पटना। मानव तस्करी और बच्चों की गुमशुदगी के मामले में बिहार के 18 जिलों को सर्वाधिक संवेदनशील और उच्च जोखिम यानी हाई रिस्क श्रेणी में चिह्नित किया गया है। राजधानी पटना सहित इन जिलों में बच्चों की गुमशुदगी और मानव तस्करी की घटनाओं को लेकर विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत बताई गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, बिहार मानव तस्करी के मामले में केवल एक क्षेत्र के रूप में प्रभावित नहीं है, बल्कि राज्य सोर्स, डेस्टिनेशन और ट्रांजिट, तीनों स्तरों पर भूमिका में सामने आया है।
शनिवार को पटना के ज्ञान भवन में गुमशुदा बच्चों एवं मानव तस्करी के विषय पर आयोजित एक दिवसीय पूर्वी क्षेत्रीय सम्मेलन में मानव तस्करी की गंभीर स्थिति को लेकर कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखे गए। सम्मेलन में विशेषज्ञों और संबंधित अधिकारियों ने मानव तस्करी तथा बच्चों की गुमशुदगी रोकने के लिए राज्यों के बीच बेहतर समन्वय और संयुक्त कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया।
18 जिले हाई रिस्क श्रेणी में
सम्मेलन में बताया गया कि बिहार के 18 जिलों को मानव तस्करी और बच्चों की गुमशुदगी के दृष्टिकोण से सर्वाधिक संवेदनशील माना गया है। इनमें राजधानी पटना भी शामिल है। इन जिलों में बच्चों के गायब होने, उन्हें बहला-फुसलाकर दूसरे स्थानों पर ले जाने तथा संगठित रूप से मानव तस्करी किए जाने की आशंका को देखते हुए निगरानी और रोकथाम के उपायों को मजबूत करने पर जोर दिया गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों की गुमशुदगी और मानव तस्करी कई बार एक-दूसरे से जुड़ी हुई घटनाएं होती हैं। इसलिए केवल गुमशुदगी की शिकायत दर्ज करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रत्येक मामले की तस्करी के संभावित कोण से भी जांच किए जाने की जरूरत है। इसके लिए पुलिस, प्रशासन, बाल संरक्षण संस्थाओं और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।
तीनों स्तरों पर प्रभावित है बिहार
मानव तस्करी के मामले में बिहार की स्थिति इसलिए भी चिंताजनक बताई गई क्योंकि राज्य तीन अलग-अलग भूमिकाओं में प्रभावित है। बिहार से लोगों और बच्चों को दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है, जिससे यह सोर्स स्टेट के रूप में सामने आता है। वहीं दूसरे राज्यों से पीड़ितों को बिहार लाए जाने के मामले भी सामने आए हैं, जिससे राज्य डेस्टिनेशन के रूप में भी प्रभावित है।
इसके अलावा बिहार का इस्तेमाल एक राज्य से दूसरे राज्य तक पीड़ितों को पहुंचाने के लिए ट्रांजिट रूट के तौर पर भी किया जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इन तीनों पहलुओं को ध्यान में रखकर ही मानव तस्करी के खिलाफ रणनीति तैयार करने की आवश्यकता है।
कई राज्यों और नेपाल से जुड़े मामले
सम्मेलन में बताया गया कि बिहार में असम, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और नेपाल से पीड़ितों की तस्करी के मामले चिन्हित किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि मानव तस्करी का नेटवर्क केवल राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार दूसरे राज्यों और पड़ोसी देश नेपाल तक जुड़े हुए हैं।
इसी तरह बिहार से महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओडिशा तक मानव तस्करी के मामले सामने आए हैं। इस तरह बिहार से दूसरे राज्यों तक पीड़ितों की आवाजाही के कई रूट सामने आए हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि मानव तस्करी के ऐसे मामलों में कार्रवाई के लिए राज्यों की पुलिस और संबंधित विभागों के बीच तत्काल सूचना साझा करना बेहद जरूरी है। एक राज्य में दर्ज शिकायत से जुड़े व्यक्ति या बच्चे के दूसरे राज्य में होने की स्थिति में स्थानीय एजेंसियों को तेजी से जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
अंतरराज्यीय समन्वय पर जोर
सम्मेलन में मानव तस्करी के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई के लिए अंतरराज्यीय समन्वय को सबसे महत्वपूर्ण उपायों में से एक बताया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि तस्करी का नेटवर्क राज्यों की सीमाओं को पार करता है, इसलिए कार्रवाई भी राज्यों की सीमाओं से आगे बढ़कर समन्वित तरीके से करनी होगी।
गुमशुदा बच्चों की तलाश में भी इसी तरह की व्यवस्था की आवश्यकता बताई गई। यदि किसी बच्चे के दूसरे राज्य में पहुंचने की आशंका है तो संबंधित राज्य की पुलिस और बाल संरक्षण एजेंसियों के साथ तत्काल संपर्क स्थापित किया जाना चाहिए। इससे बच्चे की बरामदगी की संभावना बढ़ सकती है।
समेकित कार्रवाई की जरूरत
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने मानव तस्करी के मामलों में केवल पुलिस कार्रवाई पर निर्भर रहने के बजाय समेकित रणनीति अपनाने की आवश्यकता बताई। इसमें पुलिस, प्रशासन, बाल संरक्षण इकाइयों, सामाजिक संगठनों और अन्य संबंधित संस्थाओं की संयुक्त भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों को तस्करी से बचाने के लिए रोकथाम, पहचान, बचाव, पुनर्वास और पुनर्वास के बाद निगरानी की पूरी प्रक्रिया को मजबूत करना जरूरी है। साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाने और परिवारों को बच्चों की सुरक्षा को लेकर जानकारी देने पर भी ध्यान देना होगा।
बढ़ती चुनौती के बीच सतर्कता जरूरी
ज्ञान भवन में आयोजित पूर्वी क्षेत्रीय सम्मेलन में सामने आए आंकड़ों और तथ्यों ने बिहार में मानव तस्करी तथा बच्चों की गुमशुदगी की चुनौती को गंभीरता से रेखांकित किया। 18 जिलों का हाई रिस्क श्रेणी में होना और बिहार का सोर्स, डेस्टिनेशन तथा ट्रांजिट तीनों रूपों में प्रभावित होना राज्य के लिए बड़ी चिंता का विषय है।
विशेषज्ञों ने इस चुनौती से निपटने के लिए राज्यों के बीच लगातार सूचना का आदान-प्रदान, संयुक्त अभियान, त्वरित कार्रवाई और पीड़ितों के पुनर्वास पर जोर दिया। सम्मेलन में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि मानव तस्करी जैसे अपराध से निपटने के लिए किसी एक राज्य या एक विभाग की कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए प्रभावी अंतरराज्यीय समन्वय और समेकित कार्रवाई को मजबूत करना जरूरी है।