नई दिल्ली। भारत में स्लॉथ बियर यानी भालू की एक खास प्रजाति के संरक्षण को लेकर नई रिपोर्ट में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) की ‘भारत में स्लॉथ बियर अभयारण्यों की संरक्षण स्थिति रिपोर्ट’ के मुताबिक, देश के 23 राज्यों में स्लॉथ बियर की मौजूदगी दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर मध्य और पश्चिमी भारत को स्लॉथ बियर का प्रमुख क्षेत्र माना गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में स्लॉथ बियर की आबादी से जुड़े आंकड़े अलग-अलग क्षेत्रों में बिखरे हुए हैं। इसके पीछे कई कारण हैं। अलग-अलग इलाकों में निगरानी और सर्वेक्षण के तरीके समान नहीं होने के कारण देश में इनकी कुल संख्या का एक स्पष्ट और एकीकृत अनुमान तैयार करना चुनौतीपूर्ण है।
भारत में भालू की चार प्रजातियां
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में भालू की कुल चार प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें स्लॉथ बियर, हिमालयन ब्राउन बियर, एशियाई ब्लैक बियर और मलयन सन बियर शामिल हैं।
इन चारों में स्लॉथ बियर की अपनी अलग पहचान है। यह प्रजाति भारतीय उपमहाद्वीप की मूल निवासी मानी जाती है। इसका प्राकृतिक आवास मुख्य रूप से जंगलों और ऐसे क्षेत्रों में रहा है, जहां इसे भोजन और सुरक्षित आश्रय मिल सके।
स्लॉथ बियर की मौजूदगी मध्य और पश्चिमी भारत के कई हिस्सों में दर्ज की गई है। इन क्षेत्रों में जंगलों और अन्य प्राकृतिक आवासों के अलावा ऐसे इलाके भी शामिल हैं, जहां मानव आबादी और वन क्षेत्र एक-दूसरे के करीब हैं। यही स्थिति कई बार मानव-वन्यजीव संघर्ष की वजह भी बनती है।
आवास खत्म होना सबसे बड़ी चुनौती
रिपोर्ट में स्लॉथ बियर के संरक्षण से जुड़ी कई गंभीर चुनौतियों का उल्लेख किया गया है। इनमें सबसे प्रमुख समस्या प्राकृतिक आवास का खत्म होना है। जंगलों और प्राकृतिक क्षेत्रों में बदलाव होने से स्लॉथ बियर के लिए उपलब्ध सुरक्षित क्षेत्र लगातार प्रभावित हो रहे हैं।
मानवीय गतिविधियों के बढ़ते दबाव और जमीन के उपयोग में बदलाव के कारण वन क्षेत्रों का स्वरूप बदल रहा है। कई जगहों पर जंगलों के बीच संपर्क टूटने से स्लॉथ बियर के आने-जाने के प्राकृतिक रास्ते भी बाधित हो रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, संरक्षित क्षेत्रों के बाहर भूमि उपयोग में बदलाव ने इन जानवरों के आवास को नुकसान पहुंचाया है। इससे न केवल उनके रहने के स्थान कम हुए हैं, बल्कि एक इलाके से दूसरे इलाके तक जाने के लिए इस्तेमाल होने वाले गलियारे भी प्रभावित हुए हैं।
जंगलों का बंटना भी खतरा
स्लॉथ बियर के लिए केवल जंगल का मौजूद रहना पर्याप्त नहीं है। उनके आवास का अलग-अलग छोटे हिस्सों में बंट जाना भी एक गंभीर समस्या है। सड़क, निर्माण गतिविधियां, कृषि विस्तार और अन्य मानवीय गतिविधियां वन क्षेत्रों को आपस में अलग कर सकती हैं।
ऐसे में वन्यजीवों की आवाजाही प्रभावित होती है। भोजन, पानी और प्रजनन के लिए आवश्यक क्षेत्रों तक पहुंचने में उन्हें अधिक दूरी तय करनी पड़ सकती है। इससे उनके लिए इंसानी आबादी के करीब जाने का जोखिम भी बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों के लिए यह चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि प्राकृतिक आवास के बंटने से मानव और स्लॉथ बियर के बीच संपर्क की संभावना बढ़ सकती है। इससे दोनों पक्षों के लिए खतरा पैदा होता है।
अवैध शिकार की चुनौती
रिपोर्ट में स्लॉथ बियर के लिए अवैध शिकार को भी गंभीर खतरा बताया गया है। इसमें कहा गया है कि हाल के दशकों में उनके शरीर के विभिन्न अंगों के लिए शिकार किए जाने की घटनाएं सामने आई हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, स्लॉथ बियर के पंजे, पित्त और मांस जैसे हिस्सों के लिए उनका अवैध शिकार किया जाता है। वन्यजीवों के अवैध व्यापार और शिकार की गतिविधियां इनकी आबादी के संरक्षण के प्रयासों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
इस तरह के शिकार को रोकने के लिए प्रभावी निगरानी, कानून का कड़ाई से पालन और वन क्षेत्रों में गश्त बढ़ाना जरूरी माना जाता है। इसके साथ ही स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी संरक्षण के प्रयासों में महत्वपूर्ण हो सकती है।
संरक्षित क्षेत्रों के बाहर भी संरक्षण जरूरी
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि स्लॉथ बियर के संरक्षण को केवल राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों तक सीमित नहीं किया जा सकता। चूंकि इनकी मौजूदगी संरक्षित क्षेत्रों के बाहर भी दर्ज की गई है, इसलिए ऐसे क्षेत्रों में भी इनके आवास और आवाजाही के रास्तों की सुरक्षा जरूरी है।
वन क्षेत्र से बाहर जमीन के इस्तेमाल में बदलाव का असर सीधे इन जानवरों पर पड़ सकता है। इसलिए विकास योजनाओं में वन्यजीव गलियारों और प्राकृतिक आवास को ध्यान में रखना आवश्यक है।
स्लॉथ बियर के लिए सुरक्षित गलियारे बनाए रखने से उन्हें एक वन क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने में मदद मिल सकती है। इससे मानव बस्तियों के बीच से गुजरने की जरूरत भी कम हो सकती है।
आंकड़ों की बेहतर निगरानी की जरूरत
रिपोर्ट में आबादी के अनुमानों के बिखरे होने की बात भी सामने आई है। इसका अर्थ है कि अलग-अलग क्षेत्रों में स्लॉथ बियर की संख्या और स्थिति को लेकर उपलब्ध जानकारी एक समान नहीं है।
ऐसे में वैज्ञानिक तरीके से नियमित सर्वेक्षण और निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों से प्राप्त आंकड़ों को एक साथ जोड़ा जाए तो स्लॉथ बियर की आबादी, उसके वितरण और खतरों की बेहतर तस्वीर सामने आ सकती है।
इसके आधार पर संरक्षण योजनाओं को भी अधिक प्रभावी ढंग से तैयार किया जा सकेगा। विशेष रूप से उन इलाकों की पहचान की जा सकती है जहां स्लॉथ बियर की संख्या अधिक है या जहां उनके आवास पर मानवीय दबाव तेजी से बढ़ रहा है।
कानून के तहत उच्च सुरक्षा
स्लॉथ बियर को भारत में मजबूत कानूनी संरक्षण हासिल है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रजाति को वाइल्डलाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट की अनुसूची 1 में शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि इस प्रजाति के संरक्षण के लिए कानून के तहत कड़े प्रावधान लागू हैं।
इसके बावजूद अवैध शिकार, आवास का नुकसान और मानव गतिविधियों का दबाव जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे में कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ-साथ संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर जागरूकता और भागीदारी बढ़ाना जरूरी है।
संरक्षण के लिए समन्वित प्रयास जरूरी
स्लॉथ बियर भारत की प्राकृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। देश के 23 राज्यों में इसकी मौजूदगी यह बताती है कि इसके संरक्षण की रणनीति व्यापक स्तर पर तैयार करने की जरूरत है।
रिपोर्ट में सामने आई चुनौतियों को देखते हुए आवास संरक्षण, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा, अवैध शिकार पर रोक और नियमित आबादी निगरानी को प्राथमिकता देना महत्वपूर्ण होगा। इसके साथ ही स्थानीय समुदायों को संरक्षण गतिविधियों से जोड़ना भी जरूरी है।
स्लॉथ बियर के प्राकृतिक आवासों पर बढ़ता दबाव केवल एक वन्यजीव प्रजाति के लिए चिंता का विषय नहीं है, बल्कि यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा है। इसलिए वैज्ञानिक अध्ययन और जमीनी संरक्षण प्रयासों के बीच बेहतर तालमेल बनाकर ही इस प्रजाति के भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है।