वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग: शीर्ष 100 में तीन भारतीय शिक्षा संस्थान
क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग ब्रिटेन की एक निजी कंपनी क्वाकरेल्ली सायमंड्स द्वारा छापी जाने वाली एक सालाना रिपोर्ट है। इसके बावजूद क्यूएस रैंकिंग खासी प्रतिष्ठित मानी जाती है। हालांकि इसके आलोचकों की राय उलट है। वे मानते हैं कि यह रैंकिंग ब्रांड मूल्य को शोध-अनुसंधान के मुकाबले ज्यादा महत्ता देती है। टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग और अकादमिक वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग भी विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित रैंकिंग में से एक हैं। क्यूएस वर्ल्ड रैंकिंग के अलावा भारतीय विश्वविद्यालयों की स्थिति टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग में भी अच्छी नहीं है। इस साल जारी हुई रैंकिंग में मात्र तीन भारतीय शिक्षा संस्थान ही शीर्ष 100 में अपनी जगह बना पाए। यहां भी शीर्ष 10 विश्वविद्यालयों में एक भी भारतीय विवि नहीं है।
वर्ल्ड रैंकिंग रिर्पोट: चीन के छह विवि शीर्ष 100 में शामिल
भारत के मुकाबले चीन के छह विवि टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग के शीर्ष 100 में शामिल हुए हैं। क्यूएस सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय विश्वविद्यालयों की हालत चीन से बेहद खराब है। इसमें चीन के दो संस्थान टॉप 20 में और करीब छह संस्थान टॉप 100 में शामिल हैं। वैसे सभी वर्ल्ड रैंकिंग रिपोर्टों पर अक्सर सवालिया निशान भी उठते रहते हैं। भारत के सभी आइआइटी संस्थानों ने तो गत वर्ष टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग का बहिष्कार तक कर दिया था। आइआइटी दिल्ली के निदेशक ने हाल ही में कहा था कि इस तरह की सभी रैंकिंग ब्रांड विजिबिलिटी को जरूरत से ज्यादा महत्व देती हैं, जिसके कारण आइआइटी जैसे संस्थान भी मात खा जाते हैं, परंतु आइआइटी में अंतरराष्ट्रीय टीचिंग फैकल्टी की भारी कमी पर उन्होंने कहा कि इसका कारण हर स्तर पर मौजूद नीतियों से जुड़ीं चुनौतियां हैं।
भारतीय विवि प्रणाली का शोध-अनुसंधान बड़े देशों के मुकाबले न के बराबर
रैंकिंग प्रकिया की तमाम खामियों के बावजूद इस बात को कोई नहीं नकार सकता कि भारतीय विश्वविद्यालय प्रणाली का शोध-अनुसंधान पर ध्यान अन्य बड़े देशों के मुकाबले लगभग न के बराबर ही है। जहां अमेरिका में शोध करने वाले विश्वविद्यालयों का अलग तरह से वर्गीकरण किया जाता है, वहीं चीन ने अपने विश्वविद्यालयों को विश्वस्तरीय बनाने के लिए कई प्रकार की परियोजनाएं शुरू की हैं। इनमें से प्रोजेक्ट-985 एवं प्रोजेक्ट-211 सबसे महत्वपूर्ण योजनाएं हैं। इन दोनों ही परियोजनाओं की शुरुआत चीन ने पिछली सदी के अंतिम दशक में ही कर दी थी। इनके अंतर्गत न केवल विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों की नींव रखी गई, बल्कि पहले से ही स्थापित संस्थाओं को भी शोध संसाधनों की दृष्टि से और मजबूत किया गया। इसी कारण आज चीन के ये संस्थान वैश्विक रैंकिंग में अपनी जगह बनाने के साथ शोध-अनुसंधान के क्षेत्र में नए कीर्तिमान भी बना रहे हैं। एक सूचकांक के अनुसार विश्व में सबसे तेजी से शोध कर रहे विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में टॉप 10 सभी पायदानों पर चीनी संस्थान ही कायम हैं।
भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली को सुधारने की आवश्यकता
अन्य देशों के मुकाबले भारत में अनुसंधान करने वाले विश्वविद्यालयों का अलग से कोई भी वर्गीकरण नहीं किया जाता। यहां आज भी उच्च शिक्षा संस्थानों का सारा ध्यान केवल शिक्षण पर ही केंद्रित है, शोध-अनुसंधान पर नहीं और निजी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों के तो क्या ही कहने? गौरतलब है कि कई शिक्षण संस्थानों में तो आजकल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए अलग से फैकल्टी खोल दी गई हैं। जहां विश्व आज नई-नई खोजों की ओर बढ़ रहा है, वहीं विश्वविद्यालयों का मौजूदा हाल भारत के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। विश्व शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा की पूर्ति करने के लिए यह अति आवश्यक है कि भारत अपनी उच्च शिक्षा प्रणाली को सुधारे।
भारत को जीडीपी का 2 फीसद भाग शोध-अनुसंधान पर खर्च करना चाहिए
यह सच है कि भारत से दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी संख्या में शोधपत्र छपते हैं, परंतु चीन के 20 प्रतिशत एवं अमेरिका के 16 प्रतिशत की तुलना में भारत का 5 प्रतिशत हिस्सा अभी भी बेहद कम है। सर्वोत्तम वैश्विक प्रथाओं के अनुसार भारत को कम से कम जीडीपी का 2 प्रतिशत भाग शोध-अनुसंधान पर खर्च करना चाहिए, परंतु यह भाग फिलहाल मात्र 0.6 प्रतिशत है। ऐसा कोई प्रमाण नहीं कि विश्व शक्ति बनने वाले देश ने बिना शोध-अनुसंधान पर खर्च किए ही अपने को ताकतवर साबित कर दिया हो। भारत का ऐसे इतिहास में कोई अपवाद साबित होना भी मुश्किल ही है। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि भारतीय विवि अपना ध्यान शोध-अनुसंधान पर केंद्रित करें और पूरा देश ऐसा करने में उन्हें हर प्रकार का सहयोग दें।