सवाल पैदा होता है कि जब देश में नई आर्थिक नीतियां आने के बाद से सभी विकास कार्यों में पीपीपी ( पब्लिक- प्राइवेट पार्टनरशिप) की तर्ज पर काम हो रहा है तो कृषि क्षेत्र इससे अछूता कैसे रह सकता है मगर मुद्दा यह है कि सरकार निजी क्षेत्र के लिए स्वतन्त्र व्यवस्था कायम करना चाहती है जिस पर किसानों को घोर आपत्ति है। इसकी वजह बाजार मूलक अर्थव्यवस्था का वह नियम है जिसमें निजी निवेश का लक्ष्य अधिकाधिक मुनाफा कमाना होता है, परन्तु सरकार इसके साथ यह आश्वासन भी दे रही है कि वह कृषि विपणन में सरकारी खरीद व्यवस्था जारी रखेगी। किसान इस व्यवस्था को जारी रखने की कानूनी गारंटी मांग रहे हैं। सरकार इससे बचना चाहती है। असली झगड़े की जड़ यही कशमकश है जिस पर किसानों का आन्दोलन लगातार लम्बा खिंचता जा रहा है। वैसे सैद्धान्तिक तौर पर कृषि क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ने का स्वागत प्रत्येक अर्थशास्त्री करेगा मगर भारत के सन्दर्भ में इस क्षेत्र पर देश की साठ प्रतिशत आबादी के निर्भर होने की वजह से इसमें पेंच पड़ जाता है। यह पेंच यह है कि कृषि के कार्य में लगे हुए लोगों की आजीविका के साधनों के संकुचित होने का खतरा जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में कार्पोरेट क्षेत्र अपना मुनाफा बढ़ाने की गर्ज से बेरोजगारी काे बढ़ावा दे सकता है।
मगर दूसरी तरफ निजी क्षेत्र के निवेश बढ़ने से गांवों में कृषि संसाधन उद्योग को भी बढ़ावा मिल सकता है जिससे गांवों में लघु औद्योगीकरण की प्रक्रिया शुरू हो सकती है और ग्रामीण जनता इस क्षेत्र में कौशल विकास कर सकती है। अतः हमें यह देखना होगा कि कार्पोरेट क्षेत्र किस इलाके पर ज्यादा जोर देता है। यदि उसका लक्ष्य केवल खाद्यान्न व अन्य कृषि उत्पादों के व्यापार पर रहता है तो इसका असर किसानों पर नकारात्मक पड़ सकता है और यदि वह कृषि जन्य उद्योगों पर जोर देता है तो इसका असर किसानों पर सकारात्मक पड़ेगा। अतः कृषि कानूनों को इसी के अनुरूप ढालने की जरूरत है जिससे किसानों को यकीन हो सके कि उनकी फसल की कीमत के दाम बेहतर होंगे क्योंकि उनका औद्योगिक उपयोग तुरत-पुरत होगा। अतः कुछ कृषि विशेषज्ञों का मत यह है कि सरकार को नये कृषि कानून एक मुश्त नहीं बल्कि टुकड़ों में लाने चाहिएं जिससे किसानों में उनके प्रभाव से उपजे बेहतर परिणामों का असर पड़ सके लेकिन दूसरी तरफ किसानों को भी आंख मींच कर कृषि क्षेत्र में निजी निवेश का विरोध नहीं करना चाहिए और गौर करना चाहिए कि बाजार मूलक अर्थव्यवस्था के चलते वे अपनी उपज को किस तरह ज्यादा से ज्यादा लाभकारी बना सकते हैं मगर यह काम तब तक नहीं हो सकता जब तक कि किसानों की कृषि लागत के सामान के दाम भी नियन्त्रण में न रहें। अभी तक सरकारों की नीति रही है कि कृषि लागत को कम से कम बनाये रखने के इन्तजाम बांधे जायें। यह काम सरकारें वार्षिक बजट के माध्यम से करती रही हैं, परन्तु जीएसटी व्यवस्था लागू होने के बाद से अब जरूरी कृषि लागत सामान पर शुल्क दरों को सीमित रखने का अधिकार संसद से बाहर जीएसटी परिषद के पास चला गया है, जिसकी वजह से दिक्कत और बढ़ गई है। अगर इसे ध्यान से देखें तो शुल्क ढांचा भी बाजार की ताकतों पर निर्भर हो गया है। संसद के हाथ में आयातित कृषि जन्य उत्पादों पर 'एंटी डम्पिंग ड्यूटी' लगाने का अधिकार बचता है। अतः आने वाले समय में एक न एक दिन तो कृषि क्षेत्र को बाजार की ताकतों से बांधना ही होगा मगर यह कार्य एक सुनियोजित प्रक्रिया के तहत ही भारत जैसे कृषि प्रधान देश में हो सकता है। ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर किसानों और सरकार दोनों को ही गौर करना चाहिए और मिल-बैठ कर सर्वमान्य बीच का हल खोजना चाहिए। किसानों को भी अपना दिल खुला रख कर इस बैठक में सभी विकल्पों के बारे में सोचना चाहिए।