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नेतन्याहू को फिर मिलेगा मौका या बदलेगी सत्ता? छोटे दलों पर टिकी नजर

jantaserishta.com
12 Oct 2026 1:22 PM IST
नेतन्याहू को फिर मिलेगा मौका या बदलेगी सत्ता? छोटे दलों पर टिकी नजर
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नई दिल्ली: इजराइल में 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले चार प्रमुख सर्वे में अलग-अलग तस्वीर सामने आई है। दो सर्वे में विपक्षी गठबंधन आगे है, एक में दोनों खेमे बराबर हैं, जबकि एक में नेतन्याहू का गठबंधन बढ़त बनाए हुए है। किसी भी खेमे को बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटें मिलती नहीं दिख रहीं। ऐसे में छोटे दलों और अरब पार्टियों का समर्थन सरकार गठन में निर्णायक साबित हो सकता है।
चुनाव से पहले इजराइल में सत्ता को लेकर असमंजस
इजराइल में 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज है। चार प्रमुख सर्वे में दो ने विपक्षी गठबंधन को बढ़त दी है, एक में दोनों खेमे बराबरी पर हैं, जबकि एक सर्वे में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन आगे है। चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प होता दिख रहा है।
इजराइल के चारों प्रमुख सर्वे में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। देश की संसद में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। ऐसे में चुनाव के बाद छोटे दलों का समर्थन सरकार गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
मतदाताओं की राय में नेतन्याहू को लेकर मतभेद
येरुशलम के महाने येहुदा बाजार में फल बेचने वाले 76 वर्षीय अब्राहम लेवी को उम्मीद है कि नेतन्याहू एक बार फिर सरकार बनाएंगे। उनका मानना है कि प्रधानमंत्री को अपना काम पूरा करने का अवसर मिलना चाहिए।
इसके उलट, येरुशलम की जाफा स्ट्रीट पर दुकान चलाने वाली इल्डा का कहना है कि 7 अक्टूबर 2023 को हुए हमास हमले की जिम्मेदारी नेतन्याहू को लेनी चाहिए। वहीं, तेल अवीव के जाफा इलाके में रहने वाले तुर्गेमान नेतृत्व में बदलाव चाहते हैं। उन्होंने गादी आइजनकोट का समर्थन करने की बात कही है।
इन अलग-अलग विचारों से पता चलता है कि इजराइल में चुनाव केवल सरकार चुनने तक सीमित नहीं है। मतदाताओं के सामने मौजूदा नेतृत्व की जवाबदेही और देश की सुरक्षा जैसे सवाल भी हैं।
हमास हमले के पीड़ित परिवारों में भी अलग-अलग विचार
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले में करीब 1,200 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद गाजा में इजराइल की सैन्य कार्रवाई में 74 हजार से अधिक फिलिस्तीनियों की जान जा चुकी है। इस संघर्ष की पृष्ठभूमि में सुरक्षा, सरकार की जवाबदेही और नागरिकों की रक्षा चुनाव के प्रमुख मुद्दे बनकर उभरे हैं।
हमले में अपने परिजनों को खोने वाले परिवारों की राय भी एक जैसी नहीं है। किबुत्ज बेरी की मेराव के माता-पिता इस हमले में मारे गए थे। मेराव का मानना है कि जिस सरकार के समय इतनी बड़ी घटना हुई, उसे दोबारा सत्ता में नहीं आना चाहिए।
दूसरी ओर, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी की उम्मीदवार तालिक देश में मजबूत नेतृत्व की पक्षधर हैं। इससे साफ है कि हमले से प्रभावित लोगों के बीच भी मौजूदा सरकार को लेकर अलग-अलग नजरिए मौजूद हैं।
फिलिस्तीन के अलग देश का मुद्दा चुनावी चर्चा में पीछे
इजराइल के चुनाव में फिलिस्तीन को स्वतंत्र देश बनाने का सवाल प्रमुख यहूदी राजनीतिक दलों की चर्चाओं में ज्यादा जगह नहीं बना पा रहा है। नेतन्याहू फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर इजराइल का सुरक्षा नियंत्रण बनाए रखने के पक्ष में हैं। विपक्ष के कई दल भी सुरक्षा के मामले में कड़ा रुख अपनाते हैं।
इसका मतलब है कि नेतन्याहू का विरोध करने वाले सभी दल फिलिस्तीन के भविष्य को लेकर उनसे पूरी तरह अलग विचार नहीं रखते। सत्ता परिवर्तन की मांग के बावजूद इस मुद्दे पर प्रमुख दलों के बीच अंतर सीमित दिखाई देता है।
सर्वे के अनुसार, विपक्षी मतदाताओं में 36 प्रतिशत और अरब नागरिकों में 57 प्रतिशत लोग दो राष्ट्र समाधान का समर्थन करते हैं। इस प्रस्ताव के तहत इजराइल और फिलिस्तीन के लिए अलग-अलग देशों की व्यवस्था होगी।
सरकार गठन में छोटे दल निभा सकते हैं अहम भूमिका
चुनाव में किसी भी गठबंधन को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में छोटे दल सत्ता का समीकरण बदल सकते हैं। नेतन्याहू के गठबंधन और विपक्ष, दोनों को सरकार बनाने के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाने की जरूरत पड़ सकती है।
उपलब्ध अनुमानों में कई छोटे दलों को सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। इनमें राअम पार्टी को 5 सीटें, संयुक्त अरब सूची को 7 से 9 सीटें, ओफर विंटर की पार्टी को 5 सीटें और हेंडेल-जेलखा को 4 सीटें मिलने का अनुमान शामिल है।
इस तरह इजराइल के चुनाव में केवल बड़े गठबंधनों का प्रदर्शन ही महत्वपूर्ण नहीं होगा, बल्कि छोटे दलों को मिलने वाला समर्थन भी सरकार गठन की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। चुनाव के बाद बहुमत जुटाने के लिए अलग-अलग दलों के बीच बातचीत और गठबंधन की भूमिका अहम रहने की संभावना है।
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