विश्व

सेना की वर्दी छोड़ पारंपरिक पोशाक क्यों अपनाते हैं हूती लड़ाके

Ratna Netam
12 Sept 2026 7:18 PM IST
सेना की वर्दी छोड़ पारंपरिक पोशाक क्यों अपनाते हैं हूती लड़ाके
x
नई दिल्ली। दुनिया के कई देशों की सेनाएं जहां आधुनिक वर्दी, हेलमेट, बुलेटप्रूफ जैकेट और खास सैन्य उपकरणों के साथ नजर आती हैं, वहीं यमन के हूती लड़ाके अक्सर बिल्कुल अलग अंदाज में दिखाई देते हैं। सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में उनकी तस्वीरें बार-बार सामने आती हैं, जिनमें कई लड़ाके साधारण कपड़े, चप्पल या पारंपरिक पोशाक पहने हुए रॉकेट, मिसाइल और ड्रोन जैसे आधुनिक हथियारों के साथ नजर आते हैं।
यही विरोधाभास लोगों के मन में सवाल पैदा करता है कि आखिर इतनी बड़ी सैन्य क्षमता रखने वाले हूती लड़ाके नियमित सेना जैसी वर्दी क्यों नहीं पहनते? क्या यह उनकी कमजोरी है या फिर इसके पीछे कोई रणनीति छिपी है?
दरअसल, हूती आंदोलन की प्रकृति एक पारंपरिक सेना से अलग है। यह एक सशस्त्र राजनीतिक और धार्मिक आंदोलन से विकसित हुआ समूह है, जिसने लंबे संघर्षों के दौरान गुरिल्ला युद्ध शैली अपनाई है।
हूती कौन हैं?
हूती या अंसार अल्लाह यमन का एक सशस्त्र राजनीतिक संगठन है।
इस आंदोलन की शुरुआत 1990 के दशक में यमन के उत्तरी सादा क्षेत्र से हुई थी। शुरुआत में यह धार्मिक-सामाजिक आंदोलन था, जो बाद में सरकार विरोधी सशस्त्र संगठन में बदल गया।
2014 में हूती लड़ाकों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया, जिसके बाद देश में गृहयुद्ध और गहरा गया।
इसके बाद हूती समूह यमन के सबसे प्रभावशाली सैन्य और राजनीतिक संगठनों में शामिल हो गया।
आज उनके पास मिसाइल, ड्रोन और रॉकेट जैसी क्षमताएं हैं, लेकिन उनकी लड़ने की शैली अभी भी पारंपरिक सेनाओं से अलग है।
सेना जैसी वर्दी क्यों नहीं पहनते?
हूती लड़ाकों के सेना जैसी वर्दी न पहनने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं।
1. गुरिल्ला युद्ध की रणनीति
हूती लंबे समय से गुरिल्ला शैली में लड़ते आए हैं।
गुरिल्ला युद्ध में लड़ाके अक्सर सामान्य कपड़ों में रहते हैं ताकि वे आसानी से आम लोगों के बीच घुल-मिल सकें और विरोधी सेना के लिए उन्हें पहचानना मुश्किल हो।
एक नियमित सेना जहां खुले मोर्चे पर लड़ती है, वहीं गुरिल्ला समूह छोटे-छोटे दस्तों में काम करते हैं।
उनका उद्देश्य अपनी पहचान छिपाकर अचानक हमला करना और फिर सुरक्षित स्थानों पर लौट जाना होता है।
2. स्थानीय पहचान बनाए रखना
हूती लड़ाकों की पोशाक उनके सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण से भी जुड़ी हुई है।
यमन में पारंपरिक कपड़े पहनना सामान्य बात है।
कई हूती लड़ाके स्थानीय पोशाक में दिखाई देते हैं, जिसमें लंबा कुर्ता, पगड़ी या सिर पर कपड़ा और पारंपरिक जूते शामिल हो सकते हैं।
उनके लिए यह केवल कपड़े नहीं बल्कि अपनी स्थानीय पहचान और आंदोलन से जुड़ा प्रतीक भी माना जाता है।
3. मनोवैज्ञानिक संदेश
किसी भी संघर्ष में प्रतीक और छवि बहुत मायने रखते हैं।
हूती लड़ाकों का साधारण पहनावा एक संदेश देने की कोशिश करता है कि वे आम लोगों में से हैं, कोई बड़ी औपचारिक सेना नहीं।
उनकी तस्वीरों में एक तरफ साधारण जीवनशैली दिखाई देती है और दूसरी तरफ बड़े हथियार।
यह विरोधाभास उनके समर्थकों के बीच एक खास तरह की छवि बनाता है कि सीमित संसाधनों वाला समूह भी बड़ी ताकतों को चुनौती दे सकता है।
4. नियमित सेना नहीं बल्कि आंदोलन
किसी देश की आधिकारिक सेना के लिए वर्दी, रैंक, पहचान और अनुशासन की एक निश्चित व्यवस्था होती है।
लेकिन हूती जैसे सशस्त्र समूहों की संरचना अलग होती है।
उनके सभी लड़ाके एक जैसी ट्रेनिंग, उपकरण या पोशाक के साथ नहीं होते।
कुछ इकाइयां अधिक संगठित हो सकती हैं और सैन्य शैली के कपड़े पहन सकती हैं, जबकि कई स्थानीय लड़ाके पारंपरिक कपड़ों में ही लड़ते हैं।
फिर आधुनिक हथियार कहां से आए?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि साधारण कपड़े पहनने वाले लड़ाकों के पास मिसाइल और ड्रोन जैसी तकनीक कहां से आई?
हूती समूह ने पिछले वर्षों में अपनी सैन्य क्षमता काफी बढ़ाई है।
उनके पास बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल, ड्रोन और समुद्री हमले की क्षमता विकसित हुई है।
हूती दावा करते हैं कि उन्होंने अपनी तकनीक और स्थानीय संसाधनों से यह क्षमता बनाई है।
वहीं अमेरिका और कई पश्चिमी देश आरोप लगाते रहे हैं कि ईरान से उन्हें तकनीकी और सैन्य सहायता मिलती है।
ईरान इन आरोपों को लेकर अलग-अलग समय पर अपना पक्ष रखता रहा है।
चप्पल और मिसाइल का विरोधाभास
हूती लड़ाकों की तस्वीरों में सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात की होती है, वह है—पैरों में चप्पल और हाथ में आधुनिक हथियार।
यह दृश्य इसलिए लोगों को चौंकाता है क्योंकि आधुनिक युद्ध की सामान्य तस्वीर इससे अलग होती है।
आम तौर पर सैनिकों को हेलमेट, बूट, वर्दी और सुरक्षा उपकरणों के साथ देखा जाता है।
लेकिन असममित युद्ध यानी ऐसी लड़ाई जिसमें एक पक्ष नियमित सेना हो और दूसरा गैर-राज्य समूह, वहां हथियारों और पहनावे के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे सकता है।
कई विद्रोही समूह कम संसाधनों में भी आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल करते हैं।
क्या बिना वर्दी लड़ना फायदेमंद है?
गुरिल्ला समूहों के लिए सामान्य कपड़े कई बार रणनीतिक लाभ दे सकते हैं।
वे स्थानीय इलाकों में आसानी से आवाजाही कर सकते हैं।
विरोधी के लिए यह पहचानना मुश्किल हो सकता है कि कौन लड़ाका है और कौन आम नागरिक।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत सशस्त्र संघर्ष में शामिल पक्षों की पहचान और नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े नियम महत्वपूर्ण होते हैं।
हूती की लड़ाई का तरीका
हूती लड़ाके मुख्य रूप से पहाड़ी इलाकों और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में सक्रिय रहे हैं।
यमन का भूगोल उनके लिए अनुकूल रहा है।
पहाड़ी इलाके, रेगिस्तानी क्षेत्र और स्थानीय समर्थन नेटवर्क ने उन्हें लंबे समय तक संघर्ष जारी रखने में मदद की।
वे बड़े सैन्य ठिकानों के बजाय छोटे समूहों, मोबाइल यूनिट और छिपे हुए ठिकानों का इस्तेमाल करते रहे हैं।
सोशल मीडिया ने बनाई अलग छवि
आज के समय में युद्ध केवल मैदान में नहीं बल्कि कैमरे और सोशल मीडिया पर भी लड़ा जाता है।
हूती अपने वीडियो और तस्वीरों के जरिए अपनी ताकत दिखाने की कोशिश करते हैं।
मिसाइल लॉन्च, ड्रोन हमले और लड़ाकों की तस्वीरें उनके प्रचार अभियान का हिस्सा होती हैं।
इन तस्वीरों में पारंपरिक कपड़े और आधुनिक हथियारों का मेल उनकी अलग पहचान बनाता है।
क्या सभी हूती ऐसे ही दिखते हैं?
नहीं।
यह समझना जरूरी है कि हर हूती लड़ाका एक जैसा नहीं होता।
संगठन के भीतर अलग-अलग स्तर के लड़ाके और यूनिट हैं।
कुछ लोग सैन्य शैली के कपड़े पहनते हैं, जबकि कई स्थानीय लड़ाके पारंपरिक पोशाक में दिखाई देते हैं।
सोशल मीडिया पर जो तस्वीरें सबसे ज्यादा वायरल होती हैं, वे अक्सर इसी विशिष्ट छवि को दिखाती हैं।
दुनिया की बड़ी सेनाओं से मुकाबला कैसे?
हूती समूह ने कई बार दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियों को चुनौती दी है।
यमन संघर्ष के दौरान उन्होंने सऊदी अरब और UAE जैसे क्षेत्रीय देशों के खिलाफ हमले किए।
बाद में लाल सागर क्षेत्र में जहाजों पर हमलों के कारण वे अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आए।
इन घटनाओं ने दिखाया कि आधुनिक युद्ध में केवल बड़ी सेना ही निर्णायक नहीं होती।
ड्रोन, मिसाइल, साइबर तकनीक और असममित रणनीति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
ईरान से संबंधों की चर्चा
हूती और ईरान के संबंध अंतरराष्ट्रीय राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं।
अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का कहना है कि ईरान हूती को हथियार और तकनीकी सहायता देता है।
वहीं हूती खुद को यमन का स्वतंत्र आंदोलन बताते हैं।
ईरान और हूती के संबंधों पर अलग-अलग देशों की अलग-अलग राय है।
क्या साधारण कपड़े उनकी कमजोरी हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार केवल पहनावे से किसी समूह की सैन्य क्षमता का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
इतिहास में कई ऐसे उदाहरण हैं जहां गैर-पारंपरिक सेनाओं या विद्रोही समूहों ने अपनी रणनीति के जरिए बड़ी सेनाओं को चुनौती दी।
हूती भी इसी तरह अपनी रणनीति, स्थानीय नेटवर्क और हथियार क्षमता के कारण प्रभावशाली बने हैं।
Next Story