गुवाहाटी: असम के गोलाघाट ज़िले के बोकाखाट में पाम-ऑयल की खेती को लेकर नया विवाद शुरू हो गया है। JEEPAL कृषक श्रमिक संघ का आरोप है कि स्थानीय लोगों की मंज़ूरी के बिना, नदी किनारे रहने वाले समुदायों द्वारा पारंपरिक रूप से चरागाह के तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली ज़मीन को कमर्शियल पाम-ऑयल प्लांटेशन के लिए लिया जा रहा है।
संगठन ने सीधे तौर पर कृषि मंत्री पीयूष हज़ारिका पर आरोप लगाया है कि राज्य सरकार की कृषि नीति के तहत इस इलाके में पाम-ऑयल की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे ब्रह्मपुत्र के 'चार-चापोरि' (नदी के बीच के द्वीप जैसे इलाके) में रहने वाले लोगों की पारंपरिक ज़मीन और आजीविका पर दबाव पड़ सकता है। यह विवाद बोकाखाट विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाले 'नंबर 1 बोकुली सापोरि' की सैकड़ों बीघा नदी-तटीय ज़मीन को लेकर है।
JEEPAL और स्थानीय निवासियों के अनुसार, इस ज़मीन का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से गाय और भैंस चराने के लिए किया जाता रहा है। संगठन का आरोप है कि शुरू में रबी की खेती की तैयारी की गई थी, लेकिन बाद में वहाँ पाम-ऑयल के पौधे लगा दिए गए।
रबी की फ़सल का वादा, पाम के पौधे लगाने का आरोप: JEEPAL नेता सोनेश्वर नरह ने आरोप लगाया है कि गोलाघाट ज़िला कृषि विभाग ने उस ज़मीन का पारंपरिक रूप से इस्तेमाल करने वाले लोगों को ठीक से सूचित किए बिना इलाके में दखल दिया। विभाग ने एक कृषि सहकारी समिति बनाने में मदद की, जिसमें शामिल लोगों का संगठन के अनुसार ज़मीन से कोई पारंपरिक जुड़ाव नहीं है।
'गुलुंग टेमेरा बहुमुखी कृषि समबाय ऋण समिति' नाम की इस सहकारी समिति ने 25 अगस्त को उस जगह पर बीज बोने का कार्यक्रम आयोजित किया। बताया जाता है कि इस मौके पर गोलाघाट ज़िला कृषि अधिकारी रंजन बरुआ और नाबार्ड (NABARD) के ज़िला विकास प्रबंधक भास्कर पाराशर मौजूद थे।
इस प्रोजेक्ट को रबी की फ़सलों - जैसे काला चना (उड़द), सरसों और तिल - से जुड़ा बताया गया था। लेकिन बाद में निवासियों ने आरोप लगाया कि उसी ज़मीन पर पाम-ऑयल के पौधे लगा दिए गए थे। इसके बाद स्थानीय निवासियों और सहकारी समिति के बीच खुला टकराव शुरू हो गया।
28 सितंबर को, JEEPAL और स्थानीय निवासियों ने चरागाह की ज़मीन को पाम-ऑयल की खेती में बदलने के कथित प्रयास का विरोध करते हुए उस जगह पर दिन भर का विरोध प्रदर्शन किया। 'किसने इजाज़त दी?' JEEPAL के मुख्य सलाहकार सोनेश्वर नरह ने सरकार के उस अधिकार पर सवाल उठाया है जिसके तहत वह नदी के किनारे की उस ज़मीन पर पाम-ऑयल की खेती को बढ़ावा दे रही है, जिसका इस्तेमाल पारंपरिक रूप से स्थानीय समुदाय करते आए हैं।
नरह ने पूछा कि कृषि मंत्री को स्थानीय मिसिंग समुदायों की नदी-तटीय ज़मीन पर पाम-ऑयल की खेती को बढ़ावा देने की मंज़ूरी किसने दी और क्या इसके लिए स्थानीय निवासियों की सहमति ली गई थी। उन्होंने कहा कि ऑयल-पाम की खेती से पर्यावरण और सामाजिक-आर्थिक नतीजों का सही आकलन किए बिना ज़मीन को व्यावसायिक हितों के लिए नहीं सौंपा जाना चाहिए।
JEEPAL ने यह भी चेतावनी दी है कि यह विवाद 'नंबर 1 बोकुली सपोरी' से आगे भी फैल सकता है, क्योंकि संगठन ने नदी के किनारे बसे कई ऐसे पड़ोसी इलाकों की पहचान की है जो बड़े चरागाह क्षेत्रों पर निर्भर हैं।
संगठन का कहना है कि इसका असर काज़ीरंगा नेशनल पार्क के आस-पास के इलाकों तक भी फैल सकता है। सरकार की पाम-ऑयल को बढ़ावा देने की नीति सवालों के घेरे में है। बोकुली सपोरी का विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब असम सरकार 'नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑइल्स–ऑयल पाम' (NMEO-OP) के तहत पाम-ऑयल की खेती के विस्तार पर ज़ोर दे रही है।
बयान के अनुसार, कृषि मंत्री पीयूष हज़ारिका ने सितंबर 2026 में मिशन की प्रगति की समीक्षा की और कृषि विभाग को पाम-ऑयल के बागान लगाने का काम तेज़ करने का निर्देश दिया। अब यह नीतिगत लक्ष्य ज़मीन के इस्तेमाल से जुड़े स्थानीय विवाद से टकरा रहा है।
JEEPAL का तर्क है कि नदी के किनारे चरागाहों पर निर्भर समुदायों के लिए मुद्दा सिर्फ़ यह नहीं है कि पाम-ऑयल से खेती की आय हो सकती है या नहीं। बल्कि मुद्दा यह है कि क्या मवेशियों और आजीविका की अन्य गतिविधियों के लिए पारंपरिक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली ज़मीन को बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के व्यावसायिक 'मोनोकल्चर' (एक ही तरह की फ़सल की खेती) के लिए हमेशा के लिए सौंपा जा सकता है।
JEEPAL के प्रवक्ता प्रोबिन पेगु ने आरोप लगाया कि सरकार किसानों की कृषि योग्य ज़मीन का इस्तेमाल व्यावसायिक खेती के लिए करने की कोशिश कर रही है, जिससे बड़े पूंजीपतियों को फ़ायदा होगा। उन्होंने मांग की कि हज़ारिका बोकुली सपोरी का दौरा करें और इलाके में पाम-ऑयल की खेती का और विस्तार करने से पहले जन-सुनवाई करें। पर्यावरण संबंधी चिंताएं भी इस विवाद में एक और पहलू जोड़ती हैं; यह विवाद ऑयल-पाम मोनोकल्चर के पारिस्थितिक नतीजों पर चल रही व्यापक वैज्ञानिक बहस के बीच भी सामने आया है। JEEPAL ने पूर्वोत्तर भारत से जुड़ी 2024 की एक समीक्षा का हवाला दिया, जिसमें ऑयल-पाम की खेती से पौधों की विविधता और जैव-विविधता पर संभावित असर को लेकर चिंता जताई गई थी। इसमें 'कंजर्वेशन बायोलॉजी' में प्रकाशित 2024 के एक मेटा-विश्लेषण का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें 29 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया था। इस विश्लेषण में पाया गया कि प्राथमिक वनों की तुलना में, बिना किनारे वाले बफ़र ज़ोन (riparian buffers) वाले ऑयल-पाम बागानों में औसतन 44% कम जल-धारा प्रजातियां (stream taxa) पाई गईं।
JEEPAL द्वारा बताए गए शोध में पानी की गुणवत्ता, आवास में बदलाव, खेती में इस्तेमाल होने वाले रसायनों और मिट्टी के कटाव से जुड़ी संभावित चिंताओं की ओर भी इशारा किया गया है। इसलिए, यह संगठन बड़े पैमाने पर ऑयल-पाम की खेती शुरू करने से पहले ज़मीन, पानी, जैव-विविधता और आजीविका पर इसके असर का वैज्ञानिक मूल्यांकन करने की मांग कर रहा है।
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