प्रदर्शन रिकॉर्डिंग विवाद पहुंचा कोर्ट, केंद्र ने सुरक्षा व्यवस्था का रखा पक्ष

Update: 2026-07-24 13:50 GMT

नई दिल्ली :  सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा की जाने वाली वीडियो रिकॉर्डिंग और इससे जुड़े निजता के अधिकार के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। मामले में केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि बड़े सार्वजनिक प्रदर्शनों की वीडियो रिकॉर्डिंग कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक स्वीकृत प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद जारी स्थायी आदेश के तहत ऐसे प्रदर्शनों की रिकॉर्डिंग की जाती है, ताकि किसी अप्रिय घटना की स्थिति में जिम्मेदार लोगों की पहचान की जा सके।

सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सार्वजनिक स्थानों पर होने वाले प्रदर्शनों की रिकॉर्डिंग सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा होती है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान अगर हिंसा या किसी अन्य प्रकार की घटना होती है तो वीडियो फुटेज जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हो सकती है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जब प्रदर्शनकारी खुद अपने वीडियो बनाते हैं और उन्हें सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों पर साझा करते हैं, तो सार्वजनिक स्थान पर पूरी तरह से निजता की उम्मीद नहीं की जा सकती।

यह मामला जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस निगरानी और कथित रिकॉर्डिंग से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने केंद्र सरकार के तर्कों का विरोध करते हुए कहा कि निजता का अधिकार संविधान के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट अपने कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि सार्वजनिक स्थानों पर भी व्यक्ति की निजता पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती।

याचिकाकर्ता के वकील ने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान सादे कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मी कैमरों के जरिए 16 से 19 वर्ष की उम्र के युवाओं की रिकॉर्डिंग कर रहे थे। उन्होंने कहा कि निगरानी के लिए स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया, सुरक्षा उपाय और डेटा संरक्षण के नियमों का पालन किया जाना जरूरी है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कुछ मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि कथित तौर पर एआई आधारित चेहरा पहचान प्रणाली वाली गाड़ियों के इस्तेमाल की बात सामने आई है। हालांकि पुलिस की ओर से अदालत में केवल सामान्य वीडियो रिकॉर्डिंग की जानकारी दी गई है। वकील ने कहा कि अगर चेहरा पहचान तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है तो इससे किसी व्यक्ति की पहचान और उसके खिलाफ कार्रवाई की संभावना बढ़ सकती है, इसलिए इसके लिए मजबूत कानूनी ढांचा होना जरूरी है।

उन्होंने अदालत से कहा कि आधुनिक निगरानी तकनीकों के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद महत्वपूर्ण है। बिना स्पष्ट नियमों के किसी भी नागरिक की निगरानी उसके मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर सकती है।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि निगरानी और निजता से जुड़े कानूनी पहलुओं पर अदालत को पहले अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना होगा। उन्होंने कहा कि इस विषय से जुड़ी कुछ अन्य याचिकाएं भी 12 सितंबर को सूचीबद्ध हैं। अदालत ने सुझाव दिया कि यदि याचिकाकर्ता चाहे तो इस मामले को उन याचिकाओं के साथ जोड़ा जा सकता है।

हालांकि याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि पहले से लंबित याचिकाएं 20 जुलाई को हुई पुलिस कार्रवाई से संबंधित हैं, जबकि उनकी याचिका उससे पहले दाखिल की गई थी और इसका मुख्य मुद्दा निगरानी तथा निजता के अधिकार से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई को निर्धारित कर दी है। अब अदालत में यह महत्वपूर्ण सवाल सामने रहेगा कि सार्वजनिक प्रदर्शनों की सुरक्षा के लिए वीडियो रिकॉर्डिंग की सीमा क्या होनी चाहिए और नागरिकों के निजता के अधिकार की रक्षा के लिए कौन से कानूनी मानक जरूरी हैं। यह मामला भविष्य में सार्वजनिक निगरानी व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

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