भारत अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा के लिए बढ़ा रहा ताकत : उपराष्ट्रपति
दूसरे देशों पर हुक्म चलाने की सोच नहीं रखता भारत : उपराष्ट्रपति
नई दिल्ली : उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने सोमवार को कहा कि भारत का लक्ष्य वैश्विक स्तर पर इतनी मजबूत शक्ति बनना है कि कोई भी देश उस पर अनुचित शर्तें लागू न कर सके। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने पर भी जोर दिया।
राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय (एनडीसी) के 66वें पाठ्यक्रम के प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि देश की राष्ट्रीय रणनीति ऐसी होनी चाहिए, जो राष्ट्रीय उद्देश्यों को प्रभावी नीतियों और ठोस परिणामों में बदल सके। उन्होंने राष्ट्रीय मूल्यों, हितों और उद्देश्यों के बीच तालमेल को देश की सुरक्षा और विकास के लिए आवश्यक बताया।
राधाकृष्णन ने कहा कि भारत के राष्ट्रीय हित उसके संवैधानिक मूल्यों से जुड़े हैं। संप्रभुता, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की रक्षा देश की प्रमुख प्राथमिकताएं हैं। उन्होंने लोकतांत्रिक और संघीय व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के साथ रणनीतिक, राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य उद्देश्यों को आगे बढ़ाने की जरूरत भी बताई।
वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सहयोग जरूरी
उपराष्ट्रपति ने भारत की सभ्यतागत सोच ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के मूल्यों का प्रभाव उसकी विदेश नीति और वैश्विक संबंधों में भी दिखाई देता है। उन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान वैक्सीन मैत्री अभियान, आपदा के समय सहायता और जलवायु परिवर्तन से निपटने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में भारत की भूमिका का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि आतंकवाद, साइबर हमले, महामारी, जलवायु परिवर्तन और सीमा पार अपराध जैसी चुनौतियों का मुकाबला किसी एक देश के लिए आसान नहीं है। इनके समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय समन्वय, सूचनाओं का आदान-प्रदान और देशों के बीच विश्वास मजबूत करना आवश्यक है। राष्ट्रीय हितों की रक्षा और वैश्विक हितों को आगे बढ़ाने के प्रयास एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
विकसित भारत-2047 को बताया महत्वपूर्ण लक्ष्य
राधाकृष्णन ने विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को रेखांकित करते हुए कहा कि देश की दीर्घकालिक रणनीति राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा का दायरा केवल थल सीमाओं, हवाई क्षेत्र और समुद्री हितों की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि साइबर सुरक्षा, सतत विकास और आर्थिक समृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करना भी इसका हिस्सा है।
वैश्विक दक्षिण के देशों से सहयोग बढ़ाने पर जोर
उपराष्ट्रपति ने वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ साझेदारी मजबूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक संप्रभु राष्ट्र समान महत्व रखता है, चाहे उसका आकार बड़ा हो या छोटा। प्रौद्योगिकी, व्यापार, संपर्क, शिक्षा, नवाचार और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर साझा विकास के अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
उन्होंने भ्रष्टाचार को वैश्विक दक्षिण के सामने मौजूद प्रमुख चुनौतियों में शामिल करते हुए इसके उन्मूलन के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता बताई।
एनडीसी के 66वें पाठ्यक्रम में भारतीय सशस्त्र बलों, सिविल सेवाओं, पुलिस और अन्य सरकारी संगठनों के अधिकारियों के साथ मित्र देशों के 41 अधिकारी सहित कुल 122 प्रतिभागी शामिल हैं। कार्यक्रम में राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय के कमांडेंट एयर मार्शल मनीष कुमार गुप्ता और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे।