नई दिल्ली : संसद के मॉनसून सत्र का अधिकांश समय लगातार हंगामे की भेंट चढ़ने के बाद अब सरकार और विपक्ष के बीच टकराव और तेज हो गया है। पिछले दो सप्ताह से लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही बार-बार स्थगित होने के कारण सरकार के कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा और पारित होने की प्रक्रिया प्रभावित हुई है। इसी बीच संसदीय मामलों के मंत्री **किरेन रिजिजू** ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष **राहुल गांधी** से मुलाकात कर संसद में जारी गतिरोध समाप्त करने और आगामी महत्वपूर्ण विधायी कार्यों में सहयोग देने का आग्रह किया। हालांकि, सूत्रों के अनुसार राहुल गांधी ने सरकार के इस अनुरोध को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और स्पष्ट कर दिया कि जब तक विपक्ष की प्रमुख मांगों पर सरकार जवाब नहीं देती, तब तक सदन में सामान्य कामकाज संभव नहीं होगा।
सूत्रों के मुताबिक, किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी से मुलाकात के दौरान संसद में लंबित विधेयकों, विशेष रूप से **परिसीमन (Delimitation)** और **महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दों** पर सहयोग की अपील की। सरकार चाहती है कि मॉनसून सत्र के तीसरे सप्ताह में संसद की कार्यवाही सुचारु रूप से चले ताकि महत्वपूर्ण विधायी कार्य पूरे किए जा सकें। लेकिन राहुल गांधी ने साफ शब्दों में कहा कि विपक्ष पहले से उठाए जा रहे मुद्दों से पीछे हटने वाला नहीं है।
बताया जा रहा है कि राहुल गांधी ने रिजिजू से कहा कि जब तक **राम मंदिर में कथित चंदा चोरी के मामले** और **20 जुलाई को विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर हुए लाठीचार्ज** को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री **अमित शाह** संसद में बयान नहीं देते, तब तक विपक्ष सदन में सामान्य कार्यवाही नहीं चलने देगा। राहुल गांधी का कहना है कि इन दोनों मामलों पर सरकार को जवाब देना चाहिए क्योंकि ये सीधे जनता की भावनाओं और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े हुए हैं।
सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी से मुलाकात के बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से भी इस मुद्दे पर चर्चा की। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है कि गृह मंत्री संसद में बयान देंगे या नहीं।
इस बीच कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल लगातार सरकार पर हमलावर बने हुए हैं। विपक्ष का आरोप है कि राम मंदिर से जुड़े कथित चंदा गड़बड़ी मामले में सरकार जवाब देने से बच रही है। साथ ही 20 जुलाई को विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर भी विपक्ष सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा है। कांग्रेस का कहना है कि लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन पर बल प्रयोग गंभीर विषय है और संसद में इस पर चर्चा होना आवश्यक है।
वहीं सरकार इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बता रही है। सरकार समर्थक नेताओं का कहना है कि 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई का निर्णय स्थानीय प्रशासन का था और इसमें केंद्रीय गृह मंत्री की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी। उनका तर्क है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने से जुड़े ऐसे निर्णय जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों के स्तर पर लिए जाते हैं, इसलिए अमित शाह से बयान की मांग राजनीतिक उद्देश्य से की जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार इस सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की तैयारी में है। लोकसभा में सरकार के पास पर्याप्त समर्थन होने के बावजूद कुछ संवैधानिक संशोधनों और विशेष विधेयकों के लिए व्यापक समर्थन की आवश्यकता होगी। ऐसे में विपक्ष का सहयोग सरकार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस और उसके सहयोगी दल परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को लेकर पहले ही अपनी आशंकाएं जता चुके हैं। दक्षिण भारत की कई क्षेत्रीय पार्टियां भी इस मुद्दे पर सतर्क नजर आ रही हैं।
राहुल गांधी पहले भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि यदि परिसीमन प्रक्रिया का उपयोग किसी राज्य के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित करने के लिए किया गया तो कांग्रेस इसका विरोध करेगी। उन्होंने क्षेत्रीय दलों से भी इस मुद्दे पर एकजुट रहने की अपील की है। इससे स्पष्ट है कि संसद के भीतर आने वाले दिनों में इस विषय पर राजनीतिक बहस और तेज हो सकती है।
गौरतलब है कि **20 जुलाई से शुरू हुआ संसद का मॉनसून सत्र** पहले दिन से ही लगातार हंगामे का सामना कर रहा है। विपक्षी सांसद सदन के भीतर नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जिसके चलते लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही कई बार बिना किसी महत्वपूर्ण चर्चा के स्थगित करनी पड़ी। सरकार चाहती है कि शेष सत्र में विधायी कार्य पूरे हों, जबकि विपक्ष अपनी मांगों पर अड़ा हुआ है।
अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध खत्म करने के लिए आगे क्या पहल होती है। यदि दोनों पक्ष किसी सहमति पर नहीं पहुंचते, तो मॉनसून सत्र का तीसरा सप्ताह भी हंगामे की भेंट चढ़ सकता है और कई महत्वपूर्ण विधेयकों का भविष्य अधर में लटक सकता है।