नई दिल्ली। तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु की उस अर्जी पर सुनवाई की, जिसमें राज्य ने कावेरी जल में अपने हिस्से की आपूर्ति में कथित कमी को पूरा करने की मांग की है। तमिलनाडु ने अदालत में करीब 20 TMC पानी की कमी होने का दावा किया, जबकि कर्नाटक ने कहा कि वह खुद सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहा है। सुनवाई के बाद अदालत ने कर्नाटक से तमिलनाडु की अर्जी पर जवाब मांगा है।
मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने की। तमिलनाडु की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन पेश हुए, जबकि कर्नाटक की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने दलीलें रखीं। दोनों राज्यों ने पानी की उपलब्धता, मानसून की स्थिति, फसलों की जरूरत और अब तक छोड़े गए पानी को लेकर अलग-अलग आंकड़े और तर्क अदालत के सामने रखे।
तमिलनाडु की ओर से वैद्यनाथन ने कहा कि पानी की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने के कारण राज्य की पुरवाई फसल प्रभावित हुई है। उन्होंने अदालत को बताया कि तमिलनाडु केवल पहले से तय जल बंटवारे के अनुपात को लागू कराने की मांग कर रहा है। राज्य का दावा है कि उसे निर्धारित अनुपात के अनुसार पानी नहीं मिल रहा और इसी कारण कृषि क्षेत्र पर असर पड़ा है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने तमिलनाडु से पूछा कि उसके मुताबिक पानी की वास्तविक कमी कितनी है। इस पर वैद्यनाथन ने करीब 20 TMC की कमी होने का दावा किया। उन्होंने कहा कि कर्नाटक के मुताबिक यह आंकड़ा करीब 16 TMC है। तमिलनाडु ने कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के समक्ष भी पानी की कमी का मुद्दा उठाने की बात कही। उसका आरोप है कि कथित घाटे की भरपाई को लेकर पर्याप्त निर्देश नहीं दिए गए।
तमिलनाडु का कहना है कि मानसून के पीछे हटने के बाद स्थिति और गंभीर हो सकती है। राज्य ने अदालत से आग्रह किया कि पहले की कमी को पूरा करने के लिए उचित निर्देश दिए जाएं। तमिलनाडु ने हाल में सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए कर्नाटक से बिलिगुंडुलु में निर्धारित मात्रा में पानी का प्रवाह सुनिश्चित करने और जून से सितंबर के बीच हुए कथित जल घाटे की भरपाई की मांग की थी।
दूसरी ओर कर्नाटक ने तमिलनाडु के आरोपों का विरोध किया। वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि कर्नाटक स्वयं सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहा है और इसके बावजूद CWMA के निर्देशों के अनुसार पानी छोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण एक विशेषज्ञ निकाय है, जो जलाशयों की स्थिति, बारिश, पानी की उपलब्धता और दोनों राज्यों की जरूरतों जैसे पहलुओं की नियमित समीक्षा करता है।
कर्नाटक की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि दक्षिण-पश्चिम मानसून के पीछे हटने के बाद उसके कावेरी बेसिन में आगे बारिश की संभावना सीमित है, जबकि तमिलनाडु को उत्तर-पूर्व मानसून से बारिश मिलने की संभावना रहती है। कर्नाटक ने अदालत में कहा कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद उसने प्राधिकरण के निर्देशों का पालन किया है। इससे पहले भी कर्नाटक ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया था कि कुछ दिनों में उसने निर्धारित मात्रा से अधिक पानी छोड़ा।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्यों के तर्क सुने और पानी की कथित कमी के मुद्दे पर कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण की भूमिका का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि तमिलनाडु ने पानी के घाटे को लेकर शिकायत उठाई है और इस मुद्दे पर प्राधिकरण को विचार करना होगा। अदालत ने फिलहाल कर्नाटक से तमिलनाडु की अर्जी पर जवाब दाखिल करने को कहा है। मौजूदा व्यवस्था इस बीच जारी रहेगी। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।
कावेरी जल विवाद दशकों से कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच संवेदनशील मुद्दा रहा है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी जल बंटवारे पर फैसला देते हुए दोनों राज्यों के लिए जल आवंटन व्यवस्था में बदलाव किया था। उस फैसले में अदालत ने कृषि क्षेत्र, फसलों की पानी की जरूरत, वर्षा के पैटर्न और कर्नाटक में सूखे की परिस्थितियों सहित कई कारकों पर विचार किया था।
इस सप्ताह कावेरी से जुड़ा एक अन्य मामला भी सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था। 22 सितंबर को अदालत ने एक संस्था की उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था, जिसमें तमिलनाडु के हिस्से से 70 TMC पानी कर्नाटक को फिर से आवंटित करने की मांग की गई थी। अदालत ने कहा था कि दोनों राज्य पहले से ही जल विवाद को लेकर संबंधित मंचों पर अपना पक्ष रख रहे हैं।
अब तमिलनाडु की मौजूदा अर्जी में मुख्य विवाद कथित जल घाटे की मात्रा और उसकी भरपाई को लेकर है। एक तरफ तमिलनाडु फसल नुकसान का हवाला देकर अपने हिस्से का पानी मांग रहा है, वहीं दूसरी ओर कर्नाटक अपने बेसिन में सूखे जैसी स्थिति और सीमित जल उपलब्धता का तर्क दे रहा है। सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक का जवाब दाखिल होने के बाद मामले में आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
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