नई दिल्ली: कांग्रेस ने शुक्रवार को लोकसभा में अपने सभी सदस्यों के लिए एक औपचारिक 'थ्री-लाइन व्हिप' जारी किया। इसमें उनसे 10, 11 और 12 अगस्त को सदन में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने को कहा गया है।यह निर्देश संसद के महत्वपूर्ण और संभावित रूप से विवादित विधायी कामकाज से पहले आया है, जिसमें 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट' यानी FCRA बिल पर चर्चा भी शामिल है।यह व्हिप लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के मुख्य व्हिप कोडिकुन्निल सुरेश ने जारी किया। 

व्हिप में कहा गया, "सोमवार, मंगलवार और बुधवार यानी 10, 11 और 12 अगस्त, 2026 को लोकसभा में चर्चा के लिए बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए जाएंगे।" इसमें आगे कहा गया, "लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के सभी सदस्यों से अनुरोध है कि वे सुबह 11:00 बजे से सदन के स्थगित होने तक सदन में उपस्थित रहें... और पार्टी के रुख का समर्थन करें।"इसमें यह भी कहा गया, "इसे अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाए।"केंद्र सरकार 12 अगस्त को संसद में 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026' पर चर्चा के लिए इसे पेश कर सकती है, जबकि मॉनसून सत्र के दौरान विपक्ष का विरोध कामकाज में बाधा डाल रहा है।

यह घटनाक्रम प्रस्तावित कानून के खिलाफ ईसाई समूहों और अल्पसंख्यक संगठनों द्वारा जताई गई आपत्तियों के बीच सामने आया है। इन समूहों के एक प्रतिनिधिमंडल ने गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर अपनी चिंताएं रखीं और बिल में बदलाव की मांग की। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने भी शाह से मुलाकात कर कानून के संबंध में क्षेत्रीय चिंताओं और सिफारिशों को औपचारिक रूप से पेश किया। उनके साथ एक प्रतिनिधिमंडल भी था, जिसमें मिजोरम कोहरान ह्रुआइतु कमिटी (MKHC) के अध्यक्ष रेवरेंड जॉन राल्डोसांगा और काउंसिल ऑफ चर्चेज इन मिजोरम (CCM) के महासचिव रेवरेंड लालहमांगाइहा शामिल थे।

सूत्रों के अनुसार, ईसाई प्रतिनिधियों ने मांग की कि या तो बिल को वापस ले लिया जाए या आगे की जांच-पड़ताल के लिए इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा जाए। इस बीच, भारत भर के ईसाई समुदायों, अल्पसंख्यक मंचों और चैरिटेबल संस्थाओं के प्रतिनिधियों के एक उच्च-स्तरीय दल ने गुरुवार को संसद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। उन्होंने 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026' (FCRA संशोधन विधेयक) के प्रति अपना कड़ा विरोध औपचारिक रूप से दर्ज कराया।

यह बैठक एक विस्तृत ज्ञापन और धारा-वार विश्लेषण सौंपने के बाद समाप्त हुई। इस पहल का नेतृत्व 'जॉइंट एक्शन फोरम ऑन माइनॉरिटीज' ने किया, जिसके प्रमुख वरिष्ठ वकील और DMK सांसद पी. विल्सन थे।

गृह मंत्री को सौंपे गए विस्तृत ज्ञापन में इस बात पर जोर दिया गया कि हालांकि प्रतिनिधिमंडल विदेशी फंड के उचित नियमन को सरकार का काम मानता है, लेकिन 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया 2026 का संशोधन विधेयक सामान्य नियमन से हटकर एक ऐसी व्यवस्था की ओर ले जाता है जिसमें संपत्ति जब्त की जा सकती है। इससे चैरिटेबल, शैक्षणिक और चिकित्सा संस्थाओं के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा है।

प्रतिनिधिमंडल ने औपचारिक रूप से तीन मुख्य सुधारात्मक कदमों की मांग की: FCRA संशोधन विधेयक, 2026 को पूरी तरह वापस लिया जाए या इसे मुख्य FCRA अधिनियम, 2010 की व्यापक समीक्षा के साथ संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा जाए; मुख्य FCRA अधिनियम, 2010 की धारा 15 को पूरी तरह खत्म किया जाए ताकि कानूनी ढांचे से संपत्ति के हस्तांतरण (vesting) का सिद्धांत हटाया जा सके; और यह सुनिश्चित किया जाए कि सर्टिफिकेट रिन्यूअल में प्रशासनिक या तकनीकी देरी के कारण सर्टिफिकेट अपने आप रद्द न हो, न ही संपत्ति का अस्थायी या स्थायी हस्तांतरण हो और न ही सामुदायिक व धार्मिक संपत्तियों को भारत के समेकित कोष (Consolidated Fund of India) में मिलाया जाए।

ज्ञापन में विस्तार से बताया गया कि प्रस्तावित कानून धार्मिक अल्पसंख्यकों और नागरिक समाज पर कैसे असर डालता है। प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि धारा 14B और अध्याय IIIA जैसे नए प्रावधानों के तहत, FCRA ऑनलाइन पोर्टल पर नौकरशाही की देरी या छोटी-मोटी तकनीकी कमियों के कारण सर्टिफिकेट अपने आप रद्द हो सकता है। इससे तुरंत संपत्ति का अस्थायी और स्थायी हस्तांतरण सरकार द्वारा अधिसूचित "नामित प्राधिकरण" (Designated Authority) के पास हो सकता है।

जो संस्थाएं मुख्य रूप से घरेलू योगदान, स्थानीय समुदाय के दान और CSR फंड से बनी हैं, उन्हें भी अपनी पूरी संपत्ति जब्त होने का खतरा है, भले ही उन्हें विदेशी अनुदान का बहुत छोटा हिस्सा ही मिला हो। ज्ञापन में तर्क दिया गया कि यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 25, 26, 29, 30 और 300A के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, और विशेष रूप से अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, अनाथालयों और पूजा स्थलों को प्रभावित करता है। मॉनसून सत्र के दौरान लोकसभा में 'विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026' को फिर से पेश किया गया। इस विधेयक का मकसद 'विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम, 2010' में संशोधन करना है, ताकि विदेशी योगदान के नियमन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाई जा सके।

प्रस्तावित कानून में यह प्रावधान है कि किसी संगठन का FCRA रजिस्ट्रेशन उसकी समय-सीमा खत्म होने, रिन्यू न कराने या सरकार द्वारा रिन्यूअल से इनकार करने पर रद्द हो जाएगा। इसमें विदेशी योगदान और उससे जुड़ी संपत्तियों के अधिकार, देखरेख, प्रबंधन और निपटान की निगरानी के लिए एक खास अथॉरिटी बनाने का भी प्रावधान है।

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