नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के बारामूला से लोकसभा सांसद अब्दुल राशिद शेख उर्फ इंजीनियर राशिद की जमानत याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार, 3 नवंबर 2026 को अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) द्वारा दर्ज आतंकवाद के वित्तपोषण से जुड़े मामले में राशिद लंबे समय से न्यायिक हिरासत में हैं। सुनवाई के दौरान एनआईए ने उनकी जमानत का कड़ा विरोध करते हुए आरोप लगाया कि सांसद ने अभियोजन पक्ष के गवाहों को प्रभावित करने का प्रयास किया है। दूसरी ओर, राशिद के वकीलों ने इन आरोपों का विरोध किया और लंबे समय से हिरासत में रहने के आधार पर जमानत देने की मांग की।दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलें सामने आईं। एनआईए ने अदालत को बताया कि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के वित्तपोषण से संबंधित गंभीर आरोपों से जुड़ा हुआ है। एजेंसी का तर्क है कि आरोपी को नियमित जमानत दिए जाने से मुकदमे की कार्यवाही और गवाहों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।एनआईए ने विशेष रूप से गवाहों को प्रभावित करने की आशंका जताई। एजेंसी के अनुसार, मामले में दो संरक्षित गवाह अपने पहले दिए गए बयानों से मुकर चुके हैं। एनआईए का आरोप है कि राशिद का व्यवहार और कुछ गवाहों से कथित संपर्क इस आशंका को मजबूत करते हैं। हालांकि, ये अभियोजन पक्ष के आरोप हैं और अदालत ने जमानत याचिका पर अभी अंतिम निर्णय नहीं सुनाया है।
अब्दुल राशिद शेख को अगस्त 2019 में गिरफ्तार किया गया था। उन पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत आरोप लगाए गए हैं। इस कानून के अंतर्गत आतंकवाद से जुड़ी गतिविधियों और वित्तपोषण के मामलों में विशेष प्रावधान लागू होते हैं।राशिद वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर की बारामूला सीट से सांसद निर्वाचित हुए थे। चुनाव जीतने के बावजूद उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले और न्यायिक हिरासत का मुद्दा लगातार चर्चा में रहा है।दिल्ली हाई कोर्ट इससे पहले भी उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई कर चुका है। 9 सितंबर 2026 को हुई सुनवाई में न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति विकास महाजन की पीठ ने एनआईए से पूछा था कि क्या कठोर शर्तों के साथ राशिद को जमानत पर रिहा किया जा सकता है।अदालत ने उस समय यह संभावना भी सामने रखी थी कि जमानत की अवधि के दौरान राशिद को केवल दिल्ली में रहने की शर्त लगाई जा सकती है। पीठ ने इस तथ्य का उल्लेख किया था कि राशिद निर्वाचित सांसद हैं और छह वर्ष से अधिक समय से हिरासत में हैं। एनआईए के वकील ने इस संबंध में निर्देश प्राप्त करने के लिए समय मांगा था। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई 3 नवंबर निर्धारित की गई थी।सितंबर की सुनवाई के दौरान एनआईए की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने दलीलें पेश की थीं। उन्होंने कहा था कि एजेंसी को आशंका है कि जमानत मिलने पर राशिद गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। एनआईए ने उनके कथित संपर्कों और कुछ राजनीतिक गतिविधियों का भी उल्लेख किया था।
एजेंसी का आरोप है कि राशिद का संबंध आतंकवाद के वित्तपोषण मामले में आरोपी जहूर अहमद शाह वटाली से रहा है। एनआईए ने यह भी दावा किया है कि कथित तौर पर प्राप्त धन का इस्तेमाल कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाओं को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया। इन आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण मुकदमे की न्यायिक प्रक्रिया में होना है।अदालत के सितंबर 2026 के आदेश के अनुसार, एनआईए ने 'गोल्फ' नाम से पहचाने गए एक संरक्षित गवाह के संबंध में भी दलील दी थी। एजेंसी का कहना था कि इस गवाह ने अगस्त 2019 में मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए बयान में राशिद के खिलाफ बातें कही थीं, लेकिन अप्रैल 2026 में ट्रायल कोर्ट के सामने अपने पूर्व बयान से मुकर गया।एनआईए ने दावा किया कि पहले मिली अंतरिम जमानत की अवधि के दौरान राशिद और उनके परिवार के सदस्यों तथा संबंधित गवाह के बीच संपर्क हुए थे। एजेंसी ने इन्हें गवाह को प्रभावित करने की आशंका से जोड़ा। हालांकि, बचाव पक्ष ने गवाहों को प्रभावित करने के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है।राशिद के वकीलों की ओर से लंबे समय से न्यायिक हिरासत में रहने और मुकदमे की अवधि को महत्वपूर्ण आधार बनाया गया है। उनका पक्ष है कि मामले की सुनवाई पूरी होने में समय लग सकता है और इस दौरान जमानत के प्रश्न पर संवैधानिक तथा कानूनी अधिकारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।भारतीय न्याय व्यवस्था में जमानत पर फैसला करते समय आरोपों की गंभीरता, उपलब्ध साक्ष्य, आरोपी के फरार होने की आशंका, गवाहों को प्रभावित करने की संभावना और हिरासत की अवधि सहित कई पहलुओं पर विचार किया जाता है। यूएपीए के मामलों में जमानत के लिए विशेष कानूनी कसौटियां भी लागू होती हैं।
इंजीनियर राशिद को इससे पहले अलग-अलग परिस्थितियों में अंतरिम जमानत मिल चुकी है। वर्ष 2024 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हें सीमित अवधि के लिए राहत दी गई थी। इसके बाद मई 2026 में पिता के निधन के कारण भी दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें अंतरिम जमानत प्रदान की थी।मई 2026 में अदालत ने पारिवारिक शोक और अंतिम संस्कार से जुड़ी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए राहत दी थी। हालांकि, अंतरिम जमानत और नियमित जमानत अलग-अलग कानूनी विषय हैं। सीमित अवधि के लिए मिली राहत का अर्थ यह नहीं होता कि आरोपी को नियमित जमानत का अधिकार स्वतः मिल गया है।इस मामले की पृष्ठभूमि वर्ष 2017 में दर्ज आतंकवाद के वित्तपोषण से संबंधित जांच से जुड़ी है। एनआईए ने अक्टूबर 2019 में राशिद का नाम आरोपपत्र में शामिल किया था। इसके बाद मार्च 2022 में विशेष एनआईए अदालत ने राशिद और अन्य आरोपियों के खिलाफ विभिन्न धाराओं के अंतर्गत आरोप तय किए थे।इनमें आपराधिक साजिश, सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने से संबंधित तत्कालीन भारतीय दंड संहिता के प्रावधान और यूएपीए की संबंधित धाराएं शामिल थीं। आरोप तय होना दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। आरोपियों की दोषसिद्धि या निर्दोषता का फैसला अदालत साक्ष्यों और सुनवाई के आधार पर करेगी।मामले में एक अन्य आरोपी शब्बीर अहमद शाह को मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने का उल्लेख भी सामने आया है। हालांकि, किसी सह-आरोपी को जमानत मिलने के आधार पर दूसरे आरोपी की जमानत स्वतः तय नहीं होती। अदालत प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका, आरोपों और उपलब्ध सामग्री के आधार पर निर्णय लेती है।इंजीनियर राशिद का मामला राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह जम्मू-कश्मीर के एक निर्वाचित लोकसभा सांसद हैं। उनके लंबे समय तक जेल में रहने से संसदीय प्रतिनिधित्व और आपराधिक न्याय प्रक्रिया के बीच संतुलन का प्रश्न भी चर्चा में बना हुआ है।फिलहाल दिल्ली हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया है। इसका मतलब है कि अदालत ने अभी जमानत मंजूर या खारिज करने का अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि न्यायालय एनआईए की आपत्तियों, मुकदमे की स्थिति और राशिद की हिरासत की अवधि को ध्यान में रखते हुए क्या निर्णय देता है।