नई दिल्ली। लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा और मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांग को लेकर लंबे समय से आवाज उठा रहे पर्यावरण कार्यकर्ता **सोनम वांगचुक** एक बार फिर बड़े आंदोलन की तैयारी में हैं। 9 सितंबर को केंद्रीय गृह मंत्रालय और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच हुई बातचीत से अपेक्षित ठोस नतीजा नहीं निकलने के बाद वांगचुक ने नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने संकेत दिया है कि अगर सरकार की तरफ से जल्द ठोस आश्वासन नहीं मिलता है तो **19 से 24 सितंबर के बीच आंदोलन शुरू किया जा सकता है।
यह चेतावनी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वांगचुक इससे पहले दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन और लंबी भूख हड़ताल के जरिए अपनी मांगों को राष्ट्रीय स्तर पर उठा चुके हैं। अब उनकी लड़ाई का मुख्य केंद्र लद्दाख में निर्वाचित लोकतांत्रिक व्यवस्था, जमीन-संस्कृति की संवैधानिक सुरक्षा और स्थानीय लोगों को फैसलों में वास्तविक अधिकार दिलाना है।
9 सितंबर की बैठक से थीं बड़ी उम्मीदें
लद्दाख के प्रतिनिधियों और केंद्र सरकार के बीच 9 सितंबर को नई दिल्ली में अहम बैठक हुई थी। बैठक केंद्रीय गृह मंत्रालय की पहल पर बुलाई गई थी।
लेह एपेक्स बॉडी यानी LAB समेत लद्दाख के प्रतिनिधियों को उम्मीद थी कि सरकार प्रस्तावित लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक सुरक्षा को लेकर कोई विस्तृत लिखित मसौदा सामने रखेगी।
लेकिन बैठक के बाद वांगचुक और लद्दाख के प्रतिनिधियों ने निराशा जताई।
उनका कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर ऐसा विस्तृत लिखित ड्राफ्ट सामने नहीं आया, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि प्रस्तावित व्यवस्था में स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों को वास्तव में कितनी शक्तियां मिलेंगी।
वांगचुक बोले केवल अगली बैठक की तारीख मिली
सोनम वांगचुक ने बैठक के नतीजे पर तंज कसते हुए मशहूर कॉमेडियन जसपाल भट्टी के पुराने 'फ्लॉप शो' की एक क्लिप भी साझा की।
उनका आरोप था कि बातचीत में ठोस समाधान निकलने के बजाय अगली बैठक की तारीख तय करना ही प्रमुख नतीजा रहा।
लेह एपेक्स बॉडी के सह-अध्यक्ष चेरिंग दोरजे ने भी बातचीत की प्रगति पर असंतोष जताया है। अब अगली बैठक अक्टूबर के पहले सप्ताह में कारगिल में होने की बात सामने आई है।
यही कारण है कि वांगचुक सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए दोबारा आंदोलन की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं।
19 से 24 सितंबर के बीच आंदोलन का संकेत
ताजा चेतावनी के मुताबिक वांगचुक ने कहा है कि अगर लगभग एक सप्ताह के भीतर सरकार की तरफ से जरूरी आश्वासन नहीं मिलता है तो **19 से 24 सितंबर के दौरान आंदोलन शुरू किया जा सकता है।
हालांकि आंदोलन का अंतिम स्वरूप और कार्यक्रम परिस्थितियों तथा लद्दाख के संगठनों के फैसले पर निर्भर करेगा।
इससे पहले वांगचुक ने कहा था कि अगर 9 सितंबर की बातचीत में ठोस प्रगति नहीं होती है तो लेह एपेक्स बॉडी बड़े स्तर पर आंदोलन के लिए मजबूर होगी।
इस तरह 9 सितंबर की बैठक को आंदोलन की आगे की रणनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था।
कारगिल से लेह तक पदयात्रा भी थी प्रस्तावित
लेह एपेक्स बॉडी ने पहले **10 सितंबर से कारगिल से लेह तक पदयात्रा** निकालने की योजना बनाई थी।
लेकिन 9 सितंबर को गृह मंत्रालय के साथ बातचीत तय होने के कारण इस पदयात्रा को स्थगित कर दिया गया।
वांगचुक ने उस समय कहा था कि बातचीत को एक मौका दिया जाना चाहिए। अगर सरकार से संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है तो आंदोलन दोबारा शुरू किया जा सकता है।
अब बैठक के बाद सामने आई निराशा ने फिर आंदोलन की संभावना बढ़ा दी है।
आखिर क्या चाहते हैं सोनम वांगचुक?
लद्दाख से जुड़ी मांगों में सबसे बड़ा मुद्दा क्षेत्र को मजबूत संवैधानिक और लोकतांत्रिक सुरक्षा देना है।
2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। इसके बाद स्थानीय संगठनों ने जमीन, रोजगार, पर्यावरण और संस्कृति की सुरक्षा के लिए विशेष संवैधानिक व्यवस्था की मांग तेज की।
शुरुआत में आंदोलन की प्रमुख मांग लद्दाख को संविधान की **छठी अनुसूची** में शामिल करने की थी।
लेकिन हालिया बातचीत में एक विशेष **अनुच्छेद 371 आधारित व्यवस्था** भी चर्चा में आई है। रिपोर्टों के मुताबिक लद्दाख के लिए एक अलग और विशेष संवैधानिक मॉडल पर विचार किया जा रहा है। इसे मीडिया रिपोर्टों में संभावित **अनुच्छेद 371(K)** के रूप में वर्णित किया गया है, लेकिन यह अभी अंतिम या लागू संवैधानिक प्रावधान नहीं है।
निर्वाचित विधानसभा सबसे महत्वपूर्ण मांग
वांगचुक की मौजूदा मांगों में लद्दाख में लोकतांत्रिक व्यवस्था की बहाली सबसे महत्वपूर्ण है।
उनका कहना है कि स्थानीय लोगों से जुड़े बड़े फैसले निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से होने चाहिए।
जमीन, प्राकृतिक संसाधन, पर्यावरण और स्थानीय प्रशासन जैसे विषय सीधे लद्दाख के लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। इसलिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें निर्वाचित संस्था की भूमिका मजबूत हो और नौकरशाही उसके प्रति जवाबदेह रहे।
9 सितंबर की बैठक के बाद भी वांगचुक ने जल्द विधानसभा चुनाव कराने की मांग दोहराई।
अनुच्छेद 371(K) की चर्चा क्यों?
केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच जारी बातचीत में एक खास संवैधानिक मॉडल की चर्चा सामने आई है।
रिपोर्टों के अनुसार प्रस्तावित व्यवस्था में लद्दाख की निर्वाचित संस्था को जमीन, संस्कृति, भाषा, जंगल, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े कई मामलों में अधिकार देने पर विचार हो सकता है।
यह व्यवस्था संविधान की छठी अनुसूची से अलग हो सकती है।
छठी अनुसूची पूर्वोत्तर के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषदों की व्यवस्था देती है। लद्दाख के लिए जिस मॉडल पर बातचीत हो रही है, उसे वहां की विशेष परिस्थितियों के अनुरूप तैयार करने की चर्चा है।
हालांकि जब तक सरकार की तरफ से अंतिम प्रस्ताव और संवैधानिक प्रक्रिया सामने नहीं आती, तब तक इसे लागू व्यवस्था नहीं माना जा सकता।
एक साल का अल्टीमेटम भी दे चुके वांगचुक
इससे कुछ दिन पहले सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार के सामने एक लंबी समयसीमा भी रखी थी।
उन्होंने कहा था कि सरकार को संसद के शीतकालीन सत्र में लद्दाख से संबंधित विधेयक पेश कर उसे पारित करना चाहिए और अगले एक साल के भीतर लद्दाख में अपनी विधानसभा तथा सरकार होनी चाहिए।
इससे साफ है कि आंदोलन की दो समयसीमाएं अलग-अलग संदर्भों में हैं।
पहली तत्काल चेतावनी है—अगर बातचीत में जल्द ठोस आश्वासन नहीं मिलता है तो सितंबर में आंदोलन।
दूसरी दीर्घकालिक मांग है—एक साल के भीतर लद्दाख में निर्वाचित सरकार और विधानसभा की दिशा में ठोस व्यवस्था।
जंतर-मंतर पर पहले कर चुके लंबा आंदोलन
सोनम वांगचुक हाल के महीनों में दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी आंदोलन का बड़ा चेहरा रहे हैं।
जुलाई में उन्होंने लंबी भूख हड़ताल समाप्त की थी, लेकिन उनसे जुड़े आंदोलनकारी समूहों ने इसके बाद भी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी रखने की घोषणा की थी।
वांगचुक ने अपनी भूख हड़ताल समाप्त करते हुए आंदोलन के दूसरे रास्तों और बातचीत को मौका देने का संकेत दिया था।
अब लद्दाख के मुद्दे पर केंद्र के साथ बातचीत में अपेक्षित प्रगति नहीं होने से एक बार फिर उनका आंदोलनकारी रुख सामने आया है।
सितंबर को बताया गया 'शहीद माह'
लद्दाख के संगठनों ने सितंबर को पिछले वर्ष के आंदोलन से जुड़ी घटनाओं की याद में 'शहीद माह' के तौर पर मनाने की बात कही है।
लेह एपेक्स बॉडी से जुड़े नेताओं ने पिछले साल 24 सितंबर की घटनाओं, मौतों, घायलों और दर्ज मामलों को लेकर भी सरकार के सामने अपनी मांगें रखी हैं।
LAB नेताओं का कहना है कि पिछले साल की हिंसा से जुड़े दर्जनों मामलों में से कुछ मामलों को ही वापस लिया गया है। इसके साथ मृतकों और घायलों के परिवारों के लिए न्याय और मुआवजे की मांग भी उठाई जा रही है।
इस वजह से 24 सितंबर की तारीख आंदोलन के लिए प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण है।
जमीन और रोजगार की सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा
लद्दाख में संवैधानिक सुरक्षा की मांग केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है।
स्थानीय संगठन लंबे समय से जमीन और सरकारी नौकरियों में स्थानीय लोगों के हितों की सुरक्षा की मांग करते रहे हैं।
उनकी चिंता है कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद क्षेत्र की जमीन और रोजगार से जुड़े अधिकारों को मजबूत संवैधानिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।
इसके अलावा लद्दाख का बेहद संवेदनशील पर्यावरण भी आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
वांगचुक पर्यावरण संरक्षण को राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकारों से जोड़कर देखते हैं।
पर्यावरण के नाम पर देशभर से समर्थन की अपील
वांगचुक ने पहले कहा था कि जरूरत पड़ने पर वह देशभर के लोगों से लद्दाख के समर्थन में आगे आने की अपील करेंगे।
उनका तर्क है कि लद्दाख का आंदोलन केवल वहां रहने वाले लोगों के अधिकारों तक सीमित नहीं है बल्कि हिमालयी पर्यावरण और देश की सीमाओं से भी जुड़ा मामला है।
वांगचुक के मुताबिक सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को मजबूत करना राष्ट्रीय हित से भी जुड़ा है।
इसी वजह से वह आंदोलन को केवल क्षेत्रीय मांग के बजाय व्यापक राष्ट्रीय मुद्दे के रूप में पेश करते रहे हैं।
सरकार से बातचीत का रास्ता अभी बंद नहीं
आंदोलन की चेतावनी के बावजूद सरकार और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत पूरी तरह बंद नहीं हुई है।
अगले दौर की बैठक अक्टूबर के पहले सप्ताह में कारगिल में होने की बात सामने आई है।
इसका अर्थ है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद का रास्ता अभी खुला है।
लेकिन वांगचुक और LAB चाहते हैं कि अगली बैठक का इंतजार करने से पहले ही केंद्र प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था पर स्पष्ट और ठोस आश्वासन दे।
आंदोलन या समझौता अब सरकार के अगले कदम पर नजर
9 सितंबर की बैठक के बाद बनी स्थिति में अब सबसे ज्यादा नजर केंद्र सरकार के अगले कदम पर है।
अगर प्रस्तावित लोकतांत्रिक व्यवस्था, विधानसभा की शक्तियों और संवैधानिक सुरक्षा को लेकर कोई स्पष्ट रोडमैप सामने आता है तो आंदोलन को टाला भी जा सकता है।
लेकिन वांगचुक ने संकेत दे दिया है कि बिना ठोस प्रगति के केवल बैठकों का सिलसिला उन्हें स्वीकार नहीं है।
इसलिए आने वाला एक सप्ताह महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जंतर-मंतर पर लंबी लड़ाई के बाद सोनम वांगचुक एक बार फिर आंदोलन की तैयारी में दिखाई दे रहे हैं। फिलहाल संकेत **19 से 24 सितंबर के बीच संभावित आंदोलन** के हैं, जबकि लंबे समय के लिए उनकी मांग है कि संसद के शीतकालीन सत्र में लद्दाख से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था आगे बढ़े और एक साल के भीतर निर्वाचित विधानसभा तथा सरकार की दिशा साफ हो।
Tags: