नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है। ब्रेंट क्रूड का भाव 85 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचने से भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत मिलने की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक इसी स्तर पर बनी रहती हैं या इससे ऊपर जाती हैं, तो पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ एलपीजी (
LPG
), सीएनजी (CNG) और विमान ईंधन जैसी ऊर्जा सेवाओं पर भी लागत का दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि, भारत में पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और सीएनजी की खुदरा कीमतें केवल कच्चे तेल की कीमत से तय नहीं होतीं। इन पर रुपये-डॉलर की विनिमय दर, टैक्स, रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च, विपणन कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति और सरकारी निर्णयों का भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
वैश्विक ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं। प्रमुख तेल उत्पादक देशों द्वारा उत्पादन नीति, विभिन्न क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक मांग में बदलाव और आपूर्ति संबंधी चिंताओं के कारण बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।
जब आपूर्ति सीमित होने की आशंका बढ़ती है या मांग मजबूत रहती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम ऊपर जाने लगते हैं। यही स्थिति फिलहाल देखने को मिल रही है, जिससे आयात पर निर्भर देशों की चिंता बढ़ गई है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने का सीधा असर आयात बिल पर पड़ता है। यदि लंबे समय तक कच्चा तेल महंगा रहता है तो तेल विपणन कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।
ऐसी स्थिति में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तत्काल बदलाव जरूरी नहीं होता, लेकिन यदि लागत का दबाव लगातार बना रहे तो भविष्य में कीमतों में कटौती की संभावना कम हो सकती है। दूसरी ओर, यदि सरकार टैक्स में राहत देती है या वैश्विक कीमतें फिर से नीचे आती हैं, तो उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है।
पेट्रोल-डीजल सस्ता होने की उम्मीद क्यों कमजोर पड़ी?
हाल के समय में यह उम्मीद जताई जा रही थी कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम नरम रहते हैं तो घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी संभव हो सकती है।
लेकिन अब कच्चे तेल की कीमतें 85 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचने से तेल कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ने की आशंका है। ऐसे में ईंधन की कीमतों में तत्काल राहत मिलने की संभावना पहले की तुलना में कमजोर मानी जा रही है। हालांकि अंतिम फैसला तेल विपणन कंपनियों और सरकारी नीतियों पर निर्भर करेगा।
LPG पर क्या हो सकता है असर?
एलपीजी सिलेंडर की कीमतों की समीक्षा समय-समय पर की जाती है। यदि अंतरराष्ट्रीय एलपीजी कीमतें और कच्चे तेल की लागत लगातार ऊंची बनी रहती हैं, तो भविष्य में घरेलू और व्यावसायिक एलपीजी की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि सरकार कई बार उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सब्सिडी, मूल्य समायोजन या अन्य नीतिगत कदम भी उठा सकती है। इसलिए केवल कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से एलपीजी की कीमतों में स्वतः वृद्धि तय नहीं मानी जा सकती।
क्या CNG भी महंगी हो सकती है?
सीएनजी की कीमतें मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस की लागत और गैस आपूर्ति व्यवस्था से प्रभावित होती हैं। फिर भी ऊर्जा बाजार में व्यापक लागत वृद्धि और परिवहन खर्च बढ़ने जैसी परिस्थितियों का अप्रत्यक्ष प्रभाव सीएनजी कीमतों पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वैश्विक ऊर्जा बाजार में महंगाई का दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो विभिन्न ईंधनों की लागत पर उसका असर देखने को मिल सकता है।
महंगाई पर भी पड़ सकता है असर
ईंधन महंगा होने का असर केवल वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने पर खाद्यान्न, फल-सब्जियां, निर्माण सामग्री, औद्योगिक उत्पाद और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
यही कारण है कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) दोनों ऊर्जा कीमतों पर लगातार नजर रखते हैं, क्योंकि ईंधन की लागत मुद्रास्फीति (Inflation) को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में से एक है।
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