नई दिल्ली: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु मंगलवार को दिल्ली के द्वारका सेक्टर-10 में आयोजित 15वें रामलीला महोत्सव के विजयादशमी समारोह में शामिल हुईं। इस अवसर पर उन्होंने उपस्थित दर्शकों को संबोधित करते हुए दशहरे के धार्मिक और सामाजिक महत्व पर प्रकाश डाला। राष्ट्रपति ने कहा कि दशहरा अधर्म और अन्याय पर धर्म और न्याय की विजय का उत्सव है। यह पर्व लोगों को सत्य, नैतिकता और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
विजयादशमी के अवसर पर आयोजित इस समारोह में भगवान श्रीराम की विजय और रावण के अंत से जुड़े प्रसंगों को याद किया गया। राष्ट्रपति के संबोधन में दशहरे के उस संदेश को प्रमुखता मिली, जो भारतीय संस्कृति और परंपरा में लंबे समय से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह त्योहार लोगों को याद दिलाता है कि अन्याय और बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दें, अंततः सत्य और धर्म की विजय का आदर्श सर्वोपरि है।
अधर्म और अन्याय पर धर्म की विजय का प्रतीक है दशहरा
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अपने संबोधन में दशहरे को धर्म और न्याय की जीत का पर्व बताया। भारतीय परंपरा में विजयादशमी का विशेष महत्व है। यह त्योहार भगवान श्रीराम द्वारा रावण पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में मनाया जाता है। रामायण की कथा में भगवान श्रीराम को धर्म, मर्यादा और सत्य के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, जबकि रावण का वध अन्याय और अधर्म के अंत का प्रतीक माना जाता है।
दशहरे का संदेश केवल धार्मिक कथाओं तक सीमित नहीं है। इसे जीवन में गलत कार्यों से दूर रहने, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने और न्याय के पक्ष में खड़े होने की प्रेरणा के रूप में भी देखा जाता है। राष्ट्रपति के संबोधन में भी इसी मूल भावना को रेखांकित किया गया कि समाज में धर्म और न्याय के मूल्यों को बनाए रखना आवश्यक है।
विजयादशमी के अवसर पर देशभर में रामलीलाओं का आयोजन होता है। इनमें भगवान श्रीराम के जीवन और रावण के साथ हुए युद्ध का मंचन किया जाता है। इन आयोजनों के माध्यम से लोगों को भारतीय महाकाव्यों, धार्मिक परंपराओं और नैतिक मूल्यों से परिचित कराया जाता है।
द्वारका में आयोजित हुआ 15वां रामलीला महोत्सव
दिल्ली के द्वारका सेक्टर-10 में आयोजित 15वें रामलीला महोत्सव का विजयादशमी समारोह इस वर्ष के धार्मिक आयोजनों का हिस्सा रहा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की मौजूदगी ने कार्यक्रम को विशेष महत्व दिया। इस दौरान उन्होंने दर्शकों को संबोधित किया और दशहरे के महत्व पर अपने विचार रखे।
रामलीला महोत्सव जैसे आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रामायण के पात्रों और प्रसंगों का मंचन दर्शकों को भगवान श्रीराम के आदर्शों, उनके कर्तव्यबोध और कठिन परिस्थितियों में भी मर्यादा बनाए रखने की सीख देता है।
दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में विजयादशमी के अवसर पर रामलीला के अंतिम प्रसंगों का मंचन किया जाता है। इसके बाद रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। यह परंपरा बुराई के अंत और अच्छाई की जीत का प्रतीक है। द्वारका में आयोजित समारोह भी इसी सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा रहा।
रामलीला से नई पीढ़ी तक पहुंचते हैं नैतिक मूल्य
रामलीला भारतीय लोकनाट्य परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके माध्यम से रामायण की कथा को संवाद, अभिनय और मंचन के जरिए आम लोगों तक पहुंचाया जाता है। कई स्थानों पर रामलीला का आयोजन लंबे समय से होता आ रहा है और स्थानीय समुदाय इसमें सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
रामायण की कथा में भगवान श्रीराम का जीवन कर्तव्य, त्याग, धैर्य और मर्यादा जैसे मूल्यों से जुड़ा है। वनवास के दौरान कठिनाइयों का सामना करना, माता सीता की रक्षा के लिए संघर्ष करना और रावण के विरुद्ध युद्ध करना इस कथा के महत्वपूर्ण प्रसंग हैं। इन प्रसंगों के माध्यम से दर्शकों को सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।
विजयादशमी का पर्व लोगों को अपने जीवन में मौजूद बुराइयों पर विचार करने का अवसर भी देता है। अहंकार, क्रोध, लालच और अन्याय जैसी प्रवृत्तियों से दूर रहना इस त्योहार के व्यापक संदेशों में शामिल है। रावण दहन इसी बात का प्रतीकात्मक रूप है कि व्यक्ति को नकारात्मक प्रवृत्तियों का त्याग कर बेहतर समाज के निर्माण में योगदान देना चाहिए।
सामाजिक जीवन में भी प्रासंगिक है दशहरे का संदेश
दशहरा हर वर्ष यह संदेश देता है कि समाज में न्याय, सत्य और नैतिकता का महत्व हमेशा बना रहना चाहिए। धार्मिक दृष्टि से यह भगवान श्रीराम की विजय का पर्व है, जबकि सामाजिक दृष्टि से इसे अन्याय के खिलाफ खड़े होने और सही रास्ते को अपनाने की प्रेरणा के रूप में देखा जाता है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने द्वारका में आयोजित विजयादशमी समारोह में इसी भावना को रेखांकित करते हुए कहा कि दशहरा अधर्म और अन्याय पर धर्म और न्याय की विजय का उत्सव है। उनका संदेश त्योहार के मूल उद्देश्य को सामने रखता है।
देश में त्योहार केवल धार्मिक आस्था के अवसर नहीं होते, बल्कि वे लोगों को सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ने का माध्यम भी बनते हैं। रामलीला महोत्सव और विजयादशमी जैसे आयोजन विभिन्न पीढ़ियों को एक साथ लाते हैं और उन्हें भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण प्रसंगों से परिचित कराते हैं।
द्वारका सेक्टर-10 में आयोजित 15वें रामलीला महोत्सव के समारोह में राष्ट्रपति की भागीदारी और उनका संबोधन दशहरे के इसी महत्व को रेखांकित करता है। विजयादशमी का संदेश स्पष्ट है कि जीवन और समाज में सत्य, धर्म तथा न्याय के मूल्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस बनाए रखना चाहिए।