नई दिल्ली : 27 अक्टूबर 2026। भारतीय नौसेना अकादमी की ओर से समुद्री खोज और बचाव अभियानों के लिए ट्विन ड्रोन प्रणाली का अनावरण किए जाने की जानकारी सामने आई है। इस पहल का उद्देश्य समुद्र में दुर्घटनाओं, जहाजों के संकट में फंसने और मछुआरों के लापता होने जैसी परिस्थितियों में राहत एवं बचाव कार्यों को अधिक प्रभावी बनाना है। हालांकि, अकादमी की इस विशिष्ट प्रणाली के अनावरण और इसकी तकनीकी विशेषताओं की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी उपलब्ध नहीं हो सकी है।
समुद्री बचाव अभियानों में ड्रोन तकनीक की अहम भूमिका
समुद्र में किसी नाव के पलटने, जहाज में आग लगने या मछुआरों के लापता होने की स्थिति में सबसे बड़ी चुनौती प्रभावित लोगों का जल्द पता लगाना होता है। खराब मौसम, ऊंची लहरों और समुद्र के विशाल क्षेत्र के कारण बचाव अभियान मुश्किल हो जाते हैं।ऐसी परिस्थितियों में ड्रोन तकनीक बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। ड्रोन की मदद से समुद्र के बड़े हिस्से की हवाई निगरानी की जा सकती है। इससे बचाव दल को संभावित दुर्घटनास्थल की पहचान करने और वहां आवश्यक संसाधन भेजने में सहायता मिल सकती है।विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक कैमरे और सेंसर से लैस ड्रोन समुद्री खोज अभियानों में मानव संसाधनों की आवश्यकता कम करने के साथ जोखिम भी घटा सकते हैं।
क्या है ट्विन ड्रोन प्रणाली?
ट्विन ड्रोन प्रणाली का सामान्य अर्थ दो ड्रोन का समन्वित इस्तेमाल है। ऐसी व्यवस्था में दोनों ड्रोन अलग-अलग या पूरक जिम्मेदारियां निभा सकते हैं।उदाहरण के तौर पर, एक ड्रोन समुद्र में फंसे लोगों की तलाश कर सकता है, जबकि दूसरा ड्रोन प्रभावित क्षेत्र की निगरानी या बचाव दल तक सूचना पहुंचाने में सहयोग कर सकता है।हालांकि, भारतीय नौसेना अकादमी की बताई गई नई प्रणाली में दोनों ड्रोन की वास्तविक भूमिका, उड़ान क्षमता, परिचालन दूरी और तकनीकी उपकरणों के बारे में विस्तृत आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।इसलिए फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित प्रणाली में केवल हवाई ड्रोन शामिल हैं या किसी अन्य प्रकार के मानवरहित उपकरणों का भी इस्तेमाल किया गया है।
आपात परिस्थितियों में मिल सकती है तेज सहायता
समुद्री बचाव अभियानों में समय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। दुर्घटना की सूचना मिलने के बाद प्रभावित स्थान की पहचान करने में होने वाली देरी से लोगों की जान को खतरा बढ़ सकता है।ड्रोन आधारित खोज प्रणाली का एक प्रमुख लाभ यह है कि इसे आवश्यकता के अनुसार प्रभावित क्षेत्र की निगरानी के लिए भेजा जा सकता है।यदि किसी प्रणाली में थर्मल कैमरे, जीपीएस और वास्तविक समय में वीडियो भेजने की क्षमता उपलब्ध हो, तो इससे राहत दल को समुद्र में मौजूद लोगों की स्थिति का आकलन करने में मदद मिल सकती है।हालांकि, इन सुविधाओं को भारतीय नौसेना अकादमी की नई प्रणाली की पुष्टि की गई विशेषताएं नहीं माना जाना चाहिए।
भारतीय तटरक्षक बल ने भी दिखाई आधुनिक बचाव क्षमता
भारत समुद्री खोज और बचाव अभियानों में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर लगातार जोर दे रहा है।इसी क्रम में भारतीय तटरक्षक बल ने 8 अक्टूबर 2026 को ओडिशा के पारादीप तट के पास 12वें राष्ट्रीय समुद्री खोज एवं बचाव अभ्यास 'SAREX-2026' का आयोजन किया था।इस अभ्यास में भारतीय नौसेना, वायुसेना, तटरक्षक बल और अन्य एजेंसियों ने भाग लिया। अभियान में जहाजों, विमानों, हेलीकॉप्टरों और दूर से संचालित पानी के भीतर काम करने वाले उपकरणों की क्षमताओं का प्रदर्शन किया गया। इस अभ्यास में 30 देशों के 32 पर्यवेक्षक भी शामिल हुए थे।
मछुआरों और तटीय क्षेत्रों के लिए उपयोगी हो सकती है तकनीक
भारत की लंबी समुद्री तटरेखा के कारण समुद्री सुरक्षा और बचाव व्यवस्था का विशेष महत्व है।तटीय क्षेत्रों में मछली पकड़ने वाली नौकाओं का संचालन होता है। खराब मौसम के दौरान इन नौकाओं के रास्ता भटकने या दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा बना रहता है।ऐसे मामलों में ड्रोन आधारित निगरानी राहत एजेंसियों को दुर्घटनास्थल तक जल्द पहुंचने में सहायता कर सकती है। इससे खोज अभियानों की दक्षता बढ़ने की संभावना है।
स्वदेशी तकनीक और समुद्री सुरक्षा पर बढ़ रहा जोर
भारतीय नौसेना अपनी निगरानी, खोज और बचाव क्षमताओं को मजबूत करने के लिए मानवरहित तकनीकों में रुचि बढ़ा रही है।अक्टूबर 2026 में भारतीय नौसेना को स्वदेशी रूप से विकसित दो EyeROV TROUT अंडरवाटर रोबोटिक सिस्टम भी सौंपे गए। इन उपकरणों को पानी के भीतर निरीक्षण, निगरानी, खोज और रिकवरी जैसे कार्यों के लिए विकसित किया गया है।समुद्री बचाव के लिए ट्विन ड्रोन जैसी प्रणालियों का विकास भविष्य में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। हालांकि, नई प्रणाली की वास्तविक क्षमता और नौसेना में उसके संभावित इस्तेमाल की स्थिति आधिकारिक तकनीकी विवरण तथा परीक्षण परिणाम सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
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