नई दिल्ली। बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर, मैनेजमेंट प्रोफेशनल या किसी विदेशी यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा दिलाने का सपना लगभग हर माता-पिता देखते हैं। लेकिन हायर एजुकेशन की लगातार बढ़ती लागत इस सपने को पूरा करना आसान नहीं रहने देती। अच्छे कॉलेज में एडमिशन मिलते ही परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल आता है कि लाखों रुपये की फीस कहां से आएगी?
अगर माता-पिता के पास म्यूचुअल फंड, शेयर, फिक्स्ड डिपॉजिट या दूसरी बचत में पर्याप्त पैसा है तो एक और दुविधा पैदा होती है—**बच्चे की फीस भरने के लिए अपना निवेश तोड़ दें या एजुकेशन लोन लेकर निवेश को आगे बढ़ने दें?**
इस सवाल का एक जवाब हर परिवार के लिए सही नहीं हो सकता। फैसला परिवार की आय, निवेश की रकम, रिटायरमेंट की दूरी, बच्चे के कोर्स, भविष्य की कमाई और एजुकेशन लोन की ब्याज दर जैसे कई पहलुओं पर निर्भर करता है।
हाल में ET Wealth के सामने भी ऐसा ही एक मामला आया। एक अभिभावक के बेटे की MBBS की पढ़ाई पर करीब ₹21 लाख खर्च होने थे और सवाल था कि निवेश बेचकर फीस दी जाए या एजुकेशन लोन लिया जाए। वित्तीय विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे मामलों में पूरा निवेश खत्म करने के बजाय लोन और उपलब्ध फंड का संतुलित इस्तेमाल बेहतर हो सकता है।
पहले समझें आपकी असली आर्थिक स्थिति
एजुकेशन लोन लेने या निवेश तोड़ने से पहले अपनी पूरी आर्थिक स्थिति का आकलन करना जरूरी है।
मान लीजिए बच्चे की पढ़ाई पर ₹20 लाख खर्च होने हैं और आपके पास ₹25 लाख का निवेश है।
सिर्फ यह देखकर पूरा ₹20 लाख निकाल लेना कि आपके पास पर्याप्त पैसा मौजूद है, जरूरी नहीं कि सही फैसला हो।
आपको देखना होगा कि यही ₹25 लाख आपके रिटायरमेंट फंड का हिस्सा तो नहीं है।
इसके अलावा परिवार के पास अलग इमरजेंसी फंड है या नहीं, हेल्थ इंश्योरेंस और टर्म इंश्योरेंस पर्याप्त है या नहीं और पहले से होम लोन या दूसरे कर्ज की EMI कितनी है—इन सभी बातों को जोड़कर फैसला लेना चाहिए।
अगर पढ़ाई की पूरी रकम देने के बाद आपकी बचत लगभग खत्म हो जाती है तो भविष्य में किसी आपात स्थिति में मुश्किल हो सकती है।
पूरा निवेश तोड़ना क्यों पड़ सकता है भारी?
लंबी अवधि के निवेश का सबसे बड़ा फायदा कंपाउंडिंग है।
अगर कोई परिवार वर्षों से बच्चे की पढ़ाई, अपने रिटायरमेंट या दूसरी जरूरतों के लिए म्यूचुअल फंड और अन्य साधनों में निवेश कर रहा है तो अचानक बड़ी रकम निकालने से भविष्य की कंपाउंडिंग प्रभावित होती है।
उदाहरण के लिए, ₹15 लाख का निवेश अगर लंबे समय तक सालाना औसतन 10 प्रतिशत की दर से बढ़े तो 10 वर्षों में गणितीय रूप से करीब ₹38.9 लाख हो सकता है।
लेकिन यह केवल उदाहरण है। बाजार आधारित निवेश में 10 प्रतिशत रिटर्न की कोई गारंटी नहीं होती।
फिर भी यह उदाहरण बताता है कि लंबे समय के निवेश को समय से पहले तोड़ने की एक अवसर लागत होती है।
लेकिन सिर्फ रिटर्न देखकर लोन लेना भी गलत
यहां एक दूसरी गलती से भी बचना जरूरी है।
कई लोग सोचते हैं कि म्यूचुअल फंड से 12 प्रतिशत रिटर्न मिल जाएगा और एजुकेशन लोन 9 प्रतिशत पर मिलेगा, इसलिए निवेश को बिल्कुल नहीं छूना चाहिए और पूरा लोन ले लेना चाहिए।
ऐसी तुलना जोखिमपूर्ण है।
एजुकेशन लोन पर ब्याज निश्चित देनदारी है, जबकि शेयर बाजार या इक्विटी म्यूचुअल फंड का भविष्य का रिटर्न निश्चित नहीं है।
बाजार कई वर्षों तक कमजोर भी रह सकता है।
इसलिए भविष्य के अनुमानित शेयर बाजार रिटर्न को पक्का मानकर बड़ा कर्ज लेना सही वित्तीय रणनीति नहीं है।
बीच का रास्ता हो सकता है बेहतर
कई परिवारों के लिए सबसे व्यावहारिक तरीका **आंशिक निवेश + आंशिक एजुकेशन लोन** हो सकता है।
मान लीजिए पढ़ाई की लागत ₹20 लाख है।
परिवार अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार ₹7-10 लाख उपलब्ध बचत से दे सकता है और बाकी राशि के लिए एजुकेशन लोन ले सकता है।
इससे एक तरफ कर्ज की रकम कम रहेगी और दूसरी तरफ माता-पिता का पूरा निवेश भी खत्म नहीं होगा।
लेकिन कितना पैसा निवेश से निकालना है और कितना लोन लेना है, इसका कोई सार्वभौमिक अनुपात नहीं है।
यह परिवार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
रिटायरमेंट फंड को हाथ लगाने से पहले सोचें
बच्चे की शिक्षा बेहद महत्वपूर्ण लक्ष्य है, लेकिन इसके लिए माता-पिता को अपना पूरा रिटायरमेंट फंड खत्म करने से बचना चाहिए।
इसका कारण बेहद सरल है।
बच्चे की शिक्षा के लिए एजुकेशन लोन उपलब्ध हो सकता है, लेकिन माता-पिता के रिटायरमेंट के लिए ऐसा कोई सामान्य बैंक लोन उपलब्ध नहीं होता।
अगर 50-55 साल की उम्र में माता-पिता अपनी जीवनभर की बचत बच्चे की फीस में लगा देते हैं तो उनके पास दोबारा बड़ा रिटायरमेंट कॉर्पस तैयार करने के लिए सीमित समय बच सकता है।
इसलिए शिक्षा और रिटायरमेंट दोनों लक्ष्यों के बीच संतुलन जरूरी है।
इमरजेंसी फंड बिल्कुल खाली न करें
बच्चे की कॉलेज फीस भरने के लिए बैंक खाते या FD में मौजूद पूरा पैसा निकाल देना भी परेशानी पैदा कर सकता है।
परिवार के पास सामान्य तौर पर कई महीनों के जरूरी खर्च के बराबर इमरजेंसी फंड अलग रहना चाहिए।
नौकरी जाने, बीमारी, दुर्घटना या किसी दूसरी आपात स्थिति में यही पैसा काम आता है।
अगर फीस भरने के बाद खाते में लगभग कुछ नहीं बचता और उसी समय कोई बड़ी आर्थिक समस्या आती है तो परिवार को महंगे पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड कर्ज का सहारा लेना पड़ सकता है।
इसलिए शिक्षा के लिए पैसे निकालते समय आपातकालीन फंड को अलग रखना बेहतर है।
एजुकेशन लोन का फायदा क्या?
एजुकेशन लोन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बच्चे की पढ़ाई की बड़ी लागत को कई वर्षों में बांटा जा सकता है।
परिवार को एक ही बार में लाखों रुपये खर्च नहीं करने पड़ते।
कई एजुकेशन लोन में कोर्स अवधि और उसके बाद निर्धारित समय तक EMI भुगतान शुरू करने में राहत मिलती है।
इससे छात्र को पढ़ाई पूरी करने और नौकरी तलाशने का समय मिलता है।
भारत में एजुकेशन लोन के लिए बैंक अलग-अलग योजनाएं चलाते हैं और नियम, ब्याज दर, मार्जिन तथा सिक्योरिटी की शर्तें बैंक और संस्थान के हिसाब से बदल सकती हैं।
₹7.5 लाख तक के लोन में राहत
सरकार की शिक्षा ऋण व्यवस्था में छोटे एजुकेशन लोन के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुविधाएं उपलब्ध हैं।
IBA मॉडल एजुकेशन लोन व्यवस्था के तहत पात्र मामलों में **₹7.5 लाख तक के शिक्षा ऋण को बिना कोलैटरल** उपलब्ध कराने के लिए Credit Guarantee Fund Scheme for Education Loans का प्रावधान रहा है।
इस मॉडल में ₹7.5 लाख तक मार्जिन नहीं रखने और पढ़ाई पूरी होने के बाद एक वर्ष का मोरेटोरियम जैसी सुविधाएं भी बताई गई हैं।
हालांकि वास्तविक लोन लेने से पहले संबंधित बैंक की मौजूदा शर्तें जरूर जांचनी चाहिए क्योंकि बैंक और स्कीम के अनुसार नियम अलग हो सकते हैं।
लोन की EMI का हिसाब पहले लगाएं
लोन लेने से पहले यह देखना बेहद जरूरी है कि पढ़ाई पूरी होने के बाद उसकी EMI कितनी बनेगी।
मान लीजिए आपने ₹15 लाख का एजुकेशन लोन लिया।
अगर ब्याज समेत उसकी EMI भविष्य में इतनी ज्यादा बन जाती है कि बच्चे की शुरुआती सैलरी का बड़ा हिस्सा उसी में चला जाए तो करियर की शुरुआत आर्थिक दबाव के साथ हो सकती है।
इसलिए केवल कॉलेज का नाम देखकर लोन की कोई भी रकम स्वीकार नहीं करनी चाहिए।
कोर्स के बाद संभावित रोजगार, शुरुआती वेतन और लोन चुकाने की वास्तविक क्षमता का अनुमान लगाना जरूरी है।
कोर्स की कमाई की क्षमता भी देखें
₹20-30 लाख का एजुकेशन लोन हर कोर्स के लिए समान रूप से उचित नहीं हो सकता।
अगर बच्चा ऐसे संस्थान या कोर्स में जा रहा है जहां प्लेसमेंट मजबूत है और स्नातक होने के बाद अच्छी आय की संभावना है तो लोन चुकाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
लेकिन अगर कोर्स की फीस बहुत ज्यादा है और औसत शुरुआती वेतन कम है तो बड़ा एजुकेशन लोन वित्तीय बोझ बन सकता है।
इसीलिए कॉलेज चुनते समय केवल उसकी ब्रांडिंग नहीं बल्कि वास्तविक प्लेसमेंट रिकॉर्ड, औसत वेतन, कोर्स की मान्यता और कुल लागत देखनी चाहिए।
MBBS जैसे कोर्स में समीकरण अलग
मेडिकल शिक्षा जैसे लंबे कोर्स में फैसला और सावधानी से करना पड़ता है।
MBBS पूरा करने में कई साल लगते हैं और इसके बाद छात्र पोस्ट ग्रेजुएशन भी करना चाह सकता है।
ऐसी स्थिति में कमाई शुरू होने में समय लग सकता है।
अगर परिवार बड़ा एजुकेशन लोन लेता है तो मोरेटोरियम के दौरान ब्याज कैसे जुड़ेगा, यह समझना जरूरी है।
इसी तरह विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए ट्यूशन फीस के अलावा रहने, यात्रा, बीमा और करेंसी में बदलाव की लागत भी शामिल करनी चाहिए।
ब्याज पर मिल सकता है टैक्स लाभ
एजुकेशन लोन का एक महत्वपूर्ण पहलू आयकर अधिनियम की **धारा 80E** है।
इसके तहत पात्र उच्च शिक्षा ऋण पर चुकाए गए ब्याज के लिए कटौती का प्रावधान है।
यह लाभ उस वर्ष से मिलता है जब ब्याज का भुगतान शुरू होता है और अधिकतम आठ असेसमेंट वर्षों तक या पूरा ब्याज चुकने तक—जो पहले हो—मिल सकता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि कटौती **ब्याज** पर होती है, मूलधन यानी प्रिंसिपल के भुगतान पर नहीं।
लेकिन यहां एक बड़ी सावधानी जरूरी है।
नई टैक्स व्यवस्था में Chapter VI-A की अधिकांश कटौतियां उपलब्ध नहीं हैं और धारा 80E का लाभ भी सामान्य रूप से नई टैक्स व्यवस्था में नहीं मिलता। इसलिए केवल टैक्स बचत के आधार पर एजुकेशन लोन लेने का फैसला नहीं करना चाहिए।
किस निवेश को पहले इस्तेमाल करें?
अगर शिक्षा के लिए निवेश से पैसा निकालना ही है तो सभी निवेश को एक जैसा नहीं मानना चाहिए।
सबसे पहले उस निवेश को देखा जा सकता है जिसे मूल रूप से बच्चे की शिक्षा के लक्ष्य के लिए ही बनाया गया था।
अगर वर्षों से अलग एजुकेशन कॉर्पस तैयार किया गया है और अब लक्ष्य का समय आ गया है तो उस पैसे का इस्तेमाल स्वाभाविक है।
इसके बाद कम जोखिम और ज्यादा लिक्विड निवेश पर विचार किया जा सकता है।
लेकिन रिटायरमेंट के लिए बनाई गई दीर्घकालिक इक्विटी होल्डिंग, EPF, NPS या दूसरी महत्वपूर्ण बचत को केवल इसलिए खत्म करना कि लोन लेने की जरूरत न पड़े, हमेशा सही फैसला नहीं होगा।
FD तोड़ें या एजुकेशन लोन लें?
अगर परिवार के पास बड़ी FD है तो यहां सीधी गणना उपयोगी हो सकती है।
देखें कि FD पर टैक्स के बाद वास्तविक रिटर्न कितना मिल रहा है और एजुकेशन लोन पर प्रभावी ब्याज कितना देना होगा।
अगर FD पर टैक्स के बाद 5-6 प्रतिशत मिल रहा है जबकि लोन पर 10-11 प्रतिशत देना पड़ रहा है, तो केवल FD बचाए रखने के लिए महंगा कर्ज लेना आर्थिक रूप से कमजोर सौदा हो सकता है।
ऐसे मामले में FD का कुछ हिस्सा इस्तेमाल करना ज्यादा तार्किक हो सकता है।
इसके विपरीत अगर FD इमरजेंसी फंड है तो उसे पूरी तरह खत्म करना भी उचित नहीं होगा।
इक्विटी निवेश का मामला अलग
म्यूचुअल फंड और शेयरों में तुलना थोड़ी मुश्किल है।
इनका भविष्य का रिटर्न निश्चित नहीं है।
अगर बच्चे की पढ़ाई अगले कुछ महीनों में शुरू होने वाली है और फीस के लिए इक्विटी निवेश पर निर्भरता है तो बाजार गिरने का जोखिम रहता है।
इसी कारण किसी नजदीकी वित्तीय लक्ष्य के लिए जरूरी रकम को अंतिम समय तक पूरी तरह इक्विटी में रखना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
जैसे-जैसे शिक्षा का लक्ष्य करीब आता है, आवश्यक राशि का एक हिस्सा कम उतार-चढ़ाव वाले साधनों में स्थानांतरित करने की रणनीति अपनाई जा सकती है।
माता-पिता या बच्चा कौन चुकाएगा लोन?
यह सवाल लोन लेने से पहले ही तय होना चाहिए।
आमतौर पर शिक्षा ऋण में छात्र मुख्य उधारकर्ता और माता-पिता या अभिभावक सह-आवेदक हो सकते हैं। बैंक की योजना के अनुसार व्यवस्था अलग हो सकती है।
लेकिन परिवार को आपस में स्पष्ट करना चाहिए कि नौकरी लगने के बाद EMI बच्चा चुकाएगा या माता-पिता।
इससे भविष्य की वित्तीय योजना बेहतर बनती है।
हालिया विशेषज्ञ चर्चा में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि प्राथमिक उधारकर्ता और वास्तविक EMI भुगतानकर्ता का चुनाव टैक्स, क्रेडिट स्कोर और भविष्य की वित्तीय योजना को प्रभावित कर सकता है।
छात्र पर जरूरत से ज्यादा कर्ज न डालें
शिक्षा को निवेश माना जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसी भी कीमत पर कोई भी डिग्री खरीदना आर्थिक रूप से सही है।
अगर ₹40 लाख की डिग्री के बाद औसत नौकरी ₹4-5 लाख सालाना की ही मिल रही है तो परिवार को फीस और लोन की व्यवहारिकता पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
कॉलेज की वेबसाइट पर दिखाए गए सबसे ऊंचे पैकेज के बजाय औसत और मीडियन प्लेसमेंट को देखना बेहतर है।
स्कॉलरशिप, फीस में छूट और दूसरे संस्थानों के विकल्प भी तलाशे जा सकते हैं।
पहले स्कॉलरशिप फिर निवेश फिर लोन
बच्चे की हायर स्टडी की फंडिंग को कई स्रोतों में बांटना अक्सर बेहतर हो सकता है।
सबसे पहले उपलब्ध स्कॉलरशिप, मेरिट सहायता या सरकारी सहायता की जांच करें।
इसके बाद शिक्षा के लिए पहले से बनाए गए कॉर्पस का इस्तेमाल करें।
फिर परिवार की ऐसी बचत पर विचार करें जिसे निकालने से रिटायरमेंट या इमरजेंसी सुरक्षा प्रभावित न हो।
बाकी कमी को एजुकेशन लोन से पूरा किया जा सकता है।
सरकार समर्थित Vidya Lakshmi व्यवस्था के जरिए छात्र विभिन्न बैंकों के शिक्षा ऋण के लिए आवेदन और आवेदन की स्थिति ट्रैक कर सकते हैं।
₹21 लाख की पढ़ाई हो तो क्या करें?
मान लीजिए बच्चे की कुल पढ़ाई का खर्च ₹21 लाख है।
अगर माता-पिता के पास ₹30 लाख का निवेश है लेकिन उसमें ₹20 लाख उनके रिटायरमेंट के लिए जरूरी हैं तो पूरी फीस निवेश से देना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
ऐसी स्थिति में शिक्षा के लिए उपलब्ध अतिरिक्त कॉर्पस का इस्तेमाल करके बाकी रकम के लिए लोन लेना ज्यादा संतुलित विकल्प हो सकता है।
लेकिन अगर माता-पिता के पास शिक्षा के लिए ही अलग से ₹25-30 लाख जमा हैं और पर्याप्त रिटायरमेंट तथा इमरजेंसी फंड भी मौजूद है तो केवल निवेश बचाए रखने के लिए ब्याज देकर पूरा एजुकेशन लोन लेने का खास फायदा नहीं हो सकता।
यानी असली सवाल **'लोन या निवेश?'** नहीं बल्कि **'कितना लोन और कितना निवेश?'** होना चाहिए।
फैसला लेने का आसान फॉर्मूला
सबसे पहले बच्चे की पढ़ाई की कुल लागत निकालें। इसमें केवल कॉलेज फीस नहीं बल्कि हॉस्टल, किताबें, लैपटॉप, यात्रा और दूसरे खर्च भी जोड़ें।
फिर शिक्षा के लिए अलग रखे गए कॉर्पस को देखें।
इसके बाद रिटायरमेंट और इमरजेंसी फंड को अलग कर दें।
अब जितनी कमी बचती है, उसके लिए एजुकेशन लोन की जरूरत और EMI का आकलन करें।
अंत में अलग-अलग बैंकों की ब्याज दर, मोरेटोरियम, प्रोसेसिंग फीस, कोलैटरल और प्रीपेमेंट की शर्तों की तुलना करें।
निवेश तोड़ें या एजुकेशन लोन लें?
इसका जवाब परिस्थितियों पर निर्भर है, लेकिन एक बात स्पष्ट है—**सिर्फ बच्चे की फीस भरने के लिए अपना पूरा निवेश और रिटायरमेंट कॉर्पस खत्म कर देना समझदारी नहीं है।**
इसी तरह निवेश से भविष्य में बहुत ऊंचे रिटर्न की उम्मीद करके जरूरत से ज्यादा एजुकेशन लोन लेना भी सही नहीं है।
बेहतर तरीका अक्सर दोनों के बीच संतुलन बनाना होता है।
शिक्षा के लिए पहले से जमा रकम का इस्तेमाल करें, पर्याप्त इमरजेंसी फंड बचाकर रखें, रिटायरमेंट को नुकसान पहुंचाने से बचें और जितनी वास्तविक कमी हो उतना ही एजुकेशन लोन लें।
बच्चे की पढ़ाई भविष्य में उसकी कमाई की क्षमता बढ़ा सकती है, लेकिन माता-पिता की आर्थिक सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
इसीलिए लाखों रुपये की हायर स्टडी की योजना बनाते समय भावनाओं के साथ गणित भी जरूरी है। सही फैसला वह होगा जिसमें **बच्चे की पढ़ाई भी पूरी हो और परिवार की बाकी वित्तीय जिंदगी कर्ज या खाली बचत के दबाव में न आए।**