नई दिल्ली। गर्भावस्था के दौरान परिवार में आने वाले नए सदस्य को लेकर उत्सुकता होना स्वाभाविक है। कई लोग बच्चे के जन्म से पहले ही यह जानने की कोशिश करते हैं कि बेटा होगा या बेटी। इसी उत्सुकता के चलते समाज में कई तरह की मान्यताएं और पुराने तरीके प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक सबसे चर्चित मिथ है कि बच्चे की **हार्टबीट देखकर उसके लिंग का पता लगाया जा सकता है**।
कई लोगों का मानना है कि अगर गर्भ में पल रहे बच्चे की धड़कन 140 बीट प्रति मिनट से ज्यादा है तो बेटी होने की संभावना होती है, जबकि कम हार्टबीट को बेटा होने का संकेत माना जाता है। लेकिन डॉक्टरों और वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार यह सिर्फ एक पुरानी मान्यता है, इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
हार्टबीट और बच्चे के लिंग का कोई संबंध नहीं
डॉक्टरों का कहना है कि गर्भ में बच्चे की धड़कन कई कारणों से बदल सकती है। इसमें बच्चे की उम्र, गर्भावस्था का चरण, बच्चे की गतिविधि और मां की स्वास्थ्य स्थिति जैसी चीजें शामिल होती हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक लड़के और लड़कियों के भ्रूण की हार्टबीट में ऐसा कोई निश्चित अंतर नहीं पाया गया है, जिसके आधार पर बच्चे का लिंग बताया जा सके। शोध में भी यह सामने आया है कि भ्रूण की हृदय गति से बच्चे के लिंग का भरोसेमंद अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
140 बीट वाला दावा सिर्फ एक मिथ
गर्भावस्था से जुड़ी सबसे लोकप्रिय मान्यताओं में से एक है कि 140 बीपीएम से ऊपर की हार्टबीट का मतलब लड़की और इससे कम का मतलब लड़का होता है।
लेकिन डॉक्टर इस बात को पूरी तरह गलत बताते हैं। उनका कहना है कि सामान्य रूप से भ्रूण की हार्टबीट लगभग 110 से 160 बीट प्रति मिनट के बीच हो सकती है। यह बच्चे की गतिविधि और गर्भावस्था के समय के अनुसार बदलती रहती है।
अगर बच्चा जांच के समय ज्यादा सक्रिय है तो उसकी धड़कन तेज हो सकती है। वहीं आराम की स्थिति में हार्टबीट थोड़ी कम हो सकती है। इसका बच्चे के लिंग से कोई संबंध नहीं होता।
डॉक्टर क्यों करते हैं हार्टबीट की जांच?
गर्भावस्था में बच्चे की हार्टबीट की जांच बेहद महत्वपूर्ण होती है। लेकिन इसका उद्देश्य बच्चे का लिंग पता करना नहीं बल्कि उसकी सेहत और विकास की निगरानी करना होता है।
डॉक्टर हार्टबीट के जरिए यह देखते हैं कि गर्भ में बच्चा ठीक से विकसित हो रहा है या नहीं। अगर धड़कन में कोई असामान्यता दिखती है तो समय रहते इलाज और जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं।
सोशल मीडिया पर फैलती हैं ऐसी बातें
आजकल सोशल मीडिया और इंटरनेट पर गर्भावस्था से जुड़ी कई तरह की जानकारियां तेजी से फैलती हैं। इनमें से कुछ बातें पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित होती हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वे वैज्ञानिक रूप से सही हों।
बच्चे की चाल, पेट का आकार, मां की खाने की पसंद या हार्टबीट से बेटा-बेटी बताने जैसी बातें लंबे समय से चली आ रही हैं, लेकिन चिकित्सा विज्ञान इन्हें सही नहीं मानता।
बच्चे का लिंग कैसे निर्धारित होता है?
वैज्ञानिक रूप से बच्चे का लिंग गर्भधारण के समय ही निर्धारित हो जाता है। यह माता-पिता के गुणसूत्रों (क्रोमोसोम) पर निर्भर करता है।
हालांकि, भारत में भ्रूण के लिंग की जांच और उसकी जानकारी देना कानूनन प्रतिबंधित है। इसका उद्देश्य कन्या भ्रूण हत्या जैसी गंभीर सामाजिक समस्या को रोकना है।
गर्भवती महिलाओं को क्या ध्यान रखना चाहिए?
डॉक्टरों की सलाह है कि गर्भवती महिलाओं को ऐसी अफवाहों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। बच्चे के स्वास्थ्य के लिए नियमित जांच, संतुलित आहार, पर्याप्त आराम और डॉक्टर की सलाह का पालन करना ज्यादा जरूरी है।
गर्भावस्था के दौरान हर मां चाहती है कि उसका बच्चा स्वस्थ रहे। इसलिए बेटा या बेटी की चिंता करने के बजाय बच्चे की अच्छी सेहत पर ध्यान देना चाहिए।
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