विदेशी फंडिंग पर सख्ती का नया कानून! FCRA बिल को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?
नई दिल्ली : केंद्र सरकार विदेशी फंडिंग पर निगरानी को और सख्त बनाने के लिए संसद के मौजूदा मॉनसून सत्र में **फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट (FCRA) बिल, 2026** लाने की तैयारी कर रही है। सरकार का कहना है कि इस विधेयक का उद्देश्य विदेशी धन के दुरुपयोग पर रोक लगाना, राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना और विदेशी अंशदान के उपयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। हालांकि प्रस्तावित संशोधन को लेकर देश के कई स्वयंसेवी संगठन (NGO), सामाजिक संस्थाएं और ईसाई समुदाय से जुड़े संगठन गंभीर चिंताएं जता रहे हैं।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के सबसे बड़े ईसाई संगठन **कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI)** का प्रतिनिधिमंडल एक महीने के भीतर दूसरी बार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिला और प्रस्तावित संशोधनों पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि यदि विधेयक वर्तमान स्वरूप में लागू हुआ तो शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा से जुड़े हजारों संस्थानों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो सकता है।
भारत में विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने के लिए वर्ष 2010 में **विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA)** लागू किया गया था। इसके तहत विदेश से आर्थिक सहायता प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठन, ट्रस्ट, सोसायटी और धार्मिक संस्थानों के लिए पंजीकरण अनिवार्य है। यह पंजीकरण हर पांच वर्ष में नवीनीकृत कराना पड़ता है। सरकार का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग के कई मामले सामने आए हैं, इसलिए नियमों को और मजबूत बनाने की आवश्यकता महसूस हुई।
प्रस्तावित **FCRA संशोधन विधेयक 2026** में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। इनमें सबसे अहम प्रावधान **'नामित प्राधिकरण' (Designated Authority)** के गठन का है। यह प्राधिकरण उन संस्थाओं की विदेशी फंडिंग और संपत्तियों की निगरानी करेगा जिनका FCRA पंजीकरण रद्द हो चुका है, समाप्त हो गया है या जिन्होंने स्वेच्छा से इसे सरेंडर कर दिया है।
नए प्रस्ताव के अनुसार यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस समाप्त हो जाता है तो उसकी विदेशी सहायता से बनी संपत्ति और शेष विदेशी धन अस्थायी रूप से इस प्राधिकरण के नियंत्रण में चला जाएगा। यदि संस्था निर्धारित समय के भीतर अपना पंजीकरण दोबारा बहाल करा लेती है तो उसकी संपत्ति और बची हुई राशि वापस कर दी जाएगी। लेकिन यदि ऐसा नहीं होता तो पंजीकरण स्वतः समाप्त माना जाएगा और संपत्ति पर सरकार का नियंत्रण स्थायी हो सकता है।
विधेयक में यह भी प्रस्ताव है कि नामित प्राधिकरण जरूरत पड़ने पर ऐसी संपत्तियों को बेच सकेगा या उन्हें सरकारी विभागों को हस्तांतरित कर सकेगा। बिक्री से प्राप्त राशि भारत के संचित कोष में जमा होगी। हालांकि यदि कोई संपत्ति धार्मिक स्थल है तो उसके धार्मिक स्वरूप को बनाए रखने का प्रावधान भी रखा गया है। साथ ही नियमों के उल्लंघन पर अधिकतम जेल की सजा को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव भी शामिल है, लेकिन संस्था के ट्रस्टी, निदेशक और अन्य पदाधिकारियों की जवाबदेही स्पष्ट रूप से तय की जाएगी।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2019 से 2022 के बीच देश के **13,520 संगठनों** को लगभग **55,741 करोड़ रुपये** का विदेशी अंशदान प्राप्त हुआ। वहीं जुलाई 2026 तक केवल **14,449 सक्रिय FCRA प्रमाणपत्र** मौजूद थे, जबकि **22,498 प्रमाणपत्र रद्द** किए जा चुके हैं और **15,212 की अवधि समाप्त** हो चुकी है। सरकार का मानना है कि इस स्थिति में निगरानी तंत्र को और प्रभावी बनाना आवश्यक है।
दूसरी ओर ईसाई संगठनों और कई स्वयंसेवी संस्थाओं का कहना है कि प्रस्तावित कानून का सबसे बड़ा असर गरीबों और वंचित तबकों तक पहुंचने वाली सेवाओं पर पड़ेगा। उनका दावा है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और सामाजिक कल्याण से जुड़े अनेक संस्थान वर्षों से विदेशी सहायता के माध्यम से काम कर रहे हैं। यदि लाइसेंस संबंधी नियम और कठोर हुए तो कई संस्थानों को अपनी गतिविधियां सीमित करनी पड़ सकती हैं।
ईसाई समुदाय की एक प्रमुख चिंता यह भी है कि विदेशी सहायता से वर्षों पहले बनाए गए स्कूल, अस्पताल और अन्य संस्थानों की संपत्तियां भी विवाद के दायरे में आ सकती हैं, भले ही वर्तमान में उनका संचालन घरेलू संसाधनों से किया जा रहा हो। इसके अलावा छोटे संगठनों ने यह चिंता जताई है कि न्यूनतम खर्च और नवीनीकरण से जुड़े प्रस्तावित नियमों के कारण उनके लिए लाइसेंस बनाए रखना कठिन हो जाएगा।
कुछ संगठनों ने विधेयक में प्रयुक्त **'धर्मांतरण के लिए प्रेरित करना'** जैसे शब्दों पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि मानवीय और सामाजिक सेवा को भी कई बार धार्मिक गतिविधि मान लिया जाता है, जिससे कानून के दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है। उन्होंने यह भी मांग की है कि लाइसेंस नवीनीकरण से पहले संस्थाओं को अपना पक्ष रखने और न्यायिक अपील का स्पष्ट अवसर मिलना चाहिए।
इस प्रस्तावित कानून को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ विदेशी सांसदों और मानवाधिकार संगठनों ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि किसी भी नए कानून में राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के साथ-साथ सामाजिक संस्थाओं के वैध कार्यों की निरंतरता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
फिलहाल यह विधेयक संसद में चर्चा और विचार-विमर्श की प्रक्रिया से गुजरना बाकी है। ऐसे में सरकार और विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों के बीच संवाद जारी है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि सरकार इन आपत्तियों को किस हद तक स्वीकार करती है और अंतिम कानून में क्या बदलाव किए जाते हैं।