नई दिल्ली। सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए कथित तौर पर बाल यौन शोषण सामग्री बेचने से जुड़े मामले ने साइबर अपराध के खतरनाक स्वरूप को एक बार फिर सामने ला दिया है। जांच में सामने आए आरोपों के मुताबिक एक महिला टेलीग्राम के जरिए ग्राहकों से संपर्क करती थी और प्रतिबंधित सामग्री उपलब्ध कराने के बदले उनसे पैसे लेती थी। मामले का खुलासा होने के बाद जांच एजेंसियां अब उसके डिजिटल नेटवर्क, ग्राहकों और पैसों के लेनदेन की कड़ियां खंगाल रही हैं।
मामला बेहद संवेदनशील है क्योंकि आरोप बच्चों से जुड़ी यौन शोषण सामग्री के प्रसार और कथित व्यावसायिक नेटवर्क से संबंधित हैं। ऐसी सामग्री को सामान्य ‘पोर्न वीडियो’ कहना अपराध की गंभीरता को कम करके दिखा सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए Child Sexual Abuse Material यानी CSAM शब्द इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि इसमें बच्चों के वास्तविक या कथित यौन शोषण से संबंधित सामग्री शामिल हो सकती है।
जांच एजेंसियों के सामने अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि महिला तक यह सामग्री कहां से पहुंचती थी, उसके ग्राहक कौन थे, कितने समय से नेटवर्क चल रहा था और क्या इसमें अन्य लोग भी शामिल थे।
टेलीग्राम के जरिए ग्राहकों तक पहुंचने का आरोप
जांच में आरोप है कि महिला मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम का इस्तेमाल संभावित ग्राहकों से संपर्क स्थापित करने के लिए करती थी।
ऐसे मामलों में साइबर अपराधी अक्सर सार्वजनिक सोशल मीडिया अकाउंट से लोगों को निजी मैसेजिंग ऐप या बंद ग्रुप की ओर ले जाने की कोशिश करते हैं। वहां बातचीत के बाद भुगतान और सामग्री साझा करने की प्रक्रिया शुरू की जाती है।
पुलिस अब संबंधित अकाउंट और चैनलों की डिजिटल गतिविधियों की जांच कर सकती है।
अकाउंट कब बनाया गया, किन लोगों से संपर्क किया गया, किन डिवाइस से लॉगिन हुआ और कितने लोगों के साथ लेनदेन हुआ—ये सभी सवाल जांच के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
पैसे लेकर सामग्री उपलब्ध कराने का आरोप
महिला पर प्रतिबंधित सामग्री को पैसे लेकर उपलब्ध कराने का आरोप है।
अगर जांच में व्यावसायिक लेनदेन साबित होता है तो यह मामला केवल अवैध सामग्री रखने तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि उसके प्रसार और बिक्री से जुड़े नेटवर्क की जांच भी जरूरी होगी।
साइबर पुलिस डिजिटल भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड की जांच कर सकती है। बैंक खाते, UPI लेनदेन और अन्य भुगतान माध्यमों से यह पता लगाया जा सकता है कि किस-किस व्यक्ति ने पैसे भेजे।
इन रिकॉर्ड के आधार पर कथित ग्राहकों की पहचान तक पहुंचने में भी मदद मिल सकती है।
ग्राहक भी आ सकते हैं जांच के दायरे में
ऐसे मामलों में केवल सामग्री बेचने वाला व्यक्ति ही जांच का केंद्र नहीं होता।
अगर किसी व्यक्ति ने जानबूझकर बच्चों से जुड़ी यौन शोषण सामग्री खरीदी, हासिल की, संग्रहित की या आगे साझा की है तो उसकी भूमिका भी कानून के दायरे में जांची जा सकती है।
यही कारण है कि जांच एजेंसियां महिला के संपर्कों की सूची और डिजिटल भुगतान रिकॉर्ड को महत्वपूर्ण मान सकती हैं।
किसी अकाउंट से बातचीत होना अपने आप अपराध साबित नहीं करता। लेकिन भुगतान, चैट और डिजिटल सामग्री जैसे साक्ष्य एक-दूसरे से मेल खाते हैं तो संबंधित व्यक्ति से पूछताछ की जा सकती है।
मोबाइल फोन बन सकता है सबसे बड़ा सबूत
साइबर अपराध के मामलों में मोबाइल फोन और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित होते हैं।
अगर पुलिस ने आरोपी महिला का फोन या कंप्यूटर जब्त किया है तो उसे फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा जा सकता है।
डिजिटल फॉरेंसिक विशेषज्ञ डिलीट किए गए डेटा, चैट हिस्ट्री, मीडिया फाइल, क्लाउड अकाउंट और लॉगिन से जुड़ी जानकारी हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं।
कई बार आरोपी गिरफ्तारी या जांच से पहले डेटा डिलीट कर देते हैं। इसके बावजूद कुछ डिजिटल निशान डिवाइस या संबंधित सेवाओं के रिकॉर्ड में मौजूद रह सकते हैं।
नेटवर्क कहां तक फैला था?
जांच का बड़ा हिस्सा इस सवाल पर केंद्रित रहेगा कि महिला अकेले काम कर रही थी या किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा थी।
अगर सामग्री किसी दूसरे व्यक्ति से मिल रही थी तो उसके मूल स्रोत तक पहुंचना महत्वपूर्ण होगा।
पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि सामग्री भारत में मौजूद किसी नेटवर्क से हासिल की जा रही थी या विदेशी ऑनलाइन स्रोतों से।
अगर दूसरे राज्यों या देशों से जुड़े डिजिटल कनेक्शन सामने आते हैं तो जांच का दायरा और बड़ा हो सकता है।
दो शादियों की निजी जिंदगी भी चर्चा में
मामला सामने आने के बाद आरोपी महिला की निजी जिंदगी से जुड़ी जानकारियां भी मीडिया रिपोर्टों में चर्चा का विषय बनी हैं।
बताया जा रहा है कि महिला की दो बार शादी हुई थी और दोनों वैवाहिक रिश्ते बाद में खत्म हो गए।
हालांकि किसी व्यक्ति की शादी या वैवाहिक संबंधों का टूटना अपने आप में उसके कथित अपराध से कोई संबंध स्थापित नहीं करता।
जांच की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य वही होंगे जो कथित अपराध, डिजिटल नेटवर्क, पैसों के लेनदेन और प्रतिबंधित सामग्री के प्रसार से सीधे जुड़े हों।
आरोपी के निजी संबंधों को अपराध का कारण मानना तब तक उचित नहीं होगा जब तक जांच में कोई स्पष्ट संबंध सामने न आए।
साइबर पुलिस के लिए चुनौती
इंटरनेट पर बाल यौन शोषण सामग्री का प्रसार दुनिया भर की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए गंभीर चुनौती है।
एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग, फर्जी नाम, अस्थायी अकाउंट और बंद ऑनलाइन समूह अपराधियों के लिए अपनी पहचान छिपाना आसान बना सकते हैं।
इसके बावजूद डिजिटल दुनिया में कई गतिविधियां तकनीकी निशान छोड़ती हैं।
मोबाइल नंबर, IP लॉग, बैंक ट्रांजैक्शन, डिवाइस की जानकारी और अकाउंट रिकवरी से जुड़े डेटा जांच में मदद कर सकते हैं।
टेलीग्राम क्यों आता है चर्चा में?
टेलीग्राम पर सार्वजनिक और निजी दोनों तरह के चैनल तथा समूह बनाए जा सकते हैं। बड़ी संख्या में लोगों तक सामग्री पहुंचाने की क्षमता के कारण इसका इस्तेमाल सामान्य और वैध उद्देश्यों के लिए व्यापक रूप से होता है।
लेकिन दूसरे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की तरह इसका भी दुरुपयोग अपराधी कर सकते हैं।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल अपराध के लिए होना और प्लेटफॉर्म का स्वयं उस अपराध में शामिल होना अलग बातें हैं।
जांच एजेंसियों का ध्यान उन व्यक्तियों और समूहों पर रहता है जो तकनीक का इस्तेमाल गैरकानूनी गतिविधियों के लिए करते हैं।
डिजिटल भुगतान से खुल सकती है पूरी चेन
अगर कथित सामग्री के बदले ऑनलाइन भुगतान लिया गया था तो लेनदेन का रिकॉर्ड जांच के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है।
UPI या बैंक खाते के जरिए हुए भुगतान से तारीख, रकम और संबंधित खातों की जानकारी मिल सकती है।
इसके बाद पुलिस भुगतान करने वाले व्यक्तियों की पहचान कर सकती है और उनके मोबाइल या अन्य डिजिटल उपकरणों की भूमिका की जांच कानूनी प्रक्रिया के तहत कर सकती है।
इससे कथित विक्रेता से लेकर खरीदार तक पूरी चेन सामने आने की संभावना रहती है।
फर्जी पहचान का भी हो सकता है इस्तेमाल
ऑनलाइन अपराधों में आरोपी अक्सर वास्तविक नाम और तस्वीर का इस्तेमाल नहीं करते।
फर्जी प्रोफाइल, दूसरे लोगों की तस्वीर और अस्थायी मोबाइल नंबर का इस्तेमाल पहचान छिपाने के लिए किया जा सकता है।
इसी कारण किसी सोशल मीडिया प्रोफाइल के नाम को देखकर यह मान लेना सही नहीं होता कि वही व्यक्ति अकाउंट चला रहा था।
तकनीकी जांच के जरिए यह स्थापित करना पड़ता है कि अकाउंट वास्तव में किस व्यक्ति के नियंत्रण में था।
POCSO कानून में सख्त प्रावधान
भारत में बच्चों से जुड़ी यौन शोषण सामग्री को लेकर कानून बेहद सख्त है।
Protection of Children from Sexual Offences यानी POCSO Act में बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री के इस्तेमाल और प्रसार से जुड़े अपराधों के लिए प्रावधान हैं।
इसके अलावा सूचना प्रौद्योगिकी कानून के प्रासंगिक प्रावधान भी लागू हो सकते हैं।
मामले में वास्तव में कौन-कौन सी धाराएं लगेंगी यह पुलिस द्वारा जुटाए गए साक्ष्य और आरोपों की प्रकृति पर निर्भर करेगा।
सामग्री को डाउनलोड या शेयर करना खतरनाक
ऐसी किसी सामग्री के बारे में जानकारी मिलने पर उसे ‘सबूत’ के नाम पर अपने फोन में डाउनलोड या किसी दूसरे व्यक्ति को फॉरवर्ड नहीं करना चाहिए।
ऐसा करने से प्रतिबंधित सामग्री का प्रसार और बढ़ सकता है और कानूनी समस्या भी पैदा हो सकती है।
सही तरीका है कि संबंधित पोस्ट, अकाउंट, चैनल या लिंक की जानकारी सक्षम साइबर अपराध एजेंसी को रिपोर्ट की जाए।
सामग्री को सोशल मीडिया पर दोबारा पोस्ट करके आरोपी को उजागर करने की कोशिश भी नुकसानदायक हो सकती है क्योंकि इससे पीड़ित बच्चों का शोषण और व्यापक होता है।
बच्चों की पहचान की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण
बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़े मामलों में पीड़ित बच्चों की पहचान पूरी तरह सुरक्षित रखी जानी चाहिए।
किसी तस्वीर, वीडियो, स्क्रीनशॉट या दूसरी जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए जिससे बच्चे की पहचान सामने आ सकती हो।
यह जिम्मेदारी मीडिया संस्थानों पर भी लागू होती है।
समाचार प्रकाशित करते समय अपराध और जांच से जुड़े तथ्य बताए जा सकते हैं लेकिन सामग्री का ग्राफिक विवरण देना या पीड़ित बच्चों की पहचान से जुड़ी जानकारी प्रकाशित करना उचित नहीं है।
मूल स्रोत तक पहुंचना बड़ी चुनौती
अगर महिला कथित तौर पर सामग्री बेच रही थी तो सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उसे यह सामग्री मिली कहां से।
अगर वह खुद सामग्री तैयार नहीं कर रही थी तो किसी दूसरे स्रोत से उसे हासिल किया गया होगा।
इस स्थिति में जांच एजेंसियों के लिए सप्लाई चेन का पता लगाना बेहद जरूरी हो जाता है।
मूल स्रोत तक पहुंचने से संभव है कि एक बड़े नेटवर्क का खुलासा हो और अन्य आरोपियों की पहचान की जा सके।
अंतरराज्यीय नेटवर्क की भी हो सकती है जांच
डिजिटल अपराध किसी एक शहर या राज्य की सीमा में नहीं रहते।
एक व्यक्ति एक राज्य में बैठकर दूसरे राज्य या देश के लोगों से संपर्क कर सकता है। भुगतान कहीं और से हो सकता है और सर्वर किसी तीसरे देश में मौजूद हो सकता है।
अगर जांच में ऐसे कनेक्शन मिलते हैं तो अलग-अलग राज्यों की पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय की जरूरत पड़ सकती है।
विदेश से जुड़ा मामला होने पर निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए संबंधित जानकारी मांगी जा सकती है।
बैंक खातों पर भी नजर
पुलिस कथित अपराध से जुड़े बैंक खातों और डिजिटल वॉलेट की जांच कर सकती है।
इससे यह अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है कि गतिविधि कितने समय से चल रही थी और कितनी रकम का लेनदेन हुआ।
अगर किसी दूसरे व्यक्ति के खाते का इस्तेमाल किया गया हो तो उसकी भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी।
हालांकि केवल खाते में पैसा आने से किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता। जांच में यह स्थापित करना जरूरी होगा कि संबंधित व्यक्ति को लेनदेन के उद्देश्य की जानकारी थी या नहीं।
ऑनलाइन गुमनामी पूरी तरह सुरक्षित नहीं
साइबर अपराध करने वाले कई लोगों को लगता है कि फर्जी नाम या निजी चैट इस्तेमाल करने से उनकी पहचान कभी सामने नहीं आएगी।
लेकिन डिजिटल जांच में कई तरह के साक्ष्य एक-दूसरे से जोड़े जा सकते हैं।
डिवाइस, भुगतान रिकॉर्ड, मोबाइल नंबर और लॉगिन गतिविधियों से जांचकर्ता किसी अकाउंट के वास्तविक संचालक तक पहुंचने की कोशिश करते हैं।
यही वजह है कि ऑनलाइन गुमनामी को पूर्ण सुरक्षा समझना गलत है।
आरोपी के पुराने डिजिटल रिकॉर्ड की जांच
जांच एजेंसियां यह भी पता लगा सकती हैं कि आरोपी महिला इससे पहले किन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय थी।
क्या उसके पुराने अकाउंट बंद किए गए थे, क्या उसने अलग-अलग नामों से प्रोफाइल बनाई और क्या पहले किसी व्यक्ति ने उसके खिलाफ शिकायत की थी—ये सवाल जांच का हिस्सा हो सकते हैं।
पुराने मोबाइल नंबर और ईमेल अकाउंट से भी महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।
अगर गतिविधि लंबे समय से चल रही थी तो पुराने डिजिटल रिकॉर्ड नेटवर्क का दायरा समझने में मदद कर सकते हैं।
अपराध से कमाई की जांच
अगर आरोप है कि प्रतिबंधित सामग्री बेचकर पैसे कमाए जा रहे थे तो जांच का एक पहलू आर्थिक लाभ भी होगा।
पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि कुल कितनी रकम प्राप्त हुई और उसका इस्तेमाल कहां किया गया।
छोटे-छोटे भुगतान अलग-अलग खातों में लिए गए हों तो उनकी चेन तैयार करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
लेकिन डिजिटल भुगतान का रिकॉर्ड जांच में महत्वपूर्ण सुराग दे सकता है।
खरीदारों की पहचान पर नजर
मामले में कथित ग्राहकों की पहचान सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक होगी।
अगर बड़ी संख्या में लोग नेटवर्क से जुड़े पाए जाते हैं तो जांच का दायरा तेजी से बढ़ सकता है।
संबंधित व्यक्तियों के डिजिटल उपकरणों की जांच से यह भी पता चल सकता है कि सामग्री केवल खरीदी गई थी या आगे दूसरे लोगों को भी भेजी गई।
इससे नेटवर्क के अलग-अलग स्तर सामने आ सकते हैं।
जागरूकता भी जरूरी
बाल यौन शोषण सामग्री का प्रसार केवल पुलिसिंग से खत्म नहीं किया जा सकता। इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की जागरूकता भी जरूरी है।
अगर किसी सोशल मीडिया या मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर ऐसी संदिग्ध सामग्री दिखाई दे तो उसे आगे शेयर नहीं करना चाहिए।
अकाउंट को प्लेटफॉर्म पर रिपोर्ट करने के साथ साइबर अपराध अधिकारियों को सूचना दी जा सकती है।
अभिभावकों को भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और उनकी डिजिटल गतिविधियों को लेकर संवाद बनाए रखना चाहिए।
निजी जिंदगी नहीं अपराध के सबूत हैं अहम
आरोपी महिला की दो शादियों और दोनों रिश्तों के खत्म होने जैसी बातें खबर में चर्चा पैदा कर सकती हैं लेकिन आपराधिक जांच का आधार उसकी निजी जिंदगी नहीं हो सकती।
किसी व्यक्ति का तलाक, अलगाव या रिश्ते का टूटना उसके अपराधी होने का प्रमाण नहीं है।
मामले में निर्णायक तथ्य डिजिटल साक्ष्य, कथित सामग्री, चैट रिकॉर्ड, भुगतान और दूसरे तकनीकी सबूत होंगे।
यही साक्ष्य तय करेंगे कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और कथित नेटवर्क कितना बड़ा था।
जांच से खुल सकती हैं और कड़ियां
फिलहाल मामले की सबसे महत्वपूर्ण दिशा महिला के कथित डिजिटल नेटवर्क और ग्राहकों की पहचान है।
अगर उसके मोबाइल और ऑनलाइन खातों से बड़ी संख्या में संपर्क मिलते हैं तो पुलिस उनसे जुड़े रिकॉर्ड की जांच कर सकती है।
इसके साथ ही प्रतिबंधित सामग्री के मूल स्रोत का पता लगाना भी महत्वपूर्ण होगा।
मामला केवल एक आरोपी की गिरफ्तारी तक सीमित न रहकर बड़े नेटवर्क तक पहुंच सकता है, अगर जांच में ऐसे साक्ष्य सामने आते हैं।
बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़े अपराध बेहद गंभीर हैं क्योंकि हर बार ऐसी सामग्री को खरीदना, साझा करना या प्रसारित करना पीड़ित बच्चे के शोषण को आगे बढ़ाता है।
इसलिए इस मामले में सबसे अहम सवाल आरोपी की निजी जिंदगी नहीं बल्कि यह है कि कथित नेटवर्क कितना बड़ा था, सामग्री कहां से आती थी, किसे बेची जाती थी और इसके पीछे अन्य कौन लोग शामिल थे। इन सवालों के जवाब अब पुलिस की डिजिटल और वित्तीय जांच से सामने आने की उम्मीद है।
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