नई दिल्ली। देश में डिजिटल पेमेंट की तस्वीर बदलने वाले यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI को लेकर बड़ा बदलाव सामने आया है। केंद्र सरकार के नए नोटिफिकेशन और उसके बाद NPCI की घोषणा ने ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट पेमेंट पर लगने वाले शुल्क की तस्वीर साफ कर दी है। इसी मुद्दे पर BharatPe के पूर्व सह-संस्थापक **अश्नीर ग्रोवर** ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
अश्नीर ग्रोवर लंबे समय से UPI पर Merchant Discount Rate यानी MDR लगाए जाने का विरोध करते रहे हैं। उनका कहना है कि UPI पर किसी भी तरह का शुल्क भारत में मोबाइल पेमेंट की सफलता को नुकसान पहुंचा सकता है।
सरकार ने 14 सितंबर को नोटिफिकेशन जारी कर स्पष्ट किया था कि **₹2,000 तक के UPI भुगतान पर बैंक या सिस्टम प्रोवाइडर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शुल्क नहीं लगा सकते।**
लेकिन इस नोटिफिकेशन ने पुराने उस व्यापक प्रावधान को बदल दिया जिसमें UPI भुगतान को पूरी तरह शुल्क से सुरक्षा मिली हुई थी। इससे ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर शुल्क लगाने का रास्ता खुल गया।
इसके एक दिन बाद NPCI ने बड़ा फैसला लेते हुए घोषणा की कि **15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा Person-to-Merchant UPI भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होगा।
अश्नीर ग्रोवर क्यों भड़के?
अश्नीर ग्रोवर का तर्क है कि UPI भारत की सबसे बड़ी तकनीकी और डिजिटल भुगतान उपलब्धियों में से एक है।
उन्होंने UPI पर शुल्क लगाने की सोच की आलोचना करते हुए इसे टैक्स कलेक्शन जैसा बताया है।
उनका सवाल है कि जब बैंकों की कमाई मजबूत है और UPI ने देश में डिजिटल भुगतान को अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचा दिया है तो छोटे दुकानदारों और कारोबारियों पर अतिरिक्त बोझ क्यों डाला जाए।
ग्रोवर का मानना है कि अगर डिजिटल भुगतान महंगा हुआ तो व्यापारी और ग्राहक फिर नकदी की तरफ जा सकते हैं।
'UPI को बाय-बाय' क्यों कहा?
अश्नीर ग्रोवर पहले भी चेतावनी दे चुके हैं कि UPI पर MDR लगाना मोबाइल पेमेंट के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।
उनके मुताबिक UPI की सबसे बड़ी ताकत यही रही है कि भुगतान करने और स्वीकार करने की लागत बेहद कम रखी गई।
छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी तक QR कोड लगाकर आसानी से पैसे स्वीकार करने लगे।
अगर अब व्यापारी को हर बड़े UPI भुगतान पर शुल्क देना पड़ेगा तो उसके लिए डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की लागत बढ़ जाएगी।
यही कारण है कि ग्रोवर ने इसे UPI के मौजूदा मॉडल के लिए बड़ा खतरा बताया।
सरकार के नोटिफिकेशन में क्या था?
केंद्र सरकार के वित्तीय सेवा विभाग ने 14 सितंबर को Payment and Settlement Systems Act के तहत नया नोटिफिकेशन जारी किया।
इसमें दो प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों को शुल्क से वैधानिक सुरक्षा दी गई।
पहला RuPay डेबिट कार्ड और दूसरा **₹2,000 तक का UPI भुगतान**।
नोटिफिकेशन के अनुसार इन निर्धारित भुगतान माध्यमों का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति से बैंक या सिस्टम प्रोवाइडर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क नहीं ले सकते।
इसके बाद सबसे बड़ा सवाल पैदा हुआ कि ₹2,000 से ऊपर क्या होगा?
आज NPCI की घोषणा ने इस सवाल का काफी हद तक जवाब दे दिया।
₹2,000 से ऊपर 0.4% MDR
NPCI के मुताबिक 15 अक्टूबर से ₹2,000 से ज्यादा के पात्र **P2M यानी Person-to-Merchant** UPI ट्रांजैक्शन पर **0.4 प्रतिशत MDR** लगेगा।
यानी यह व्यवस्था उस भुगतान से जुड़ी है जिसमें कोई ग्राहक किसी दुकानदार या कारोबारी को UPI से पैसे देता है।
₹2,000 या उससे कम के भुगतान पर यह MDR नहीं लगेगा।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि MDR और ग्राहक से सीधे लिया जाने वाला शुल्क एक ही चीज नहीं हैं।
MDR सामान्य रूप से व्यापारी द्वारा भुगतान स्वीकार करने की लागत होती है।
दोस्त को ₹5,000 भेजे तो क्या चार्ज लगेगा?
**नहीं।**
अगर आप अपने दोस्त, रिश्तेदार या किसी दूसरे व्यक्ति के व्यक्तिगत UPI अकाउंट में ₹5,000 भेज रहे हैं तो यह Person-to-Person यानी **P2P ट्रांजैक्शन** है।
NPCI की नई व्यवस्था के मुताबिक P2P ट्रांजैक्शन फ्री बने रहेंगे।
इसलिए सोशल मीडिया पर चल रहा यह दावा कि 15 अक्टूबर के बाद किसी को भी ₹2,000 से ज्यादा Google Pay, PhonePe या दूसरे UPI ऐप से भेजने पर 0.4 प्रतिशत देना होगा, सही नहीं है।
नई MDR व्यवस्था मुख्य रूप से मर्चेंट पेमेंट से जुड़ी है।
दुकान पर ₹5,000 का भुगतान किया तो?
अगर आप किसी मर्चेंट को ₹5,000 का पात्र UPI भुगतान करते हैं तो नई व्यवस्था के तहत उस ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत MDR बन सकता है।
₹5,000 का 0.4 प्रतिशत यानी **₹20** होता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ग्राहक के बैंक खाते से ₹5,020 काट लिए जाएंगे।
MDR मर्चेंट पेमेंट सिस्टम की लागत है और मौजूदा घोषणा इसे मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर लागू करती है।
ग्राहक पर इसे अलग से पास करने की अनुमति और तरीका लागू नियमों तथा भुगतान व्यवस्था पर निर्भर करेगा।
इसलिए अभी ग्राहक को सीधे 0.4 प्रतिशत अतिरिक्त देना होगा, ऐसा लिखना भ्रामक होगा।
₹10,000 पर कितना MDR?
अगर ₹10,000 का पात्र मर्चेंट UPI ट्रांजैक्शन होता है तो 0.4 प्रतिशत के हिसाब से MDR **₹40** बनेगा।
₹25,000 पर यह ₹100 होगा।
₹50,000 पर 0.4 प्रतिशत के हिसाब से ₹200 होगा।
हालांकि NPCI ने बड़े भुगतान के लिए शुल्क की अधिकतम सीमा भी तय की है।
₹75,000 के बाद अधिकतम ₹300
NPCI की नई व्यवस्था में ₹75,000 या उससे अधिक के पात्र मर्चेंट भुगतान पर MDR की अधिकतम सीमा **₹300 प्रति ट्रांजैक्शन** रखी गई है।
इसका अर्थ है कि बड़ी रकम के भुगतान पर शुल्क लगातार प्रतिशत के हिसाब से बढ़ता नहीं जाएगा।
₹75,000 का 0.4 प्रतिशत ₹300 बनता है।
इसके ऊपर भी पात्र ट्रांजैक्शन पर MDR की सीमा ₹300 रहेगी।
छोटे भुगतान पूरी तरह सुरक्षित
भारत में UPI का बहुत बड़ा इस्तेमाल रोजमर्रा के छोटे भुगतान के लिए होता है।
चाय, नाश्ता, किराना, ऑटो, सब्जी और दूसरी छोटी खरीदारी के लिए लोग QR कोड स्कैन करके भुगतान करते हैं।
₹2,000 तक के UPI भुगतान को सरकार के नोटिफिकेशन के जरिए शुल्क से सुरक्षा दी गई है।
यानी सामान्य छोटे डिजिटल भुगतान को फ्री बनाए रखने की कोशिश की गई है।
RuPay डेबिट कार्ड पर अलग नियम
सरकार के नोटिफिकेशन में RuPay डेबिट कार्ड को भी शामिल किया गया है।
लेकिन यहां ₹2,000 की सीमा लागू नहीं है।
RuPay डेबिट कार्ड भुगतान को नोटिफिकेशन में अलग से शुल्क सुरक्षा दी गई है।
इसलिए UPI और RuPay डेबिट कार्ड की नई व्यवस्था को एक जैसा समझना सही नहीं होगा।
आखिर MDR होता क्या है?
Merchant Discount Rate यानी MDR वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की व्यवस्था उपलब्ध कराने के बदले मर्चेंट साइड से लिया जाता है।
मान लीजिए आपने किसी दुकान पर कार्ड से ₹10,000 का भुगतान किया।
कार्ड नेटवर्क, बैंक, पेमेंट प्रोसेसर और दूसरी संस्थाएं उस भुगतान को प्रोसेस करती हैं।
इसके बदले व्यापारी को एक निश्चित प्रतिशत शुल्क देना पड़ सकता है।
UPI पर लंबे समय से Zero-MDR व्यवस्था ने इसी लागत को व्यापारी के लिए समाप्त रखा था।
यही UPI की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता की प्रमुख वजहों में से एक मानी जाती है।
2020 से जीरो MDR ने बदली तस्वीर
भारत ने जनवरी 2020 से UPI और RuPay डेबिट कार्ड के लिए Zero-MDR व्यवस्था को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया था।
इसके बाद छोटे दुकानदारों के लिए डिजिटल भुगतान स्वीकार करना आसान हो गया।
दुकानदार को महंगी POS मशीन लगाने की जरूरत नहीं थी।
एक QR कोड से काम चल जाता था और भुगतान सीधे बैंक खाते में पहुंच जाता था।
इसके बाद महामारी के दौरान डिजिटल भुगतान और तेजी से बढ़ा।
आज UPI देश के रोजमर्रा के भुगतान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
फिर MDR वापस क्यों?
यहीं सरकार, बैंकों और पेमेंट इंडस्ट्री का दूसरा पक्ष सामने आता है।
UPI यूजर के लिए मुफ्त हो सकता है लेकिन उसे चलाने वाला पूरा सिस्टम मुफ्त में संचालित नहीं होता।
बैंकों को सर्वर, टेक्नोलॉजी, साइबर सुरक्षा, फ्रॉड मॉनिटरिंग, ग्राहक सहायता और भुगतान प्रोसेसिंग पर पैसा खर्च करना पड़ता है।
पेमेंट कंपनियों को भी QR नेटवर्क और तकनीकी ढांचे पर निवेश करना पड़ता है।
इंडस्ट्री लंबे समय से तर्क देती रही है कि Zero-MDR मॉडल में इस पूरे इकोसिस्टम को टिकाऊ तरीके से चलाना मुश्किल होता जा रहा है।
₹20,700 करोड़ की अनुमानित लागत
इस बहस के पीछे UPI सिस्टम की भारी परिचालन लागत भी है।
संसदीय स्थायी समिति के आकलन का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि 150 अरब Person-to-Merchant ट्रांजैक्शन और प्रति ट्रांजैक्शन लगभग ₹1.38 की लागत मानने पर UPI परिचालन की अनुमानित लागत करीब **₹20,700 करोड़** बैठ सकती है।
वहीं वित्त वर्ष 2026-27 में UPI संचालन के लिए करीब ₹2,000 करोड़ का बजटीय समर्थन इस अनुमानित लागत का लगभग दस प्रतिशत है।
इसी अंतर के कारण UPI को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने की बहस तेज हुई है।
अश्नीर ग्रोवर का तर्क अलग
ग्रोवर इस तर्क से सहमत नहीं दिखाई देते।
उनका कहना है कि UPI से देश की अर्थव्यवस्था को व्यापक लाभ हुआ है।
डिजिटल भुगतान बढ़ने से नकदी को छापने, पहुंचाने, ATM में रखने और संभालने से जुड़ी लागत कम हो सकती है।
इसके अलावा डिजिटल लेनदेन अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने में भी मदद करते हैं।
ग्रोवर का तर्क है कि UPI पर शुल्क लगाकर इसकी सफलता को कमजोर करने के बजाय इसके व्यापक आर्थिक फायदे देखने चाहिए।
क्या दुकानदार फिर कैश मांगेंगे?
यह नई व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक सवाल है।
मान लीजिए किसी दुकानदार का बड़ी रकम वाले UPI भुगतान का कारोबार ज्यादा है।
अगर उसे प्रत्येक पात्र भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR देना पड़ता है तो उसकी लागत बढ़ेगी।
ऐसी स्थिति में कुछ व्यापारी ग्राहक से कैश, RuPay डेबिट कार्ड या किसी दूसरे कम लागत वाले माध्यम से भुगतान मांग सकते हैं।
यही जोखिम अश्नीर ग्रोवर जैसे आलोचक उठा रहे हैं।
हालांकि वास्तविक असर 15 अक्टूबर के बाद ही स्पष्ट होगा।
ग्राहक पर क्या असर पड़ेगा?
सीधे तौर पर सबसे महत्वपूर्ण बात याद रखें—
**P2P UPI ट्रांसफर फ्री हैं।**
अगर आप दोस्त को ₹5,000 भेजते हैं तो नई MDR व्यवस्था लागू नहीं होगी।
अगर माता-पिता बच्चे को ₹10,000 भेजते हैं तो वह भी व्यक्तिगत P2P ट्रांसफर है।
अगर आप किसी दुकानदार को ₹3,000 का भुगतान करते हैं तो वह P2M ट्रांजैक्शन हो सकता है और पात्र होने पर मर्चेंट साइड पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होगा।
यानी ₹2,000 की सीमा देखकर यह समझना गलत है कि अब हर बड़ी UPI मनी ट्रांसफर महंगी हो गई है।
क्या UPI खत्म हो जाएगा?
अश्नीर ग्रोवर की 'UPI को बाय-बाय' वाली टिप्पणी उनकी आलोचनात्मक राय है, भविष्यवाणी को तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
UPI भारत का विशाल डिजिटल भुगतान नेटवर्क है और करोड़ों लोग इसका इस्तेमाल करते हैं।
₹2,000 तक के भुगतान को शुल्क से सुरक्षा मिली हुई है और व्यक्तिगत P2P भुगतान भी फ्री हैं।
इसलिए UPI अचानक खत्म हो जाएगा, ऐसा कहना सही नहीं होगा।
असल सवाल यह है कि बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत MDR से व्यापारियों के व्यवहार में कितना बदलाव आता है।
15 अक्टूबर से दिखेगा असली असर
नई व्यवस्था **15 अक्टूबर 2026** से लागू होगी।
इसके बाद पता चलेगा कि बड़े कारोबारी और छोटे व्यापारी इसे कैसे अपनाते हैं।
क्या दुकानदार सामान्य रूप से UPI लेते रहेंगे?
क्या कुछ कारोबारी ₹2,000 से ऊपर दूसरे भुगतान विकल्प को प्राथमिकता देंगे?
क्या मर्चेंट इस लागत को खुद वहन करेंगे?
इन सवालों के व्यावहारिक जवाब नई व्यवस्था लागू होने के बाद सामने आएंगे।
फिलहाल इतना साफ है कि UPI के Zero-MDR मॉडल में एक बड़ा बदलाव हो चुका है।
₹2,000 तक UPI भुगतान शुल्क से सुरक्षित रहेंगे, जबकि ₹2,000 से अधिक के पात्र P2M भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR लगेगा। P2P भुगतान फ्री रहेंगे।
अश्नीर ग्रोवर इसी बदलाव का विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि UPI पर शुल्क लगाने से भारत की सबसे सफल डिजिटल भुगतान व्यवस्था को नुकसान हो सकता है।
अब इस बहस का फैसला बयान नहीं बल्कि 15 अक्टूबर के बाद उपभोक्ताओं और व्यापारियों का व्यवहार करेगा।