नई दिल्ली : पंजाब में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के बीच संभावित गठबंधन को लेकर सियासी चर्चाएं तेज हो गई हैं। दोनों दलों के बीच गठबंधन की अटकलों ने पंजाब की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। हालांकि बीजेपी की ओर से फिलहाल इन खबरों को खारिज किया जा रहा है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और पंजाब बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने स्पष्ट किया है कि पार्टी फिलहाल पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। इसके बावजूद राजनीतिक घटनाक्रम और दोनों दलों के नेताओं के बीच बढ़ती नजदीकी को देखते हुए गठबंधन की संभावनाओं पर चर्चा जारी है।
इन अटकलों को उस समय और बल मिला जब संसद परिसर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के बीच करीब 10 मिनट तक मुलाकात हुई। यह मुलाकात करीब छह साल बाद दोनों नेताओं के बीच हुई प्रत्यक्ष राजनीतिक बातचीत के तौर पर देखी जा रही है। कृषि कानूनों को लेकर वर्ष 2020 में दोनों दलों के रिश्तों में आई दूरी के बाद यह मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
सितंबर 2020 में कृषि कानूनों के विरोध के बीच अकाली दल ने बीजेपी के साथ करीब 24 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया था। इसके बाद दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़े। वर्ष 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने स्वतंत्र रूप से चुनावी मैदान में उतरकर अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश की। हालांकि दोनों ही पार्टियों को इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिला।
अकाली दल इस समय अपने सबसे कठिन राजनीतिक दौर से गुजर रहा है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 56 सीटें जीती थीं और उसका वोट शेयर करीब 34.73 प्रतिशत था। 2017 में पार्टी की सीटें घटकर 15 रह गईं। 2022 में अकेले चुनाव लड़ने पर उसे सिर्फ तीन विधानसभा सीटों पर जीत मिली और वोट शेयर करीब 18.38 प्रतिशत रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी और उसका वोट शेयर लगभग 13.48 प्रतिशत रहा।
अकाली दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक पंथिक और ग्रामीण वोट बैंक को मजबूत बनाए रखने की है। पार्टी को शहरी क्षेत्रों में भी अपना प्रभाव बढ़ाने की जरूरत है। ऐसे में बीजेपी के साथ संभावित गठबंधन अकाली दल के लिए राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
दूसरी ओर बीजेपी ने पंजाब में पिछले कुछ चुनावों के दौरान अपना वोट शेयर बढ़ाया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर करीब 18.65 प्रतिशत रहा, हालांकि वह कोई लोकसभा सीट जीतने में सफल नहीं रही। बीजेपी का प्रभाव मुख्य रूप से शहरी इलाकों में माना जाता है, जबकि ग्रामीण पंजाब में उसकी पकड़ अपेक्षाकृत कमजोर रही है। ऐसे में अकाली दल के साथ संभावित तालमेल बीजेपी को ग्रामीण और सिख मतदाताओं तक पहुंच बनाने में मदद कर सकता है।
संभावित गठबंधन को लेकर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस भी बीजेपी तथा अकाली दल पर निशाना साध रहे हैं। पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को आशंका है कि अगर बीजेपी और अकाली दल एक साथ चुनाव मैदान में उतरते हैं तो विरोधी वोटों का बंटवारा कम हो सकता है। इससे चुनावी मुकाबला अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। वहीं कांग्रेस भी अकाली दल के रुख और केंद्र सरकार के साथ उसके हालिया राजनीतिक तालमेल पर सवाल उठा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात के बाद अकाली दल का महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों पर केंद्र सरकार के पक्ष में खड़ा होना भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना। हालांकि इन घटनाक्रमों को सीधे गठबंधन से जोड़ने पर दोनों दलों की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
बीजेपी नेताओं का सार्वजनिक रूप से अकेले चुनाव लड़ने का बयान भी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी 117 विधानसभा सीटों पर संगठन को मजबूत करने और अपने आधार का विस्तार करने की तैयारी का दावा कर रही है। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी परिस्थितियों के अनुसार भविष्य में दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे या गठबंधन को लेकर बातचीत की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।
पंजाब की राजनीति में बीजेपी का शहरी आधार और अकाली दल का ग्रामीण-पंथिक आधार अगर एक साथ आता है तो दोनों दलों के लिए नया चुनावी समीकरण बन सकता है। हालांकि गठबंधन की राह आसान नहीं होगी। सीटों का बंटवारा, नेतृत्व का सवाल, किसान मुद्दे और दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच लंबे समय से बनी दूरी जैसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।
फिलहाल बीजेपी सार्वजनिक रूप से अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कह रही है, जबकि अकाली दल की ओर से भी गठबंधन को लेकर कोई अंतिम घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात तथा उसके बाद सामने आए राजनीतिक घटनाक्रमों ने पंजाब की चुनावी राजनीति में अटकलों को जरूर तेज कर दिया है। आने वाले महीनों में दोनों दलों के रुख और राजनीतिक गतिविधियों से यह स्पष्ट होगा कि यह मुलाकात केवल शिष्टाचार तक सीमित रहती है या पंजाब में एक नए राजनीतिक गठबंधन की नींव रखती है।