नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिभूति बाजार से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि बायबैक नियमों के तहत एस्क्रो राशि जारी कर दिए जाने मात्र से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा धोखाधड़ी और अनुचित व्यापार व्यवहार यानी PFUTP Regulations, 2003 के तहत की जा रही कार्यवाही अपने आप समाप्त या बाधित नहीं होती है।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि बायबैक प्रक्रिया में एस्क्रो मैकेनिज्म का उद्देश्य और दायरा अलग है, जबकि कथित धोखाधड़ी या अनुचित व्यापार व्यवहार की जांच एक स्वतंत्र नियामकीय प्रक्रिया है। इसलिए एस्क्रो से जुड़ी शर्तें पूरी हो जाने और राशि जारी किए जाने को इस आधार के तौर पर नहीं माना जा सकता कि SEBI की अलग कार्रवाई अब आगे नहीं बढ़ सकती।

एस्क्रो मैकेनिज्म और जांच का दायरा अलग

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एस्क्रो व्यवस्था और PFUTP नियमों के तहत होने वाली जांच के बीच अंतर को रेखांकित किया। अदालत के मुताबिक बायबैक से जुड़ी एस्क्रो व्यवस्था का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि प्रस्ताव से संबंधित वित्तीय दायित्वों के लिए पर्याप्त धनराशि सुरक्षित रखी जाए और नियामकीय शर्तों के अनुरूप प्रक्रिया पूरी हो।

दूसरी ओर, PFUTP नियमों के तहत जांच का उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि प्रतिभूति बाजार में किसी व्यक्ति या संस्था ने धोखाधड़ी, हेरफेर या अनुचित व्यापार व्यवहार तो नहीं किया है।

अदालत ने कहा कि दोनों प्रक्रियाओं के उद्देश्य अलग होने के कारण एक प्रक्रिया में किसी शर्त का पूरा हो जाना दूसरी प्रक्रिया को स्वतः प्रभावित नहीं करता।

एस्क्रो राशि जारी होना अंतिम निष्कर्ष नहीं

पीठ ने यह स्पष्ट किया कि एस्क्रो राशि जारी किए जाने को कथित अनियमितता या धोखाधड़ी के संबंध में अंतिम निष्कर्ष के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यदि किसी मामले में SEBI को यह संदेह या जानकारी मिलती है कि प्रतिभूति बाजार में धोखाधड़ी या अनुचित व्यापार व्यवहार हुआ है, तो वह PFUTP नियमों के तहत स्वतंत्र रूप से जांच और कार्रवाई कर सकता है।

अदालत के अनुसार एस्क्रो मैकेनिज्म के तहत आवश्यक शर्तों को पूरा करने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित पक्ष को प्रतिभूति कानूनों के तहत अन्य नियामकीय जांच से छूट मिल गई।

इसका सीधा अर्थ यह है कि किसी बायबैक प्रक्रिया के दौरान वित्तीय सुरक्षा के लिए रखी गई राशि का नियमानुसार जारी होना, बाजार में संभावित धोखाधड़ी की जांच के रास्ते में कानूनी बाधा नहीं बनता।

निवेशकों के हितों की सुरक्षा पर जोर

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी प्रतिभूति बाजार में निवेशकों के हितों की सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। SEBI को बाजार में धोखाधड़ी, हेरफेर और अनुचित व्यापार गतिविधियों पर निगरानी रखने तथा उनके खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है।

यदि किसी कंपनी या बाजार प्रतिभागी के खिलाफ बायबैक प्रक्रिया से अलग कोई कथित अनियमितता सामने आती है, तो नियामक उसके खिलाफ उपलब्ध कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई कर सकता है।

अदालत ने संकेत दिया कि नियामकीय तंत्र के अलग-अलग हिस्सों को उनके उद्देश्य के अनुरूप स्वतंत्र रूप से देखा जाना चाहिए। केवल इसलिए कि एक प्रक्रिया पूरी हो गई है, दूसरी प्रक्रिया को खत्म नहीं माना जा सकता।

PFUTP नियमों का महत्व

SEBI (Prohibition of Fraudulent and Unfair Trade Practices relating to Securities Market) Regulations, 2003 यानी PFUTP नियम प्रतिभूति बाजार में धोखाधड़ी और अनुचित व्यापार व्यवहार पर रोक लगाने के लिए बनाए गए हैं। इनका उद्देश्य बाजार की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखना तथा निवेशकों को ऐसे व्यवहार से बचाना है जो उनके हितों को नुकसान पहुंचा सकता है।

इन नियमों के तहत SEBI कथित धोखाधड़ी, बाजार में हेरफेर और अन्य अनुचित गतिविधियों की जांच कर सकता है। अदालत ने अपने फैसले में इसी स्वतंत्र नियामकीय भूमिका को महत्वपूर्ण माना है।

बायबैक प्रक्रिया में एस्क्रो की भूमिका

कंपनियों के शेयर बायबैक से जुड़ी प्रक्रिया में एस्क्रो व्यवस्था एक वित्तीय सुरक्षा तंत्र के तौर पर काम करती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि बायबैक प्रस्ताव से संबंधित निर्धारित दायित्वों को पूरा करने के लिए आवश्यक धनराशि सुरक्षित रहे।

एक बार संबंधित शर्तें पूरी होने पर एस्क्रो राशि जारी की जा सकती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया का संबंध मुख्य रूप से बायबैक से जुड़ी वित्तीय और नियामकीय शर्तों से है। इसका यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि कंपनी या संबंधित व्यक्तियों के किसी अन्य कथित कृत्य की जांच भी समाप्त हो गई।

नियामकीय कार्रवाई पर व्यापक असर

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला SEBI की जांच और प्रवर्तन शक्तियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि नियामकीय प्रक्रियाओं को केवल एक-दूसरे से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

यदि एस्क्रो से जुड़ी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, तब भी किसी कथित धोखाधड़ी या अनुचित व्यापार व्यवहार के संबंध में SEBI अपनी स्वतंत्र जांच जारी रख सकता है। इसके लिए उसे PFUTP नियमों के तहत उपलब्ध अधिकारों का इस्तेमाल करने से केवल एस्क्रो राशि जारी होने के आधार पर नहीं रोका जा सकता।

अदालत ने अलग-अलग कानूनी उद्देश्यों को माना महत्वपूर्ण

पीठ ने अपने फैसले में मूल रूप से यह अंतर स्थापित किया कि एस्क्रो मैकेनिज्म के तहत होने वाली प्रक्रिया और कथित धोखाधड़ी वाले व्यवहार की जांच दो अलग-अलग क्षेत्रों से संबंधित हैं। एक का उद्देश्य बायबैक प्रक्रिया से जुड़े वित्तीय दायित्वों की सुरक्षा है, जबकि दूसरे का मकसद प्रतिभूति बाजार में निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखना है।

इसलिए एस्क्रो राशि जारी होने की शर्तें पूरी होने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति या कंपनी को PFUTP नियमों के तहत किसी स्वतंत्र जांच से स्वतः राहत मिल जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से प्रतिभूति बाजार में नियामकीय कार्रवाई के दायरे को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता आई है। फैसले का व्यापक संदेश यही है कि बायबैक की एक प्रक्रिया पूरी हो जाने से प्रतिभूति बाजार में कथित धोखाधड़ी या अनुचित व्यापार व्यवहार की स्वतंत्र जांच पर कोई स्वतः रोक नहीं लगती।

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