भोजपुरी फिल्मी गानों से अलग बिहार का ये लोकगीत सुनाता है परदेसी पिया की कहानी
लोकगीत
पटना: बिहार की लोक संस्कृति में गीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि लोगों की भावनाओं, रिश्तों और जीवन के संघर्षों को अभिव्यक्त करने का माध्यम भी रहे हैं। भोजपुरी, मैथिली, मगही और बज्जिका जैसी भाषाओं में पीढ़ियों से गाए जा रहे लोकगीतों में प्रेम, विवाह, त्योहार, खेती और सामाजिक जीवन के साथ विरह का भाव प्रमुखता से मिलता है। खासकर परदेस गए पति की प्रतीक्षा करती स्त्री की पीड़ा और उससे दोबारा मिलने की चाह बिहार के कई पारंपरिक लोकगीतों की पहचान रही है।
आज के फिल्मी भोजपुरी गानों में जहां तेज संगीत, ग्लैमर और आधुनिक प्रस्तुति देखने को मिलती है, वहीं पारंपरिक लोकगीतों की खूबसूरती उनकी सहज भाषा और भावनाओं में छिपी होती है। इनमें गांव के आंगन, नदी, पेड़-पौधे, मौसम और परिवार जैसी रोजमर्रा की चीजों के जरिए प्रेम और विरह की कहानी कही जाती है।
परदेसी पिया की प्रतीक्षा
बिहार की लोक परंपरा में बिदेसिया विशेष रूप से विरह से जुड़ी शैली मानी जाती है। इसमें रोजगार या दूसरे कारणों से घर छोड़कर परदेस गए प्रेमी या पति और पीछे छूट गई पत्नी की भावनाओं को स्वर मिलता है। साहित्यिक अध्ययनों में भी बिदेसिया गीतों में परदेशी प्रेमी और उसकी प्रतीक्षा करती नायिका के जरिए करुणा तथा विरह के भावों का उल्लेख मिलता है।
भोजपुरी लोकगीतों में ऐसी स्त्री की भावनाएं बेहद सहज तरीके से सामने आती हैं, जिसका पति लंबे समय से परदेस में है। वह कभी मौसम से अपने प्रिय के लौटने की उम्मीद जोड़ती है तो कभी घर और गांव की चीजों को देखकर उसे याद करती है।
एक पारंपरिक भोजपुरी गीत में कुआं और पानी भरने के दैनिक काम के माध्यम से भी यही भावना सामने आती है। इसमें स्त्री जीवन के गुजरते समय के बीच अपने परदेसी पति के अब तक वापस नहीं आने की पीड़ा व्यक्त करती है।
पलायन से भी जुड़ा है लोकसंगीत
बिहार और पूर्वांचल में रोजगार के लिए पुरुषों के दूसरे शहरों और राज्यों में जाने की पुरानी परंपरा रही है। इसका प्रभाव वहां के लोकसंगीत में भी दिखाई देता है। पति या प्रेमी के परदेस जाने के बाद घर पर रह गई स्त्री की प्रतीक्षा ने लोकगीतों को विरह का गहरा भाव दिया।
इसी वजह से इन गीतों में प्रेम केवल रोमांस तक सीमित नहीं रहता। इनमें दूरी, इंतजार, अकेलापन और दोबारा मिलने की उम्मीद भी शामिल होती है। यही भाव इन्हें आधुनिक फिल्मी भोजपुरी गानों से अलग पहचान देता है।
बिहार में लोकगीतों की समृद्ध परंपरा
बिहार के लोकसंगीत में केवल बिदेसिया ही नहीं बल्कि फाग, चैता, झूमर, सोहर और विवाह गीतों सहित कई शैलियां मौजूद हैं। बिहार सरकार से जुड़ी लोकसंगीत सामग्री में भी भोजपुरी क्षेत्र के बिदेसिया और अन्य गीतों के साथ मिथिलांचल की विभिन्न लोकगीत परंपराओं का उल्लेख मिलता है।
इन लोकगीतों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें आम लोगों की जिंदगी सीधे दिखाई देती है। प्रेम हो या बिछोह, शादी हो या त्योहार—हर परिस्थिति के लिए लोकगीत मौजूद हैं।
पीढ़ियों तक कायम रही मिठास
समय के साथ भोजपुरी संगीत का स्वरूप काफी बदल गया है। आधुनिक भोजपुरी सिनेमा और म्यूजिक वीडियो ने इसे नई पहचान दी है, लेकिन पारंपरिक लोकगीत आज भी बिहार की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा हैं। भोजपुरी की मिट्टी से जुड़ी धुनों का असर हिंदी फिल्मों तक भी पहुंचा है।
परदेसी पिया से मिलन की तड़प वाले ये गीत इसलिए खास हैं क्योंकि इनमें बनावटीपन के बजाय सामान्य ग्रामीण जीवन की संवेदनाएं सुनाई देती हैं। यही वजह है कि वर्षों पुराने होने के बावजूद विरह और बिदेसिया की लोक परंपरा आज भी बिहार की सांस्कृतिक पहचान को अपने भीतर समेटे हुए है।