नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि पिछले दो दशकों में भारत की जनसांख्यिकीय स्थिति (डेमोग्राफिक लैंडस्केप) में काफी बदलाव आया है। इसलिए, दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानून आज के समय में शायद उतने प्रासंगिक न रहें।
सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने गौर किया कि देश की प्रजनन दर (फर्टिलिटी रेट) में लगातार गिरावट आई है और अब यह 2.1 के 'रिप्लेसमेंट लेवल' से भी नीचे आ गई है। इससे आने वाले दशकों में आबादी के बुजुर्ग होने (एजिंग पॉपुलेशन) को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं।
जनसांख्यिकी में आए इस बदलाव को देखते हुए, कोर्ट ने उन कानूनी प्रावधानों की औचित्यता पर सवाल उठाया है, जो दो से अधिक बच्चे होने पर स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने से रोकते हैं।
यह टिप्पणी तब आई जब कोर्ट ने महाराष्ट्र की काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता को रद्द कर दिया। उन्हें तीसरे बच्चे के जन्म के बाद चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था।
उनकी अपील को स्वीकार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर अपने पुराने रुख पर फिर से विचार करने का फैसला किया है। कोर्ट ने 'जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003)' के अहम फैसले को एक बड़ी बेंच के पास पुनर्विचार के लिए भेज दिया है।
2003 के उस फैसले में, तीन जजों की बेंच ने 'हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994' के उन प्रावधानों को संवैधानिक रूप से सही ठहराया था, जिनके तहत दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर व्यक्ति को पंचायत चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर दिया जाता था।
कोर्ट ने बताया कि जब 'जावेद' मामले में फैसला आया था, तब भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) लगभग तीन बच्चे प्रति महिला थी, जिससे जनसंख्या नियंत्रण एक महत्वपूर्ण नीतिगत मुद्दा बन गया था। हालांकि, तब से जनसांख्यिकीय संकेतकों में काफी बदलाव आया है और पूरे देश में TFR लगातार गिर रहा है।
इन बदलावों को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब एक बड़ी बेंच यह तय करेगी कि क्या चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले ऐसे प्रावधान आज भी संवैधानिक रूप से वैध और प्रासंगिक हैं—खासकर ऐसे देश में जहां जनसंख्या वृद्धि काफी धीमी हो गई है और आबादी के बुजुर्ग होने को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।