दिल्ली : कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने केंद्र सरकार पर संसद की कार्यप्रणाली और महत्वपूर्ण विधेयकों को लेकर निशाना साधा है। उन्होंने FCRA संशोधन विधेयक और परिसीमन के मुद्दे पर सरकार की रणनीति पर सवाल उठाते हुए तीखा तंज कसा। चिदंबरम ने कहा कि अगर सांसदों को अपने अधिकारों के अनुसार काम करने का मौका नहीं मिलता तो इससे अच्छा तो विधायक होना होता। उन्होंने आरोप लगाया कि संसद जैसी संस्था का महत्व कम किया जा रहा है।
चिदंबरम का यह बयान ऐसे समय आया है जब संसद में FCRA संशोधन विधेयक और परिसीमन से जुड़े मुद्दों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा नहीं करा रही है, जबकि सरकार का पक्ष है कि वह देशहित से जुड़े सुधारों को आगे बढ़ाने का काम कर रही है।
परिसीमन को लेकर चिदंबरम की चिंता
परिसीमन के मुद्दे पर चिदंबरम ने सरकार की प्रस्तावित प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि लोकसभा सीटों के पुनर्गठन से उन राज्यों पर असर पड़ सकता है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण जैसे कार्यक्रमों को गंभीरता से लागू किया है।
उन्होंने कहा कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन को अपनाया और जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया, उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान नहीं उठाना चाहिए। चिदंबरम का तर्क है कि राज्यों की मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखते हुए संतुलित व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने से संसद की गरिमा और कार्यप्रणाली पर असर पड़ सकता है। उनके अनुसार, प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ-साथ सदन की प्रभावशीलता बनाए रखना भी जरूरी है।
FCRA बिल पर भी जताई आपत्ति
विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA में प्रस्तावित बदलावों को लेकर भी चिदंबरम ने केंद्र सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि सरकार को इस विधेयक को वापस लेने पर विचार करना चाहिए। विपक्ष इस बिल को लेकर कई सवाल उठा रहा है और इसे लेकर व्यापक चर्चा की मांग कर रहा है।
चिदंबरम का कहना है कि ऐसे कानूनों पर संसद में विस्तार से बहस होनी चाहिए, क्योंकि इनका असर सामाजिक संस्थाओं और नागरिक संगठनों पर पड़ सकता है। उन्होंने सरकार से पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ने की मांग की।
संसद की भूमिका पर उठाए सवाल
कांग्रेस नेता ने संसद की कार्यवाही को लेकर भी चिंता जताई। उनका आरोप है कि सरकार विपक्ष की बातों को पर्याप्त महत्व नहीं दे रही और सदन में चर्चा की परंपरा कमजोर हो रही है।
उन्होंने कहा कि सांसदों का मुख्य काम कानून बनाना और जनता के मुद्दों को उठाना है। अगर उन्हें प्रभावी तरीके से अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिलता तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती है।
सरकार और विपक्ष आमने-सामने
FCRA और परिसीमन जैसे मुद्दे आने वाले समय में राजनीतिक बहस का केंद्र बने रह सकते हैं। बीजेपी का कहना है कि सरकार देश की जरूरतों के हिसाब से कानूनों में बदलाव कर रही है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि फैसले लेने से पहले व्यापक चर्चा जरूरी है।
परिसीमन को लेकर खासतौर पर दक्षिण भारतीय राज्यों में चिंता जताई जा रही है। विपक्ष का कहना है कि प्रतिनिधित्व तय करते समय राज्यों के हितों और संघीय ढांचे का ध्यान रखा जाना चाहिए।
चिदंबरम के बयान से बढ़ी सियासी हलचल
पी. चिदंबरम के बयान के बाद राजनीतिक माहौल और गर्म हो गया है। कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती से जोड़ रही है, जबकि सत्तारूढ़ दल विपक्ष के आरोपों को राजनीति से प्रेरित बता रहा है।
आने वाले दिनों में संसद में इन मुद्दों पर बहस और तेज होने की संभावना है। FCRA और परिसीमन दोनों ही विषय देश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े बड़े मुद्दे हैं, इसलिए इन पर होने वाली चर्चा काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
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