दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को उस व्यक्ति की आजीवन कारावास की सजा को निलंबित करने से इनकार कर दिया, जो अपराध के समय 17 वर्ष से अधिक उम्र का था और 2017 में रोहिणी कोर्ट के बाहर एक प्रतिद्वंद्वी गिरोह के सदस्य की हत्या का दोषी था। अपीलकर्ता को घटनास्थल पर पकड़ लिया गया था और जनवरी 2026 में सजा सुनाई गई थी। दिल्ली पुलिस के अनुसार, अपीलकर्ता नीरज बवाना गिरोह से जुड़ा था और उसने प्रतिद्वंद्वी गिरोह के सदस्य राजेश दुरमुथ को रोहिणी कोर्ट के बाहर उस समय गोली मार दी, जब उसे हरियाणा पुलिस अदालत में सुनवाई के लिए ला रही थी।
न्यायमूर्ति प्रथिबा एम सिंह और न्यायमूर्ति दिनेश भट्ट की खंडपीठ ने सजा को निलंबित करने के अपीलकर्ता के आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उसने अदालत के बाहर बंदूक से गोली चलाई थी और पुलिस हिरासत में एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी। पीठ ने अन्य आपराधिक मामलों में उनकी कथित संलिप्तता पर भी गौर किया। अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील परवीन डबास ने कहा कि उनके मुवक्किल ने सात साल और नौ महीने हिरासत में बिताए हैं। उन्होंने जांच में कथित खामियों की ओर भी इशारा किया और तर्क दिया कि जांच के दौरान एकत्र किए गए अवशेषों के नमूनों को फोरेंसिक विश्लेषण के लिए नहीं भेजा गया था।
याचिका का विरोध करते हुए अतिरिक्त लोक अभियोजक रितेश बाहरी ने कहा कि अपीलकर्ता को हरियाणा पुलिस की हिरासत में एक कैदी को गोली मारने का दोषी ठहराया गया था। उन्होंने हरियाणा के झज्जर सहित अन्य आपराधिक मामलों में अपीलकर्ता की संलिप्तता पर भी प्रकाश डाला, जिसमें वर्तमान मामले में अंतरिम जमानत पर बाहर रहते हुए उस पर मामला दर्ज किया गया था। अभियोजक ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता को जमानत नहीं दी जानी चाहिए। उच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ अपील को जनवरी 2027 में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया। मामले के रिकॉर्ड में यह भी उल्लेख किया गया है कि घटना के सिलसिले में चार अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन बाद में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था।
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