नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने रविवार को पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए प्रकृति संरक्षण और पारंपरिक समुदायों के ज्ञान के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई पारंपरिक समुदायों के पास सदियों पुराना ऐसा ज्ञान मौजूद है, जो जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।राष्ट्रपति मुर्मू ने विज्ञान भवन में आयोजित **“पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता का भविष्य”** विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन समारोह में हिस्सा लिया। इस सम्मेलन का आयोजन **नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT)** की ओर से किया गया था।
आदिवासी जीवन और प्रकृति से जुड़ाव का किया जिक्र
अपने संबोधन के दौरान राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने बचपन की यादों को साझा किया। उन्होंने बताया कि दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्र में बिताए गए बचपन के अनुभवों ने उन्हें प्रकृति और पर्यावरण के प्रति गहरी समझ दी।उन्होंने कहा कि आदिवासी समाजों का जीवन प्रकृति के बेहद करीब होता है। वहां रहने वाले लोग जंगल, जल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीते हैं।राष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में आदिवासी समुदायों की सादगी, कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता और प्रकृति के प्रति उनके सम्मान को करीब से देखा है।
पारंपरिक ज्ञान की अहमियत पर जोर
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि जलवायु परिवर्तन आज पूरी दुनिया के सामने बड़ी चुनौती है। इससे निपटने के लिए आधुनिक तकनीक के साथ-साथ पारंपरिक ज्ञान को भी समझना और अपनाना जरूरी है।उन्होंने कहा कि कई पारंपरिक समुदायों ने सदियों से बदलते मौसम, प्राकृतिक आपदाओं और कठिन परिस्थितियों के बीच जीवन जीने के तरीके विकसित किए हैं।इन समुदायों का अनुभव जलवायु अनुकूल नीतियां बनाने में मददगार साबित हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन से निपटने की जरूरत
सम्मेलन में पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और भविष्य की चुनौतियों पर विशेषज्ञों ने चर्चा की। राष्ट्रपति ने कहा कि पर्यावरण की सुरक्षा केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के हर व्यक्ति की भागीदारी जरूरी है।उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार आने वाली पीढ़ियों के लिए आवश्यक है।
प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने का संदेश
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच तालमेल होना चाहिए।उन्होंने पारंपरिक समुदायों के जीवन से सीख लेने की बात कही, जहां संसाधनों का उपयोग जरूरत के अनुसार किया जाता है और प्रकृति के प्रति सम्मान बनाए रखा जाता है।
NGT सम्मेलन में विशेषज्ञों की भागीदारी
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में पर्यावरण विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया।दो दिनों तक चले इस सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण, टिकाऊ विकास और भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया गया।
पर्यावरण संरक्षण में सामूहिक प्रयास जरूरी
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव दुनिया के हर हिस्से पर पड़ रहा है। ऐसे में सभी देशों और समाजों को मिलकर काम करने की जरूरत है।उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे प्रयास भी पर्यावरण संरक्षण में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। पेड़ लगाना, जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग जैसे कदम महत्वपूर्ण हैं।
आदिवासी समुदायों से सीख लेने की अपील
राष्ट्रपति ने कहा कि आदिवासी समुदायों की जीवन शैली में प्रकृति के प्रति सम्मान और संसाधनों के संरक्षण की भावना दिखाई देती है।उन्होंने कहा कि आधुनिक समाज को भी प्रकृति के साथ बेहतर संबंध बनाने के लिए इन समुदायों के अनुभवों से सीख लेनी चाहिए।
Tags: