नई दिल्ली। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष को लेकर सदस्य देशों के बीच मतभेद उभरने की संभावना जताई जा रही है। अलग-अलग देशों के रुख और रणनीतिक हितों को देखते हुए इस मुद्दे पर सहमति बनाना बड़ी चुनौती माना जा रहा है। हालांकि, भारत ने इस मामले में सक्रिय कूटनीतिक पहल शुरू कर दी है। भारत की कोशिश है कि सभी सदस्य देशों के बीच सहमति बनाकर एक संयुक्त बयान जारी किया जाए, जिसमें सभी पक्षों के हितों और चिंताओं को संतुलित तरीके से शामिल किया जा सके।

ब्रिक्स दुनिया के प्रमुख उभरते देशों का समूह है, जिसमें भारत, ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका सहित कई अन्य देश शामिल हैं। समूह के विस्तार के बाद इसमें शामिल देशों की संख्या और विविधता बढ़ी है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सभी सदस्यों के बीच सहमति बनाना पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है।

पश्चिम एशिया संकट बना अहम मुद्दा

ब्रिक्स सम्मेलन में पश्चिम एशिया का संघर्ष प्रमुख विषयों में से एक रहने की संभावना है। इस क्षेत्र में जारी तनाव को लेकर सदस्य देशों के दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। कुछ देश संघर्ष विराम और मानवीय सहायता पर जोर दे रहे हैं, जबकि कुछ देश सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

इन मतभेदों के कारण संयुक्त बयान तैयार करना कठिन हो सकता है। हालांकि, भारत का प्रयास है कि विवादित मुद्दों पर संतुलित भाषा अपनाई जाए, जिससे सभी सदस्य देशों को स्वीकार्य समाधान निकाला जा सके।

भारत की कूटनीतिक भूमिका अहम

भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संवाद और कूटनीतिक समाधान का समर्थन करता रहा है। पश्चिम एशिया के मुद्दे पर भी भारत ने सभी पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने की नीति अपनाई है। भारत एक ओर जहां क्षेत्र में शांति और स्थिरता की आवश्यकता पर जोर देता है, वहीं दूसरी ओर मानवीय सहायता और नागरिकों की सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण मानता है।

ब्रिक्स सम्मेलन से पहले भारत की ओर से सदस्य देशों के साथ बातचीत बढ़ाई गई है। भारतीय राजनयिक अलग-अलग देशों के प्रतिनिधियों के संपर्क में हैं ताकि साझा सहमति का रास्ता निकाला जा सके।

संयुक्त बयान जारी करना लक्ष्य

भारत की प्राथमिकता है कि सम्मेलन के अंत में सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति के साथ संयुक्त बयान जारी हो। इसके लिए भाषा और शब्दों के चयन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जारी होने वाले संयुक्त बयान सदस्य देशों की सामूहिक सोच को दर्शाते हैं, इसलिए हर शब्द को लेकर व्यापक चर्चा होती है।

सूत्रों के अनुसार, भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि बयान में किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय शांति, बातचीत और अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन पर जोर दिया जाए।

ब्रिक्स में बढ़ती चुनौतियां

ब्रिक्स के विस्तार के बाद संगठन का प्रभाव बढ़ा है, लेकिन इसके साथ ही सदस्य देशों के बीच विचारों में अंतर भी बढ़ा है। आर्थिक सहयोग के साथ-साथ अब समूह वैश्विक राजनीतिक मुद्दों पर भी अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के अलग-अलग रुख सामने आते रहे हैं। ऐसे में किसी भी मुद्दे पर साझा दृष्टिकोण बनाना आसान नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उसके कई सदस्य देशों के साथ मजबूत संबंध हैं। भारत पश्चिमी देशों और वैश्विक दक्षिण दोनों के साथ संवाद बनाए रखने की कोशिश करता रहा है।

शांति और स्थिरता पर जोर

भारत का मानना है कि किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों से ही संभव है। पश्चिम एशिया संकट को लेकर भी भारत ने लगातार शांति, स्थिरता और मानवीय सहायता की जरूरत पर जोर दिया है।

ब्रिक्स सम्मेलन में भारत इसी दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है। उद्देश्य यह है कि संगठन के भीतर मतभेदों के बावजूद ऐसा संदेश दिया जाए, जो वैश्विक शांति और सहयोग को बढ़ावा दे।

आने वाले दिनों में सम्मेलन की तैयारियों के दौरान सदस्य देशों के बीच कई दौर की बातचीत हो सकती है। यदि भारत अपने प्रयासों में सफल रहता है तो ब्रिक्स का संयुक्त बयान वैश्विक मंच पर एक महत्वपूर्ण संदेश दे सकता है।

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