नई दिल्ली। दुनिया भर में सभी लोगों को बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की राह में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट’ में प्रकाशित एक ग्लोबल स्टडी के अनुसार, यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (Universal Health Coverage) के लक्ष्य को हासिल करने के लिए दुनिया को लगभग 3.44 करोड़ अतिरिक्त स्वास्थ्यकर्मियों की जरूरत है।

स्टडी में बताया गया है कि डॉक्टरों, नर्सों, दाइयों (मिडवाइव्स), डेंटिस्ट और फार्मासिस्ट जैसे स्वास्थ्य पेशेवरों की सबसे ज्यादा कमी दक्षिण एशिया और सब-सहारा अफ्रीका क्षेत्रों में देखने को मिल रही है। इन क्षेत्रों में बढ़ती आबादी और स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरतों के मुकाबले स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या अभी भी काफी कम है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पर्याप्त संख्या में स्वास्थ्यकर्मी उपलब्ध नहीं होने से लोगों तक गुणवत्तापूर्ण इलाज पहुंचाने में परेशानी होती है। खासकर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मचारियों की कमी स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ा रही है।

भारत में हर 10 हजार लोगों पर 73 स्वास्थ्यकर्मी

ग्लोबल स्टडी में भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर भी आंकड़े सामने रखे गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर 10,000 लोगों पर लगभग 73 स्वास्थ्यकर्मी उपलब्ध हैं।

इनमें करीब 10.5 डॉक्टर, 10.8 नर्स, 8.1 फार्मासिस्ट और फार्मास्युटिकल असिस्टेंट तथा 1.2 मिडवाइफरी स्टाफ शामिल हैं। हालांकि भारत में स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या कई देशों की तुलना में बेहतर हुई है, लेकिन बढ़ती आबादी और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग को देखते हुए अभी भी बड़े स्तर पर सुधार की जरूरत है।

विशेषज्ञों का मानना है कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए केवल डॉक्टरों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि नर्सिंग स्टाफ, पैरामेडिकल कर्मचारियों और अन्य स्वास्थ्य पेशेवरों की संख्या बढ़ाना भी जरूरी है।

ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा समस्या

भारत समेत कई विकासशील देशों में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी का सबसे ज्यादा असर ग्रामीण इलाकों में देखने को मिलता है। शहरों में अस्पताल और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता अपेक्षाकृत बेहतर है, लेकिन गांवों और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच अभी भी चुनौती बनी हुई है।

कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों, नर्सों और तकनीकी कर्मचारियों की कमी के कारण मरीजों को बड़े शहरों के अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। इससे इलाज में देरी और मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ता है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की जरूरत

रिपोर्ट में स्वास्थ्य क्षेत्र में अधिक निवेश की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाने के लिए मेडिकल शिक्षा, नर्सिंग प्रशिक्षण संस्थानों और अन्य स्वास्थ्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार करना होगा।

इसके अलावा स्वास्थ्यकर्मियों को ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने के लिए प्रोत्साहित करने, बेहतर सुविधाएं देने और उनके प्रशिक्षण को मजबूत करने की जरूरत है।

महामारी के बाद बढ़ी स्वास्थ्यकर्मियों की अहमियत

कोरोना महामारी के दौरान पूरी दुनिया ने स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका को करीब से देखा। महामारी के दौरान डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों ने अग्रिम पंक्ति में रहकर काम किया।

इस अनुभव के बाद कई देशों ने स्वास्थ्य क्षेत्र की कमजोरियों को दूर करने और स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान देना शुरू किया। हालांकि, वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य जरूरतों और उपलब्ध संसाधनों के बीच अभी भी बड़ा अंतर बना हुआ है।

दक्षिण एशिया और अफ्रीका में सबसे बड़ी कमी

स्टडी के अनुसार, दक्षिण एशिया और सब-सहारा अफ्रीका में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी सबसे गंभीर स्थिति में है। इन क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती आबादी, सीमित स्वास्थ्य ढांचा और आर्थिक चुनौतियां समस्या को और बढ़ाती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत नहीं किया गया तो भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य संकटों का सामना करना पड़ सकता है।

यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज का लक्ष्य

यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर व्यक्ति को जरूरत के समय गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें और इलाज का खर्च उसकी आर्थिक स्थिति पर भारी न पड़े।

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है।

‘द लैंसेट’ की स्टडी ने दुनिया के सामने स्वास्थ्य क्षेत्र की इस बड़ी चुनौती को उजागर किया है। भारत जैसे बड़े आबादी वाले देश के लिए यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है।

सरकारों और स्वास्थ्य संस्थानों के सामने अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने की है, ताकि हर व्यक्ति तक बेहतर इलाज पहुंच सके।

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