दिल्ली :जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के सात वर्ष पूरे होने के मौके पर नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के एक सांसद के बयान ने नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। पार्टी के सांसद मोहम्मद रमजान ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) को लेकर ऐसा बयान दिया, जिस पर सियासी हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। उन्होंने कहा कि पीओके एक अलग देश है और वहां के मामलों की जिम्मेदारी पाकिस्तान सरकार की है। उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है, क्योंकि भारत लगातार पीओके को अपना अभिन्न अंग मानता रहा है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मोहम्मद रमजान ने कहा कि उन्हें पीओके की चिंता नहीं है, क्योंकि वह एक अलग देश है और दूसरे देश के अधिकार क्षेत्र में आता है। उन्होंने कहा कि वहां के मामलों को पाकिस्तान सरकार देखेगी। उनके इस बयान ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा शुरू कर दी है। हालांकि, इस पूरे विवाद पर अभी तक नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में इस समय मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में गठबंधन सरकार चल रही है, जिसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस सबसे बड़ी पार्टी है। ऐसे में पार्टी के सांसद का यह बयान सरकार और पार्टी दोनों के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर इस तरह के बयान व्यापक राजनीतिक असर डाल सकते हैं।
इस विवाद से पहले भी जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अनुच्छेद 370 को लेकर बयानबाजी जारी रही है। मंगलवार को नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने भी अनुच्छेद 370 हटाए जाने और राज्य के पुनर्गठन को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की थी। उन्होंने कहा कि वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा समाप्त कर उसे केंद्र शासित प्रदेश बनाना भारतीय संघीय व्यवस्था के लिए गंभीर विषय है।
फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि यदि भारतीय जनता पार्टी भविष्य में भी सत्ता में बनी रहती है तो इस तरह के कदम अन्य राज्यों में भी उठाए जा सकते हैं। उनके अनुसार जम्मू-कश्मीर के साथ जो हुआ, उसका असर पूरे देश के संघीय ढांचे पर पड़ा है। उन्होंने कहा कि किसी पूर्ण राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदलना लोकतांत्रिक परंपराओं और संवैधानिक भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित सरकार के अधिकार काफी सीमित हो गए हैं और अधिकांश प्रशासनिक शक्तियां केंद्र सरकार के पास हैं। उन्होंने एक बार फिर जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग दोहराते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए यह आवश्यक है कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार को पर्याप्त अधिकार मिलें।
इधर, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने भी अनुच्छेद 370 हटाए जाने की बरसी पर विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने पहले भी कई बार केंद्र सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए इसे जम्मू-कश्मीर की विशेष पहचान और संवैधानिक अधिकारों पर प्रभाव डालने वाला कदम बताया है।
वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार और भारत का आधिकारिक रुख पीओके को लेकर पूरी तरह स्पष्ट बना हुआ है। भारत लगातार यह कहता रहा है कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है तथा उस पर पाकिस्तान का कब्जा अवैध है। इसी क्रम में हाल ही में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में कराए गए स्थानीय चुनावों पर भी भारत ने कड़ी आपत्ति जताई थी।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पीओके में कराए गए तथाकथित स्थानीय चुनाव केवल दिखावा हैं और वे वहां की वास्तविक स्थिति को नहीं बदल सकते। उन्होंने कहा कि उस क्षेत्र में व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं तथा वहां मानवाधिकारों से जुड़े गंभीर मुद्दे सामने आ रहे हैं। भारत का कहना है कि इस तरह की चुनावी कवायद से पाकिस्तान के अवैध कब्जे को वैधता नहीं मिल सकती।
अनुच्छेद 370 हटाए जाने के सात वर्ष पूरे होने के बीच जम्मू-कश्मीर की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। एक ओर राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग तेज हो रही है, तो दूसरी ओर पीओके को लेकर दिए गए बयानों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी और तेज होने की संभावना है, जबकि केंद्र सरकार अपने पहले से घोषित रुख पर कायम है कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है।