नई दिल्ली: वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में बच्चे का पैटरनिटी टेस्ट यानी डीएनए जांच कराया जा सकता है। हालांकि, यह जांच हर मामले में सामान्य प्रक्रिया के तौर पर नहीं कराई जा सकती, बल्कि इसके लिए ठोस कारण और न्यायिक आवश्यकता होना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे की पहचान, माता-पिता के अधिकार और निजता जैसे
महत्वपूर्ण पहलुओं
के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। अदालत ने कहा कि यदि किसी वैवाहिक विवाद में बच्चे की पितृत्व स्थिति ही मुख्य मुद्दा बन जाए और बिना वैज्ञानिक जांच के विवाद का समाधान संभव न हो, तो अदालत डीएनए टेस्ट का आदेश दे सकती है। दरअसल, भारतीय कानून में विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को पति का वैध संतान माना जाता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत यह कानूनी धारणा लागू होती है कि यदि बच्चा वैध विवाह के दौरान पैदा हुआ है तो उसे पति की संतान माना जाएगा, जब तक इसके विपरीत मजबूत प्रमाण न हों।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डीएनए टेस्ट को केवल संदेह या आरोपों के आधार पर मंजूरी नहीं दी जा सकती। अदालतों को यह देखना होगा कि क्या पितृत्व का सवाल वास्तव में विवाद का केंद्र है और क्या किसी अन्य माध्यम से इसका समाधान संभव नहीं है। बच्चे की गरिमा और सामाजिक पहचान को ध्यान में रखते हुए जांच का आदेश सावधानी से दिया जाना चाहिए।
अदालत के इस फैसले को पारिवारिक कानून के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला पति-पत्नी के अधिकारों के साथ-साथ बच्चे के हितों और निजता की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल न्याय सुनिश्चित करने के लिए किया जा सकता है, लेकिन इसे किसी पक्ष को बदनाम करने या निजी जीवन में अनावश्यक दखल के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
इस फैसले का असर तलाक, भरण-पोषण और पितृत्व से जुड़े कई मामलों पर पड़ सकता है। अब अदालतें डीएनए टेस्ट के अनुरोधों पर फैसला लेते समय मामले की गंभीरता, उपलब्ध साक्ष्यों और बच्चे के हितों को प्राथमिकता देंगी।
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