By: divyahimachal
लगभग एक-तिहाई विधानसभा की सीटें, नए विधायकों की समीक्षा कर रही हैं और जहां विधायिका के हुनर को तराशने की जरूरत को पूरा कर रहे हैं हिमाचल विधानसभा के अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया। प्रशिक्षण के कई अंदाज ऐसे भी हो सकते हैं, जहां लोकतंत्र की भाषा और आचरण की मर्यादा पर जोर दिया जाए। विधानसभा अध्यक्ष संवैधानिक विषयों की फेहरिस्त से सदन की नियमावली, विधायी कार्यों की रूपरेखा और माननीयों के विशेषाधिकारों की पेशकश करते हुए, एक आदर्श विधायक के लोकतांत्रिक फर्ज को रेखांकित कर रहे हैं। जाहिर है सदन के वातावरण में उत्तेजना के क्षण जिस कद्र बढ़ रहे हैं, उससे जनता के सामने जन प्रतिनिधियों का मूल्यांकन उच्च स्थान हासिल नहीं कर पा रहा है। हालांकि हिमाचल विधानसभा की अपनी श्रेष्ठ परंपराएं रही हैं और यहां कहा भी गया और कहे को गौर से सुना भी गया, लेकिन हालिया वर्षों में सदन से बाहर कहने की होड़ में अक्सर विपक्ष की भूमिका रेखांकित हुई है। किसी भी सत्र की समीक्षा में विपक्षी सदस्यों के बहिर्गमन अगर बढ़-चढ़ कर सामने आ रहे हैं, तो यह सार्वजनिक धन और जनापेक्षाओं की तौहीन है।
यह सत्ता पक्ष को तय करना है कि वह सदन की कार्यवाहियों में बहस के तीक्ष्ण विषयों को किस स्तर तक ले जाना चाहता है या विधायिका के तयशुदा बिजनेस को अंजाम तक पहुंचाने का कौनसा रास्ता अख्तियार करता है। ऐसे बहुत सारे सामान्य विषय तथा जनापेक्षाएं हैं, जिनके ऊपर सदन की बहस और जन प्रतिनिधियों की दृष्टि का परिचय केवल विधानसभा की कार्यवाहियां करा सकती हैं। हिमाचल में कौन नहीं चाहेगा कि बेरोजगार युवाओंं, शिक्षा व चिकित्सा सेवाओं, आवारा पशुओं, बंदरों, विकास और क्षेत्रीय संभावनाओं पर अधिक से अधिक चर्चा न हो, लेकिन जब से सदन कतराने लगा है, विधायकों का जोश वॉकआउट के नारों में सदन से बाहर आने लगा है। नए विधायक बेशक राजनीतिक तौर पर हर दांव में सफल होकर ही विधानसभा पहुंचे हैं, लेकिन इससे इतर इनकी लोकतांत्रिक भूमिका को सशक्त माध्यम बनाने के लिए अभ्यास, अध्ययन तथा कार्य शैली विकसित करनी पड़ेगी। मौजूदा विधानसभा में चार से छह बार जीत कर पहुंचे कई वरिष्ठ विधायक कई पाठ पढ़ा सकते हैं, लेकिन राजनीतिक कारणों से जो दृश्य उभरते हैं, उनके ऊपर गौर करने की जरूरत दोनों पक्षों की रहेगी। जिस तरह विधायक प्राथमिक योजनाओं पर चर्चा होती है, उसी तरह हर विधानसभा के प्रति सरकार की जवाबदेही है। कई कारणों से एक ऐसा इतिहास विधानसभा के भीतर बन रहा है जिसके कारण राजनीतिक कटुता का दोहन हर सत्र की निशानी बन जाता है। प्रदेश के लिए जब विधायक अपनी प्राथमिकताएं सामने लाते हैं, तो हिमाचल का विजन अलग-अलग विषयों को तरजीह देता हुआ प्रतीत होता है। मसलन प्रदेश में कुछ ऐसे कार्य हैं जहां सत्ता और विपक्ष के बीच दीवारें नहीं, आपसी सहयोग की परिपाटी चाहिए।
पिछले कई वर्षों से हिमाचल विधानसभा में 'शू्न्यकाल' शुरू करने की दलील पैदा हुई है, ताकि विधायक तत्काल सार्वजनिक महत्त्व के मुद्दे उठाकर, पूरे प्रदेश को संबोधित कर सकें। प्रदेश को व्यापक दृष्टि से समझने की जरूरत है और इस तरह की शुरुआत से राजनीतिक नेतृत्व भी सशक्त होगा। इसी तरह प्राइवेट मेंबर बिल की परंपरा में जन प्रतिनिधियों के मौलिक विचार तथा संकल्प सामने आते हैं और यह एक तरह से राजनीतिक नवाचार है, जहां ढर्रे से हटकर सोच सामने आता है। नए विधायकों में शुमार कई सदस्यों की पृष्ठभूमि आकर्षित करती है। विधानसभा के दो सदस्य डॉक्टरेट, पंद्रह स्नातक प्रोफेशनल, उन्नीस स्नातकोत्तर तो सोलह स्नातक हैं, जबकि 16 विधायक दसवीं या बारहवीं पास हैं। इसी पृष्ठभूमि के न्यूरो सर्जन डा. जनक राज का प्रस्ताव गौरतलब है। वह डाक्टर की भूमिका में निशुल्क सेवाएं देना चाहते हैं, तो व्यावसायिक दक्षता के इस भंडार के इस्तेमाल का भी कोई तो रास्ता होगा। इसी तरह अगर विधायकों की पृष्ठभूमि अपने तौर पर सामाजिक भूमिका में कुछ अलग कर पाए, तो समाज के बीच सेवा भाव के अलख जगाए जा सकते हैं। बहरहाल नए विधायकों का प्रशिक्षण यह आशा जगा रहा है कि कल जब बजट सत्र सामने आएगा, तो पक्ष-विपक्ष के बीच संवाद का औचित्य बढ़ेगा, वरना सियासी वातावरण तो इतना अधीर और स्वार्थी हो चुका है कि हम हर बार विधानसभा सत्र के दौरान कई दीवारों को उठता हुए देखते हैं। लोकतांत्रिक आचरण की चिंताएं अगर लोकसभा के ढर्रे से उभर रही हैं, तो कहीं न कहीं हिमाचल विधानसभा में भी विधायकों को संविधान की अपेक्षाओं के अनुरूप आदर्श स्थापित करने होंगे।