अब हर ब्लड ग्रुप के मरीज को मिलेगी Kidney, वैज्ञानिकों ने बनाई यूनिवर्सल किडनी

Update: 2025-10-17 15:53 GMT
Lifestyle,लाइफस्टाइल : किडनी फेल्योर से जूझ रहे लाखों मरीजों के लिए एक क्रांतिकारी खुशखबरी है। अब मरीज के ब्लड ग्रुप की परवाह किए बिना किडनी ट्रांसप्लांट किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों ने पहली बार ‘यूनिवर्सल किडनी’ बनाने में सफलता हासिल की है, जो किसी भी ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति के शरीर में ट्रांसप्लांट की जा सकती है। इस ऐतिहासिक सफलता को मेडिकल साइंस में एक बड़ा ब्रेकथ्रू माना जा रहा है, जो ट्रांसप्लांट वेटिंग लिस्ट को छोटा करने और हज़ारों जानें बचाने में मदद कर सकता है।
क्या है 'यूनिवर्सल किडनी'?
‘यूनिवर्सल किडनी’ वह किडनी है जिसे वैज्ञानिकों ने ऐसे मॉडिफाई किया है कि उसमें ब्लड ग्रुप से जुड़ी कोई पहचान नहीं रहती। यानी, यह A, B, AB या O किसी भी ब्लड ग्रुप वाले मरीज के शरीर में फिट हो सकती है और शरीर उसे रिजेक्ट नहीं करेगा।
ब्रिटेन के कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने इस तकनीक को डेवेलप किया है। उन्होंने A टाइप ब्लड ग्रुप की डोनर किडनी को "एंज़ाइम थेरेपी" से ट्रीट करके उसमें मौजूद ब्लड ग्रुप की पहचान को हटा दिया। इस प्रक्रिया के बाद किडनी यूनिवर्सल बन गई — ठीक उसी तरह जैसे 'O-नेगेटिव' ब्लड को यूनिवर्सल डोनर माना जाता है।
ट्रांसप्लांट में ब्लड ग्रुप क्यों होता था बाधा?
किडनी ट्रांसप्लांट के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है — डोनर और मरीज के ब्लड ग्रुप का मैच होना। अगर ब्लड ग्रुप अलग हो तो शरीर उस ऑर्गन को ‘अजनबी’ मानकर रिजेक्ट कर देता है। यही कारण है कि लाखों मरीजों को सही डोनर नहीं मिल पाता और वे सालों वेटिंग लिस्ट में ही रह जाते हैं।
भारत में ही हर साल लाखों मरीज किडनी की बीमारी से जूझते हैं, लेकिन करीब 90% को समय पर डोनर नहीं मिल पाता। अब इस तकनीक के ज़रिए किसी भी ब्लड ग्रुप की किडनी को मॉडिफाई करके किसी भी मरीज में लगाया जा सकेगा, जिससे ट्रांसप्लांट की संभावना कई गुना बढ़ जाएगी।
कैसे की गई रिसर्च?
रिसर्च टीम ने सबसे पहले A ग्रुप की किडनी को विशेष एंज़ाइम के ज़रिए ट्रीट किया। यह एंज़ाइम किडनी की रक्तवाहिनियों (blood vessels) से A ब्लड ग्रुप के एंटीजन को हटा देता है। इसके बाद यह किडनी "O टाइप" की तरह व्यवहार करने लगती है, यानी किसी भी ब्लड ग्रुप से मेल खा सकती है।
इस प्रक्रिया को "normothermic perfusion machine" के जरिए अंजाम दिया गया — एक ऐसी मशीन जो किडनी को शरीर से बाहर भी ब्लड और ऑक्सीजन देकर ज़िंदा रखती है। इससे वैज्ञानिकों को एंज़ाइम थेरेपी को सफलतापूर्वक लागू करने का समय मिला।
आगे क्या?
फिलहाल यह रिसर्च लेबोरेटरी स्तर पर सफल हुई है। अब इसे क्लिनिकल ट्रायल्स में टेस्ट किया जाएगा — यानी इंसानों पर इसका ट्रांसप्लांट कर यह देखा जाएगा कि शरीर इसे कैसे स्वीकार करता है। रिसर्चर्स का अनुमान है कि अगले 5 सालों में यह तकनीक आम मरीजों के लिए उपलब्ध हो सकती है।
भारत के लिए क्यों है यह बड़ी उम्मीद?
भारत में हर साल लगभग 2 लाख लोग किडनी फेल्योर से पीड़ित होते हैं, लेकिन सिर्फ 6,000-7,000 लोगों को ही ट्रांसप्लांट मिल पाता है। डोनर की कमी और ब्लड ग्रुप न मिल पाने की वजह से यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।
‘यूनिवर्सल किडनी’ तकनीक के आने से यह फर्क कम होगा। इससे डोनर-पेशेंट मैचिंग की बाधा खत्म होगी और ज्यादा लोगों की जान बचाई जा सकेगी।
मेडिकल साइंस में यह खोज एक नई उम्मीद की किरण है। अब ब्लड ग्रुप जैसी सीमाएं पीछे छूट रही हैं और हर मरीज को जीवनदान मिलने की संभावना पहले से कहीं अधिक हो गई है। ‘यूनिवर्सल किडनी’ एक ऐसा कदम है, जो भविष्य में अंगदान और ट्रांसप्लांट की दुनिया को पूरी तरह बदल सकता है।
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