नई दिल्ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने देश की चुनावी व्यवस्था, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की विश्वसनीयता और संस्थाओं को मिलने वाले चंदे के हिसाब-किताब को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को जरूरी बताते हुए कहा कि देश में हर संस्था को अपने कामकाज और आर्थिक स्रोतों के बारे में सवालों का जवाब देना चाहिए। EVM को लेकर उनकी चिंता का केंद्र मतदाता के वोट की विश्वसनीयता और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा है। इसी संदर्भ में उन्होंने सवाल उठाया कि क्या देश में लोकतंत्र सुरक्षित रह पाएगा?दिग्विजय सिंह लंबे समय से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के इस्तेमाल पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव केवल मतदान कराने और नतीजे घोषित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि मतदाता को यह भरोसा भी होना चाहिए कि उसने जिस उम्मीदवार को वोट दिया है, उसका वोट उसी उम्मीदवार के खाते में गया है। उनके मुताबिक, लोकतंत्र की मजबूती के लिए चुनावी प्रक्रिया का पारदर्शी और भरोसेमंद होना बेहद जरूरी है।
EVM और मतदाता के अधिकार पर उठाए सवाल
दिग्विजय सिंह का तर्क है कि किसी भी चुनावी व्यवस्था में मतदाता का विश्वास सबसे महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने मतदान के दौरान इस्तेमाल होने वाली तकनीक और वोटों की गिनती की प्रक्रिया पर अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता बताई है। उनका कहना है कि यदि मतदाता को अपने वोट के सही रिकॉर्ड होने को लेकर संदेह है, तो संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे इन सवालों का स्पष्ट जवाब दें।31 अक्टूबर 2026 को मध्य प्रदेश के राजगढ़ में अपनी सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा के दौरान आयोजित प्रेस वार्ता में भी उन्होंने EVM के मुद्दे को उठाया था। उन्होंने बैलेट पेपर से चुनाव कराने की चुनौती देते हुए कहा था कि चुनाव में हार-जीत से उन्हें फर्क नहीं पड़ता, लेकिन मतदान प्रक्रिया पर जनता का विश्वास कायम रहना चाहिए। उन्होंने VVPAT पर्चियों को मतदाताओं के हाथ में देने की मांग भी उठाई थी।कांग्रेस नेता का यह रुख कोई नया नहीं है। वह वर्ष 2003 से EVM के इस्तेमाल पर सवाल उठाने की बात कह चुके हैं। उनका तर्क है कि मतदान की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिसमें आम मतदाता अपने वोट की विश्वसनीयता को लेकर आश्वस्त रह सके। इसी कारण वह बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग का समर्थन करते रहे हैं।
संस्थाओं के चंदे और आर्थिक स्रोतों का हिसाब सार्वजनिक करने की मांग
दिग्विजय सिंह ने केवल चुनावी व्यवस्था ही नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संस्थाओं को मिलने वाले चंदे के स्रोत तथा उसके इस्तेमाल को लेकर भी जवाबदेही की जरूरत बताई है। उनका मानना है कि लोकतंत्र में किसी भी संस्था को सवालों से ऊपर नहीं रखा जा सकता। यदि कोई संगठन बड़े स्तर पर आर्थिक गतिविधियां संचालित करता है और समाज में प्रभाव रखता है, तो उसके पास यह बताने की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि उसे पैसा कहां से मिलता है और उसका इस्तेमाल किन कार्यों में किया जाता है।जून 2026 में दिग्विजय सिंह ने कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खरगे की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से वित्तीय पारदर्शिता संबंधी सवाल पूछने की मांग का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि वह लंबे समय से संघ की कानूनी स्थिति, पंजीकरण, आय के स्रोत, खर्च और कर अनुपालन से जुड़े सवाल उठाते रहे हैं।उन्होंने बताया था कि अक्टूबर 2021 में तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर संघ के आर्थिक स्रोतों और खर्चों की जानकारी मांगी थी। नवंबर 2025 में उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी पत्र लिखा था। सिंह का कहना था कि यदि ट्रस्ट, सोसाइटी, गैर सरकारी संगठन, धार्मिक संस्थान और राजनीतिक दल वित्तीय जानकारी सार्वजनिक करते हैं, तो बड़े संगठनों से भी इसी तरह की पारदर्शिता की अपेक्षा स्वाभाविक है।
राम मंदिर ट्रस्ट के चंदे पर भी उठाए सवाल
दिग्विजय सिंह ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से जुड़े ट्रस्ट के चंदे और जमीन की खरीद-फरोख्त को लेकर भी सवाल उठाए हैं। 31 अक्टूबर को राजगढ़ में उन्होंने राम मंदिर के आसपास जमीनों की खरीद और ट्रस्ट को उनके हस्तांतरण में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाया था।उन्होंने दावा किया था कि कुछ जमीनों को कम कीमत पर खरीदकर थोड़े समय के भीतर अधिक कीमत पर ट्रस्ट को बेचा गया। एक मामले का उदाहरण देते हुए उन्होंने दो करोड़ रुपये में खरीदी गई जमीन अगले दिन 18 करोड़ रुपये में बेचे जाने का आरोप लगाया था। उन्होंने दान में मिली राशि और धार्मिक स्थलों की संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता की जरूरत पर जोर दिया।उन्होंने यह भी कहा था कि धार्मिक संस्थानों को मिलने वाले दान का हिसाब स्पष्ट होना चाहिए, क्योंकि लोग आस्था के साथ अपनी मेहनत की कमाई इन संस्थानों को देते हैं। हालांकि, जमीन की खरीद और चंदे से संबंधित इन आरोपों को दिग्विजय सिंह के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इन्हें किसी न्यायिक निष्कर्ष या प्रमाणित वित्तीय अनियमितता के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी चर्चा में
EVM को लेकर दिग्विजय सिंह की मांग के बीच चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के रुख को समझना भी जरूरी है। भारत निर्वाचन आयोग की चुनावी व्यवस्था में EVM के साथ VVPAT का इस्तेमाल किया जाता है। इसके माध्यम से मतदाता सात सेकंड तक एक पर्ची देखकर यह पुष्टि कर सकता है कि उसने किस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया है। इसके बाद पर्ची मशीन के सीलबंद डिब्बे में चली जाती है।26 अप्रैल 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने EVM से दर्ज सभी वोटों की VVPAT पर्चियों से शत-प्रतिशत मिलान कराने और बैलेट पेपर प्रणाली वापस लागू करने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था। अदालत ने मौजूदा व्यवस्था में उपलब्ध तकनीकी और प्रशासनिक सुरक्षा उपायों का उल्लेख किया था। साथ ही अदालत ने कुछ अतिरिक्त सुरक्षा उपायों के निर्देश भी दिए थे। इनमें चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद उम्मीदवारों की मांग पर पांच प्रतिशत EVM की बर्न्ट मेमोरी की जांच का विकल्प शामिल था।इसलिए EVM की विश्वसनीयता को लेकर राजनीतिक दलों द्वारा उठाए जा रहे सवालों और न्यायालय के फैसले को अलग-अलग संदर्भों में समझना आवश्यक है। दिग्विजय सिंह की मांग राजनीतिक और लोकतांत्रिक पारदर्शिता से जुड़ी है, जबकि चुनाव आयोग की व्यवस्था मौजूदा कानूनी और तकनीकी प्रक्रियाओं के तहत संचालित होती है।
लोकतंत्र में जवाबदेही को बताया जरूरी
दिग्विजय सिंह के बयानों का मुख्य आधार चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता की मांग है। उनका कहना है कि मतदाता का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए और आर्थिक गतिविधियां चलाने वाले संस्थानों को भी अपने वित्तीय स्रोतों तथा खर्च की जानकारी देनी चाहिए।उनके मुताबिक, लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं होता। इसमें नागरिकों का भरोसा, संस्थाओं की जवाबदेही और सार्वजनिक गतिविधियों में पारदर्शिता भी महत्वपूर्ण होती है। EVM से लेकर चंदे के इस्तेमाल तक उठाए गए उनके सवाल इसी व्यापक बहस का हिस्सा हैं।अब इस पूरे मुद्दे पर राजनीतिक दलों, चुनाव आयोग और संबंधित संस्थाओं की प्रतिक्रियाएं भी महत्वपूर्ण रहेंगी। EVM की विश्वसनीयता और संस्थाओं के वित्तीय हिसाब-किताब पर जारी बहस के बीच सबसे अहम सवाल यही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही को किस तरह और मजबूत किया जाए।
Tags: