नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में हो रहे **BRICS Summit 2026** के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की आर्थिक ताकत और विकास की संभावनाओं को दुनिया के सामने रखा है। BRICS Business Forum में आर्थिक सहयोग पर जोर देते हुए भारत ने यह संदेश दिया कि वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में भी भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है और निवेश तथा कारोबार के लिए नए अवसर पैदा कर रही है। विस्तारित BRICS समूह अब दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे इस मंच का आर्थिक और रणनीतिक महत्व पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है।
BRICS में फिलहाल 11 सदस्य देश हैं। समूह दुनिया की करीब आधी आबादी और क्रय शक्ति समता के आधार पर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगभग 40 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे में दिल्ली में हो रहा सम्मेलन केवल कूटनीतिक बैठक नहीं बल्कि दुनिया के सबसे बड़े उभरते बाजारों के भविष्य पर होने वाला महत्वपूर्ण आर्थिक मंथन भी है।
दुनिया की करीब आधी आबादी BRICS में
BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन के समूह BRIC के रूप में हुई थी। दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसका नाम BRICS पड़ा।
इसके बाद समूह का विस्तार हुआ और आज इसमें 11 देश शामिल हैं।
विस्तार के बाद BRICS की जनसांख्यिकीय और आर्थिक ताकत काफी बढ़ गई है। समूह अब दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है।
BRICS का यह आकार सदस्य देशों को एक विशाल साझा बाजार उपलब्ध कराता है।
अगर सदस्य देश व्यापारिक बाधाओं को कम करने, लॉजिस्टिक्स सुधारने और निवेश के रास्ते आसान बनाने में सफल होते हैं तो समूह के भीतर व्यापार तेजी से बढ़ सकता है।
भारत ने दिया ग्रोथ का भरोसा
प्रधानमंत्री मोदी का फोकस भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था में भरोसेमंद ग्रोथ इंजन के रूप में पेश करने पर रहा है।
दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध, ऊर्जा की ऊंची कीमतों और सप्लाई चेन में अनिश्चितता के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत विकास दर बनाए रखने की कोशिश कर रही है।
भारत का विशाल घरेलू बाजार, युवा आबादी, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और तेजी से बढ़ता मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर विदेशी कंपनियों और निवेशकों के लिए अवसर पैदा कर रहा है।
भारत BRICS के मंच से भी यही संदेश देना चाहता है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक वृद्धि में उसकी भूमिका और बड़ी होगी।
BRICS का आर्थिक वजन कितना बड़ा?
BRICS का विस्तार होने के बाद समूह की ताकत केवल आबादी तक सीमित नहीं है।
विस्तारित समूह वैश्विक GDP का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा क्रय शक्ति समता के आधार पर प्रतिनिधित्व करता है। वैश्विक व्यापार में भी इसकी हिस्सेदारी लगभग एक चौथाई के आसपास है।
BRICS देशों के पास तेल, प्राकृतिक गैस और महत्वपूर्ण खनिजों के विशाल भंडार हैं।
दूसरी तरफ भारत और चीन जैसे देश दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों में शामिल हैं।
यानी समूह के भीतर उत्पादक और उपभोक्ता दोनों तरह की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मौजूद हैं।
यही BRICS को भविष्य के वैश्विक आर्थिक संतुलन में महत्वपूर्ण बनाता है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर खास नजर
भारत इस समय दुनिया की प्रमुख तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
सरकार का जोर मैन्युफैक्चरिंग, डिजिटल अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे और निर्यात को बढ़ाने पर है।
सड़क, रेलवे, एयरपोर्ट, बंदरगाह और डिजिटल नेटवर्क पर किए जा रहे निवेश को भारत अपनी दीर्घकालिक ग्रोथ का आधार मानता है।
इसके साथ सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उत्पादन, रिन्यूएबल एनर्जी और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
BRICS Business Forum जैसे मंच भारत को इन अवसरों को वैश्विक निवेशकों के सामने रखने का मौका देते हैं।
वैश्विक संकट के बीच भारत की स्थिति
BRICS Summit ऐसे समय हो रहा है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों से जूझ रही है।
यूक्रेन युद्ध जारी है। पश्चिम एशिया में संघर्ष ने ऊर्जा बाजार और समुद्री व्यापार मार्गों को लेकर चिंता बढ़ाई है।
इसके अलावा अमेरिका-चीन व्यापारिक और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का असर भी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
ऐसे माहौल में कंपनियां ऐसी अर्थव्यवस्थाओं की तलाश कर रही हैं जहां घरेलू मांग मजबूत हो और लंबे समय तक विकास की संभावना बनी रहे।
भारत खुद को इसी तरह के भरोसेमंद निवेश गंतव्य के रूप में पेश कर रहा है।
सप्लाई चेन में BRICS का बड़ा प्लान
इस बार BRICS के आर्थिक एजेंडे में सप्लाई चेन भी प्रमुख मुद्दा है।
सदस्य देश **BRICS Logistics Supply-Chain Cooperation Framework** को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं।
इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच परिवहन और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को ज्यादा मजबूत और संकटों के प्रति लचीला बनाना है।
कोविड महामारी के बाद दुनिया ने देखा कि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भर सप्लाई चेन अचानक टूट सकती है।
इसके बाद से कंपनियां उत्पादन और आपूर्ति के लिए वैकल्पिक बाजार तलाश रही हैं।
भारत इस बदलाव को अपने लिए बड़े अवसर के रूप में देखता है।
स्टार्टअप के लिए BRICS नेटवर्क
BRICS Summit 2026 में स्टार्टअप और इनोवेशन पर भी खास जोर है।
**BRICS Incubator Network** के जरिए सदस्य देशों के स्टार्टअप, इनक्यूबेटर और सरकारी एजेंसियों को एक डिजिटल नेटवर्क से जोड़ने की योजना है।
इसके अलावा **BRICS Startup Innovation Fund** की दिशा में भी काम हो रहा है।
इसका उद्देश्य शुरुआती और ग्रोथ स्टेज के स्टार्टअप को सहयोग उपलब्ध कराना है।
भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में से एक है। ऐसे में BRICS के भीतर बनने वाला साझा नेटवर्क भारतीय स्टार्टअप को नए बाजार और निवेशक उपलब्ध करा सकता है।
डिजिटल इंडिया भी बड़ी ताकत
भारत की ग्रोथ स्टोरी में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की भूमिका तेजी से बढ़ी है।
डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन सरकारी सेवाएं और स्टार्टअप इकोसिस्टम ने भारतीय अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों में बदलाव किया है।
भारत अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के अनुभव को दूसरे विकासशील देशों के साथ साझा करने की पेशकश भी करता रहा है।
BRICS में डिजिटल भुगतान और सीमा पार लेनदेन को आसान बनाने की संभावनाओं पर चर्चा लंबे समय से चल रही है।
अगर सदस्य देशों के बीच डिजिटल वित्तीय संपर्क बढ़ता है तो इसका सीधा फायदा व्यापार और छोटे कारोबारों को मिल सकता है।
स्थानीय मुद्राओं में कारोबार
BRICS की आर्थिक चर्चाओं में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार भी महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है।
रूस और कुछ अन्य सदस्य देश डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था पर जोर देते रहे हैं।
हालांकि भारत का रुख इस मामले में अपेक्षाकृत व्यावहारिक रहा है।
स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाना संभव है, लेकिन इसके लिए मुद्रा परिवर्तनीयता, व्यापार संतुलन और बैंकिंग नेटवर्क जैसी चुनौतियों का समाधान जरूरी है।
इसीलिए साझा BRICS मुद्रा जैसी चर्चाओं और वास्तविक भुगतान व्यवस्था के बीच अंतर समझना महत्वपूर्ण है।
कारोबार के लिए स्थिर माहौल की जरूरत
BRICS Business Forum में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी व्यापार और निवेश के लिए स्थिर तथा पूर्वानुमानित वातावरण पर जोर दिया।
भारत का कहना है कि भू-राजनीतिक तनाव और अचानक बदलती व्यापार नीतियां कंपनियों के लिए अनिश्चितता पैदा करती हैं।
ऐसे में BRICS देशों को पारदर्शी और भरोसेमंद कारोबारी व्यवस्था बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।
इसका सीधा मतलब है कि कंपनियों को नियमों की स्पष्टता मिले, निवेश सुरक्षित हो और सप्लाई चेन अचानक बाधित न हो।
रूस के साथ भारत का बढ़ता कारोबार
BRICS के भीतर भारत और रूस का आर्थिक रिश्ता भी चर्चा में है।
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने दिल्ली में द्विपक्षीय बैठक कर व्यापार, ऊर्जा, रक्षा, उर्वरक, परमाणु ऊर्जा, रेलवे, स्टील और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे क्षेत्रों पर बातचीत की।
दोनों देशों ने 2030 तक सालाना द्विपक्षीय व्यापार को **100 अरब डॉलर** तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
भारत की कोशिश रूसी बाजार में भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़ाने की भी है ताकि मौजूदा व्यापार असंतुलन को कम किया जा सके।
मैन्युफैक्चरिंग पर भारत का बड़ा दांव
भारत आने वाले वर्षों में खुद को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करना चाहता है।
इसके लिए सरकार घरेलू और विदेशी कंपनियों को भारत में उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल फोन उत्पादन में भारत पहले ही बड़ी प्रगति का दावा करता रहा है।
अब फोकस सेमीकंडक्टर, बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर उपकरण और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर है।
अगर BRICS देशों की कंपनियां भारत में उत्पादन बढ़ाती हैं तो इससे निवेश के साथ रोजगार और निर्यात भी बढ़ सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा पर भी चर्चा
BRICS देशों के पास दुनिया के बड़े ऊर्जा संसाधन मौजूद हैं।
रूस और ईरान प्रमुख तेल और गैस उत्पादक हैं, जबकि भारत और चीन विशाल ऊर्जा बाजार हैं।
इसलिए समूह के भीतर ऊर्जा सहयोग की बड़ी संभावनाएं हैं।
भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा आर्थिक वृद्धि से सीधे जुड़ी है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को बड़ी मात्रा में तेल, गैस और बिजली की जरूरत है।
भारत का जोर किफायती ऊर्जा हासिल करने के साथ रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता बढ़ाने पर भी है।
ग्लोबल साउथ की आवाज बनने की कोशिश
भारत BRICS को केवल आर्थिक मंच नहीं बल्कि ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने के साधन के रूप में भी देखता है।
नई दिल्ली लंबे समय से विश्व बैंक, IMF और संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों के बेहतर प्रतिनिधित्व की मांग करती रही है।
भारत की कोशिश BRICS को किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन में बदलने के बजाय सुधार और सहयोग का मंच बनाए रखने की है।
यही भारत और समूह के कुछ दूसरे सदस्यों के दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण अंतर भी माना जाता है।
BRICS के सामने चुनौतियां भी कम नहीं
BRICS की विशाल आबादी और अर्थव्यवस्था उसकी ताकत है, लेकिन सदस्य देशों के अलग-अलग हित बड़ी चुनौती भी हैं।
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद मौजूद है। रूस यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। ईरान के पश्चिमी देशों के साथ संबंध तनावपूर्ण हैं।
सदस्य देशों की राजनीतिक और आर्थिक प्रणालियां भी अलग हैं।
इसलिए BRICS के लिए केवल बड़े आंकड़े दिखाना पर्याप्त नहीं होगा।
समूह की असली सफलता इस बात से तय होगी कि वह व्यापार, निवेश और विकास से जुड़े कितने ठोस फैसले जमीन पर लागू कर पाता है।
भारत के लिए बड़ा अवसर
BRICS की करीब आधी वैश्विक आबादी भारत के लिए विशाल आर्थिक अवसर भी पेश करती है।
भारतीय फार्मा कंपनियां, आईटी कंपनियां, स्टार्टअप, ऑटोमोबाइल निर्माता और इंजीनियरिंग कंपनियां BRICS देशों के बाजारों में अपना कारोबार बढ़ा सकती हैं।
दूसरी तरफ इन देशों से भारत में निवेश और तकनीक आ सकती है।
अगर लॉजिस्टिक्स और भुगतान की समस्याएं कम होती हैं तो छोटे और मध्यम भारतीय उद्यमों के लिए भी इन बाजारों में पहुंच आसान हो सकती है।
मोदी के संदेश का क्या मतलब?
प्रधानमंत्री मोदी का भारत की ग्रोथ पर भरोसा जताने वाला संदेश ऐसे समय महत्वपूर्ण है जब दुनिया आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितता से गुजर रही है।
BRICS में दुनिया की लगभग आधी आबादी होने का मतलब है कि यहां लिए जाने वाले आर्थिक फैसलों का प्रभाव केवल सदस्य देशों तक सीमित नहीं रहेगा।
भारत इस विशाल मंच पर खुद को तेजी से बढ़ती, डिजिटल रूप से सक्षम और निवेश के लिए आकर्षक अर्थव्यवस्था के रूप में पेश करना चाहता है।
अब निगाहें मुख्य BRICS Leaders' Summit पर हैं, जहां स्टार्टअप नेटवर्क, सप्लाई चेन सहयोग और दूसरे आर्थिक प्रस्तावों को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है।
भारत के लिए लक्ष्य साफ है—**BRICS की विशाल आबादी को केवल आंकड़ा न रहने देकर उसे व्यापार, निवेश, रोजगार और विकास के अवसरों में बदला जाए।**
अगर सदस्य देश इस दिशा में ठोस कदम उठाते हैं तो विस्तारित BRICS आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में और महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।