गुवाहाटी। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने शनिवार को राज्य में रहने वाले उन लोगों से विशेष अपील की, जो देश के दूसरे हिस्सों से आकर असम में बसे हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि जनगणना डेटा संग्रह प्रक्रिया के दौरान ऐसे लोग अपनी मातृभाषा के रूप में ‘असमिया’ को दर्ज करें। उन्होंने कहा कि असम को अपना घर बनाने वाले लोगों को राज्य की भाषा और संस्कृति से जुड़ाव दिखाना चाहिए।
मुख्यमंत्री की यह अपील ऐसे समय में आई है, जब राज्य में असमिया भाषा बोलने वालों की संख्या को लेकर चिंता जताई जा रही है। पिछली जनगणना प्रक्रिया के दौरान सामने आए आंकड़ों के बाद कई वर्गों में यह आशंका व्यक्त की गई थी कि राज्य में असमिया भाषी आबादी के अनुपात में कमी आ रही है।
हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि असम केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि यहां की भाषा, संस्कृति और परंपराएं इसकी पहचान हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग लंबे समय से असम में रह रहे हैं और राज्य को अपना घर मानते हैं, उन्हें असमिया भाषा को अपनाने में गर्व महसूस करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भाषा किसी समुदाय को जोड़ने का माध्यम होती है। असम में रहने वाले विभिन्न समुदायों के बीच आपसी संबंध और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने के लिए असमिया भाषा की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे जनगणना के दौरान अपनी भाषाई पहचान को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएं।
हालांकि मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि बराक घाटी क्षेत्र के लोगों पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं होगी। बराक घाटी में बड़ी संख्या में बंगाली भाषी लोग रहते हैं और वहां बंगाली भाषा का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय परिस्थितियों और स्थानीय भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि असम की विविधता उसकी ताकत है। राज्य में अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों के लोग रहते हैं और सभी का अपना महत्व है। उन्होंने कहा कि सरकार सभी समुदायों की पहचान और अधिकारों का सम्मान करती है।
उन्होंने कहा कि असमिया भाषा को बढ़ावा देना किसी अन्य भाषा के विरोध में नहीं है। यह राज्य की मूल सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि असम में रहने वाले सभी लोगों को राज्य की भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मान रखना चाहिए।
मुख्यमंत्री की इस अपील को राज्य की भाषाई पहचान से जोड़कर देखा जा रहा है। असम में भाषा का मुद्दा लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक चर्चा का विषय रहा है। असमिया भाषा और संस्कृति की सुरक्षा को लेकर कई संगठन भी समय-समय पर अपनी चिंताएं व्यक्त करते रहे हैं।
जनगणना के दौरान भाषा से जुड़े आंकड़े देश की भाषाई स्थिति को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर विभिन्न भाषाओं के इस्तेमाल और बोलने वालों की संख्या का आकलन किया जाता है। इसलिए भाषा के चयन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक महत्व भी जुड़ा होता है।
हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि असम में रहने वाले लोगों को राज्य की पहचान से जुड़ने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि भाषा अपनाने से लोगों के बीच जुड़ाव और मजबूत होगा। उन्होंने राज्य के विकास और सामाजिक एकता के लिए सभी समुदायों से सहयोग की अपील की।
मुख्यमंत्री के बयान के बाद राज्य में भाषाई पहचान को लेकर चर्चा तेज हो गई है। समर्थकों का कहना है कि यह असमिया संस्कृति को संरक्षित करने की दिशा में कदम है, जबकि कुछ लोग इसे भाषा से जुड़े संवेदनशील मुद्दे के रूप में देख रहे हैं।
फिलहाल जनगणना प्रक्रिया के दौरान भाषा संबंधी आंकड़ों को लेकर तैयारियां जारी हैं। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि राज्य में भाषाई आंकड़ों में किस तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं।