नई दिल्ली। पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने वोटर लिस्ट में चल रही ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (SIR) प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि भले ही न्यायपालिका ने इस प्रक्रिया को वैध माना है और सरकार की ओर से इसे कानूनी प्रक्रिया बताया गया है, लेकिन यह देखना जरूरी है कि क्या यह प्रक्रिया उचित भी है।

अशोक लवासा ने कहा कि लोकतंत्र में केवल किसी प्रक्रिया का कानूनी होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका निष्पक्ष, न्यायसंगत और लोगों के लिए सहज होना भी जरूरी है।

ADR के कार्यक्रम में बोले लवासा

पूर्व चुनाव आयुक्त ने यह टिप्पणी गुरुवार को ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) की ओर से आयोजित ‘जगदीप सिंह छोकर मेमोरियल लेक्चर’ के दौरान की।

कार्यक्रम में उन्होंने चुनाव प्रक्रिया, मतदाता अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर अपने विचार रखे।

उन्होंने SIR प्रक्रिया का जिक्र करते हुए कहा कि लाखों लोगों के लिए यह प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण बन सकती है।

‘कानूनी है, लेकिन क्या उचित है?’

लवासा ने कहा, “बेशक यह कानूनी है। लेकिन क्या यह उचित है? सवाल यही है। क्योंकि न्याय का मतलब यही है।”

उन्होंने अपने बयान के जरिए इस बात पर जोर दिया कि किसी भी व्यवस्था में कानून के साथ-साथ न्याय और समानता के सिद्धांतों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

उनका कहना था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की जिम्मेदारी केवल नियम लागू करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि आम नागरिकों को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।

लाखों लोगों पर प्रक्रिया थोपी जाने का आरोप

पूर्व चुनाव आयुक्त ने SIR प्रक्रिया को लाखों लोगों पर थोपी जा रही एक अनुचित प्रक्रिया बताया।

उन्होंने कहा कि मतदाता सूची का संशोधन जरूरी है, लेकिन इसके लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे आम नागरिकों को परेशानी न हो।

उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि बड़ी संख्या में लोगों को दस्तावेजों और अन्य औपचारिकताओं के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिक अधिकार

मतदाता सूची को सही और अद्यतन रखना चुनाव प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। निर्वाचन आयोग समय-समय पर मतदाता सूची में संशोधन करता है।

हालांकि, किसी भी संशोधन प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि योग्य मतदाताओं के नाम प्रभावित न हों और किसी भी व्यक्ति को अपने मतदान अधिकार से वंचित न होना पड़े।

लवासा ने इसी संतुलन की ओर ध्यान आकर्षित किया।

न्यायपालिका और सरकार के रुख का किया उल्लेख

अशोक लवासा ने कहा कि न्यायपालिका ने इस प्रक्रिया को सही ठहराया है और सरकार ने भी इसे कानूनी बताया है।

लेकिन उन्होंने कहा कि केवल कानूनी आधार पर किसी प्रक्रिया का मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए। उसकी व्यवहारिकता और आम लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी देखा जाना चाहिए।

चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता पर जोर

लवासा ने अपने संबोधन में चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता के महत्व को रेखांकित किया।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में लोगों का विश्वास बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है। इसके लिए चुनावी प्रक्रियाओं को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद बनाना आवश्यक है।

SIR को लेकर जारी है बहस

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर देश में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस जारी है।

जहां एक ओर समर्थक इसे मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाने की प्रक्रिया बताते हैं, वहीं आलोचक इसके कारण आम लोगों को होने वाली संभावित परेशानियों को लेकर चिंता जता रहे हैं।

पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की टिप्पणी ने इस बहस को और तेज कर दिया है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में संतुलन जरूरी

लवासा के बयान का मुख्य संदेश यही रहा कि चुनावी प्रक्रियाएं कानून के अनुसार होने के साथ-साथ न्यायपूर्ण भी होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि हर नागरिक को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने में आसानी हो और किसी भी प्रक्रिया के कारण योग्य मतदाता प्रभावित न हों।

SIR प्रक्रिया को लेकर अब आगे भी राजनीतिक और कानूनी चर्चा जारी रहने की संभावना है।

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