नई दिल्ली। भारत में बाल विवाह रोकने के लिए चलाए जा रहे अभियान को बड़ी अंतरराष्ट्रीय सफलता मिली है। संयुक्त राष्ट्र ने **27 नवंबर** को **‘बाल, कम उम्र और जबरन विवाह की समाप्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस’** घोषित किया है। खास बात यह है कि यह तारीख भारत के **‘बाल विवाह मुक्त भारत’ अभियान** की शुरुआत से जुड़ी हुई है।
संयुक्त राष्ट्र के इस फैसले को बाल अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। भारत की ओर से चलाए जा रहे बाल विवाह के खिलाफ अभियान को अब वैश्विक स्तर पर पहचान मिली है। इस पहल का उद्देश्य दुनिया भर में बच्चों, खासकर लड़कियों को कम उम्र में विवाह जैसी सामाजिक कुरीति से बचाना और उन्हें शिक्षा व विकास के अवसर उपलब्ध कराना है।
27 नवंबर की तारीख क्यों है खास?
संयुक्त राष्ट्र द्वारा चुनी गई 27 नवंबर की तारीख भारत के लिए विशेष महत्व रखती है। इसी दिन साल 2024 में केंद्र सरकार ने **‘बाल विवाह मुक्त भारत’ राष्ट्रीय अभियान** की शुरुआत की थी।
इस अभियान का लक्ष्य देश को बाल विवाह से मुक्त बनाना है। इसके तहत सरकार ने जागरूकता अभियान, समुदाय की भागीदारी और बाल विवाह रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया है।
भारत से शुरू हुई पहल बनी वैश्विक अभियान
बाल विवाह के खिलाफ भारत में लंबे समय से सरकारी संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों द्वारा अभियान चलाए जा रहे हैं। इसी प्रयास को आगे बढ़ाते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाल विवाह खत्म करने के लिए एक विशेष दिवस की मांग उठाई गई थी।
संयुक्त राष्ट्र में इस प्रस्ताव को सिएरा लियोन की ओर से आगे बढ़ाया गया, जिसे भारत समेत कई देशों का समर्थन मिला। प्रस्ताव में बाल विवाह, कम उम्र में विवाह और जबरन विवाह जैसी प्रथाओं को खत्म करने के लिए वैश्विक प्रयास तेज करने पर जोर दिया गया।
बाल विवाह रोकना क्यों जरूरी?
बाल विवाह बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन माना जाता है। कम उम्र में शादी होने से बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य पर गंभीर असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कम उम्र में विवाह से खासकर लड़कियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इनमें पढ़ाई छूटना, स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और आर्थिक निर्भरता जैसी समस्याएं शामिल हैं।
बाल विवाह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं है, बल्कि यह बच्चों के विकास और समान अवसरों से भी जुड़ा मुद्दा है।
भारत सरकार ने बढ़ाई जागरूकता
‘बाल विवाह मुक्त भारत’ अभियान के तहत देशभर में जागरूकता कार्यक्रम चलाए गए हैं। स्कूलों, पंचायतों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय संस्थाओं को इस अभियान से जोड़ा गया है।
सरकार ने बाल विवाह रोकने के लिए बाल विवाह निषेध अधिकारियों की भूमिका को भी मजबूत किया है। साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए शिकायत और जानकारी साझा करने की व्यवस्था बनाई गई है।
लाखों लोगों ने ली बाल विवाह रोकने की शपथ
अभियान के तहत बड़ी संख्या में लोगों को जागरूक किया गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस मुहिम के जरिए करोड़ों लोगों तक संदेश पहुंचाया गया और लाखों नागरिकों ने बाल विवाह रोकने की शपथ ली है।
इससे यह संकेत मिलता है कि बाल विवाह जैसी समस्या से लड़ने के लिए केवल कानून ही नहीं, बल्कि समाज की भागीदारी भी जरूरी है।
कानून में क्या है प्रावधान?
भारत में बाल विवाह रोकने के लिए **बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006** लागू है। इस कानून के तहत कम उम्र में विवाह कराने, बढ़ावा देने या उसमें मदद करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है।
कानून के साथ-साथ सरकार लगातार सामाजिक जागरूकता पर भी जोर दे रही है, क्योंकि कई मामलों में सामाजिक सोच और परंपराएं बाल विवाह को बढ़ावा देती हैं।
शिक्षा और जागरूकता पर जोर
बाल विवाह रोकने के लिए सबसे बड़ा हथियार शिक्षा को माना जाता है। सरकार और सामाजिक संगठन लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि बच्चों को पढ़ाई, कौशल विकास और बेहतर भविष्य के अवसर मिलना जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब परिवार और समुदाय बाल विवाह के नुकसान को समझेंगे, तभी इस समस्या को पूरी तरह खत्म किया जा सकेगा।
दुनिया के लिए भारत का संदेश
संयुक्त राष्ट्र द्वारा 27 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किए जाने के बाद भारत की बाल विवाह विरोधी मुहिम को नई ताकत मिलेगी। यह दिन हर साल दुनिया भर में बच्चों के अधिकारों और सुरक्षित बचपन को लेकर जागरूकता फैलाने का अवसर बनेगा।
भारत के लिए यह उपलब्धि केवल एक तारीख तय होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस संकल्प की वैश्विक पहचान है जिसमें हर बच्चे को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार देने की बात कही गई है।
अब चुनौती यह है कि इस वैश्विक मान्यता को जमीन पर बदलाव में बदला जाए, ताकि देश और दुनिया से बाल विवाह जैसी कुरीति को पूरी तरह खत्म किया जा सके।