नई दिल्ली। भारतीय वायुसेना (IAF) भविष्य की युद्ध चुनौतियों से निपटने के लिए आधुनिक ड्रोन तकनीक और मानवरहित हवाई प्रणालियों को मजबूत करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है। इसी कड़ी में बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में भारतीय वायुसेना ने ड्रोन फेडरेशन इंडिया (DFI) के सहयोग से एक विशेष कार्यशाला आयोजित की। इसमें रक्षा उद्योग के प्रतिनिधियों को वायुसेना के 'अनमैन्ड एंड ऑटोनॉमस सिस्टम्स रोडमैप' के बारे में जानकारी दी गई। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्वदेशी रक्षा उद्योग, स्टार्टअप और तकनीकी विशेषज्ञों को वायुसेना की भविष्य की जरूरतों से अवगत कराना था।
100 से ज्यादा रक्षा विशेषज्ञों ने लिया हिस्सा
कार्यशाला में भारतीय वायुसेना और रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ ड्रोन फेडरेशन इंडिया के अध्यक्ष स्मित शाह तथा रक्षा उद्योग से जुड़े 100 से अधिक वरिष्ठ पेशेवरों ने भाग लिया।इस दौरान मानवरहित हवाई प्रणालियों के विकास, नई तकनीकों के इस्तेमाल और भारतीय रक्षा उद्योग की क्षमताओं को मजबूत करने पर चर्चा हुई।वायुसेना ने उद्योग जगत के सामने भविष्य की आवश्यकताओं को रखते हुए बताया कि आने वाले समय में ड्रोन तकनीक आधुनिक हवाई अभियानों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने वाली है।
चार श्रेणियों में 16 ड्रोन प्लेटफॉर्म की योजना
भारतीय वायुसेना द्वारा प्रस्तुत रोडमैप में 16 प्लेटफॉर्म परिवारों की भविष्य की जरूरतों का उल्लेख किया गया है। इन्हें चार प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है।इनमें रणनीतिक, ऑपरेशनल, टैक्टिकल और डिस्ट्रीब्यूटेड या एट्रिटेबल प्लेटफॉर्म शामिल हैं।रणनीतिक श्रेणी में लंबी दूरी की निगरानी और महत्वपूर्ण अभियानों के लिए उपयोगी मानवरहित प्रणालियों पर जोर दिया गया है। ऑपरेशनल और टैक्टिकल श्रेणियों में विभिन्न स्तरों के सैन्य अभियानों में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन शामिल हो सकते हैं।वहीं, एट्रिटेबल प्लेटफॉर्म ऐसी प्रणालियां होती हैं, जिन्हें अपेक्षाकृत कम लागत पर तैयार किया जाता है और चुनौतीपूर्ण अभियानों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
ड्रोन के झुंड और एआई तकनीक पर विशेष जोर
आधुनिक युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्वायत्त प्रणालियां और ड्रोन स्वार्म तकनीक का महत्व लगातार बढ़ रहा है।स्वार्म तकनीक के माध्यम से कई ड्रोन एक साथ समन्वय बनाकर काम कर सकते हैं। इनका इस्तेमाल निगरानी, सूचना जुटाने और निर्धारित सैन्य अभियानों में किया जा सकता है।इसके अलावा मानव-मशीन टीमिंग के जरिए लड़ाकू विमानों और मानवरहित प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है।ऐसी तकनीक से भविष्य में सैन्य अभियानों की गति और प्रभावशीलता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
ड्रोनैथॉन में पहली बार पेश हुआ था रोडमैप
भारतीय वायुसेना ने अपने मानवरहित हवाई प्रणालियों के रोडमैप को सितंबर 2026 में राजस्थान के पोखरण में आयोजित ड्रोनैथॉन कार्यक्रम के दौरान पहली बार जारी किया था।14 से 16 सितंबर तक आयोजित इस कार्यक्रम में 20 से अधिक रक्षा कंपनियों, स्टार्टअप, सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों और तकनीकी नवाचार से जुड़े संगठनों ने हिस्सा लिया था।इस दौरान निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, ड्रोन स्वार्म और ड्रोन रोधी प्रणालियों जैसी तकनीकों का प्रदर्शन किया गया।वायुसेना ने स्वदेशी 'वायु उत्तम' प्रणाली का भी प्रदर्शन किया था, जो सैन्य और नागरिक ड्रोन की पहचान तथा निगरानी करने में सक्षम है।
आत्मनिर्भर भारत अभियान को मिलेगा बढ़ावा
इस पहल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य देश में विकसित ड्रोन तकनीकों को बढ़ावा देना है।भारतीय वायुसेना चाहती है कि घरेलू रक्षा कंपनियां और स्टार्टअप भविष्य की सैन्य जरूरतों के अनुरूप आधुनिक प्रणालियां विकसित करें।इसके तहत ड्रोन निर्माण के साथ सेंसर, संचार तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरण, स्वायत्त नियंत्रण प्रणाली और अन्य जरूरी तकनीकों के विकास पर भी ध्यान दिया जा रहा है।स्वदेशी उत्पादन बढ़ने से रक्षा उपकरणों के लिए विदेशी तकनीकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
भविष्य के युद्ध के लिए तैयार होगी वायुसेना
आधुनिक युद्ध में मानवरहित हवाई प्रणालियों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और जोखिम वाले क्षेत्रों में सैन्य अभियानों के संचालन में इनका व्यापक इस्तेमाल हो रहा है।भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह भी ड्रोन को लड़ाकू विमानों और मौजूदा हथियार प्रणालियों के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता पर जोर दे चुके हैं।नई दिल्ली में आयोजित कार्यशाला इस दिशा में उद्योग जगत और वायुसेना के बीच सहयोग बढ़ाने का प्रयास है। इससे स्वदेशी तकनीक के विकास और भविष्य की रक्षा तैयारियों को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
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