हो सकते हैं।
यदि निर्माण पूरा होने का दावा किया गया है तो उसकी भौतिक सत्यापन रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण होगी। मौके पर भवन नहीं मिलने की स्थिति में इन दस्तावेजों का आपस में मिलान करके वास्तविक स्थिति सामने लाई जा सकती है।
अभियंता की रिपोर्ट से बढ़ा पेच
अभियंता की रिपोर्ट में भवन निर्माण की बात कही गई है, जबकि बीडीओ की जांच में मौके पर भवन नहीं मिलने और कथित गबन की पुष्टि का दावा किया गया है। दोनों रिपोर्टों के बीच यह अंतर जांच को और महत्वपूर्ण बना देता है।
अब यह स्पष्ट करना होगा कि अभियंता ने किस आधार पर भवन निर्माण की पुष्टि की। क्या उन्होंने स्थल का निरीक्षण किया था, निर्माण की तस्वीरें देखी थीं या विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गई थी।
इसी तरह बीडीओ की जांच में किन तथ्यों के आधार पर गबन की पुष्टि की गई, इसे भी रिकॉर्ड के आधार पर स्पष्ट करना होगा।
जिम्मेदारी तय होने की उम्मीद
मामला सामने आने के बाद अब प्रशासनिक स्तर पर जिम्मेदारी तय किए जाने की उम्मीद है। यदि जांच में सरकारी राशि की अनियमित निकासी या बिना निर्माण भुगतान की पुष्टि होती है तो संबंधित अधिकारियों और अन्य जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।
हालांकि अंतिम कार्रवाई जांच के निष्कर्ष और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही तय होगी।
सबसे बड़ा सवाल भवन कहां है?
शिवहर के उमेद छपरा गांव में सामुदायिक भवन से जुड़े इस मामले ने सरकारी योजनाओं की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। करीब 10 लाख रुपये की लागत वाले भवन का रिकॉर्ड में निर्माण होना और मौके पर उसका नहीं मिलना जांच का गंभीर विषय है।
एक ओर बीडीओ की जांच में निर्माण के नाम पर कथित गबन की बात सामने आई है, दूसरी ओर अभियंता की रिपोर्ट में भवन निर्माण का उल्लेख है। अब जांच एजेंसियों के सामने सबसे अहम सवाल यही है कि आखिर वह सामुदायिक भवन कहां है, जिसके निर्माण के नाम पर सरकारी राशि खर्च की गई।
पूरे मामले की वास्तविक स्थिति संबंधित दस्तावेजों, स्थल सत्यापन और जांच के अंतिम निष्कर्ष के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।