नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने फिरौती के लिए अपहरण और हत्या के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए एक व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 65B के तहत जरूरी प्रमाण पत्र के बिना पेश किए गए इलेक्ट्रॉनिक सबूत जैसे CCTV फुटेज और मोबाइल रिकॉर्ड को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने कोंडापाका श्रीधर उर्फ शेखर, मधु, गोपी या चिन्ना की सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर गवाही और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सही तरीके से साबित नहीं किए जाने के कारण टिक नहीं पाया।
इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को अदालत में स्वीकार करने के लिए कानून में तय प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
पीठ ने कहा कि CCTV फुटेज, मोबाइल फोन रिकॉर्ड या अन्य डिजिटल साक्ष्यों को पेश करते समय एविडेंस एक्ट की धारा 65B के तहत प्रमाण पत्र आवश्यक होता है।
अगर यह प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं है तो ऐसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को भरोसेमंद सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अभियोजन की कहानी पर उठे सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए सबूतों में कई कमियां थीं।
अदालत ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दोष साबित करने के लिए अभियोजन को मजबूत और विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने होते हैं।
पीठ ने माना कि इस मामले में गवाहियों और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराना उचित नहीं था।
धारा 106 को लेकर भी कोर्ट ने दी सफाई
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि धारा 106 अभियोजन पक्ष को उसकी मूल जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती। यानी किसी घटना से जुड़े बुनियादी तथ्यों को साबित करने की जिम्मेदारी हमेशा अभियोजन की ही रहती है।
कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर आरोपी से स्पष्टीकरण मांगना उचित नहीं है कि कुछ तथ्य उसके विशेष ज्ञान में हैं।
पहले अभियुक्त को मिली थी सजा
इस मामले में कोंडापाका श्रीधर को निचली अदालत और बाद में हाईकोर्ट से दोषी ठहराया गया था। उस पर फिरौती के लिए अपहरण और हत्या जैसे गंभीर आरोप थे।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट में अपील के दौरान बचाव पक्ष ने इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की स्वीकार्यता और अभियोजन की कमजोरियों को लेकर दलीलें पेश कीं।
सुप्रीम कोर्ट ने पलटा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने सभी तथ्यों और सबूतों की समीक्षा के बाद आरोपी की सजा को रद्द कर दिया।
पीठ ने कहा कि जब अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाता तो आरोपी को इसका लाभ दिया जाना चाहिए।
इसके बाद अदालत ने कोंडापाका श्रीधर को मामले में बरी कर दिया।
डिजिटल सबूतों के मामलों में बढ़ेगी सावधानी
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आज के दौर में CCTV फुटेज, मोबाइल रिकॉर्ड, कॉल डिटेल और डिजिटल डेटा जांच का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में अदालत ने स्पष्ट किया है कि इन सबूतों को पेश करते समय कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
जांच एजेंसियों के लिए संदेश
विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से जांच एजेंसियों को डिजिटल सबूत जुटाने और उन्हें अदालत में पेश करने के तरीके को लेकर अधिक सावधानी बरतनी होगी।
सिर्फ डिजिटल रिकॉर्ड हासिल करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसे कानून के अनुसार प्रमाणित करना भी जरूरी होगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की वैधता और आपराधिक मामलों में अभियोजन की जिम्मेदारी को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।