
वर्ल्ड | ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच चागोस द्वीप समूह को लेकर समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है। इस समझौते का रास्ता तब साफ हुआ जब अमेरिका ने अपनी मंजूरी दे दी। हालांकि, इस विवाद का सबसे अहम पहलू अब भी अनसुलझा है—चागोस से विस्थापित किए गए हजारों लोगों का भविष्य क्या होगा?
चागोस द्वीप समूह हिंद महासागर में एक रणनीतिक रूप से अहम क्षेत्र है, जिसे ब्रिटेन ने 1960 के दशक में मॉरीशस से अलग कर दिया था। इसके बाद यहां अमेरिका का सैन्य अड्डा बनाया गया, जिससे स्थानीय आबादी को जबरन बेदखल होना पड़ा। मॉरीशस लंबे समय से इस क्षेत्र पर अपना हक जता रहा था, और अब जब ब्रिटेन और मॉरीशस इस पर समझौते के करीब हैं, विस्थापित लोग उम्मीद और अनिश्चितता के बीच झूल रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय पहले ही कह चुका है कि चागोस पर ब्रिटेन का कब्जा अवैध है और इसे मॉरीशस को सौंप देना चाहिए। इस फैसले के बावजूद ब्रिटेन ने इस मुद्दे पर लंबे समय तक टालमटोल की, लेकिन अब जब अमेरिका ने हरी झंडी दी है, तो दोनों देशों के बीच अंतिम समझौता जल्द ही हो सकता है।
हालांकि, विस्थापित चागोसवासी अभी भी संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें अपने मूल घर लौटने का अधिकार मिलेगा या नहीं, यह अब भी स्पष्ट नहीं है। चागोस से बेदखल हुए हजारों लोग दशकों से ब्रिटेन और अन्य देशों में शरण लिए हुए हैं। वे लगातार यह मांग कर रहे हैं कि उन्हें वापस जाने और अपने जीवन को फिर से बसाने का मौका दिया जाए।
मॉरीशस का दावा है कि वह चागोस द्वीप समूह का नियंत्रण मिलने के बाद विस्थापितों को वापस बुलाने की प्रक्रिया शुरू करेगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या ब्रिटेन और अमेरिका इस पर पूरी तरह सहमत होंगे? चागोस में अमेरिकी सैन्य अड्डा डिएगो गार्सिया बना हुआ है, और यह वाशिंगटन के लिए एक अहम रणनीतिक ठिकाना है। इसलिए, भले ही संप्रभुता मॉरीशस को सौंप दी जाए, लेकिन अमेरिका की सैन्य मौजूदगी बनी रह सकती है, जिससे विस्थापितों के लौटने में और मुश्किलें आ सकती हैं।
इस पूरे विवाद में मानवीय पक्ष सबसे महत्वपूर्ण है। दशकों पहले जब इन द्वीपों को खाली कराया गया था, तब लोगों को जबरदस्ती निकाला गया, और वे आज भी अपनी जमीन से दूर हैं। समझौते की प्रगति भले ही एक कूटनीतिक सफलता हो, लेकिन जब तक विस्थापितों को न्याय नहीं मिलता, यह मुद्दा पूरी तरह सुलझा हुआ नहीं माना जा सकता।





