
वॉशिंगटन। रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने और यूक्रेन युद्ध के लिए मॉस्को की आय के प्रमुख स्रोतों को कमजोर करने की दिशा में अमेरिका ने बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी सीनेट ने रूस और ईरान के खिलाफ कड़े प्रतिबंधों वाले ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। शुक्रवार को हुए मतदान में विधेयक के पक्ष में 86 और विरोध में 11 वोट पड़े। अब इस विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विचार के लिए भेजा जाएगा।
इस विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान उन देशों पर संभावित कार्रवाई से जुड़ा है जो बड़े पैमाने पर रूसी कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदते हैं। विधेयक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस की ऊर्जा खरीद पर निर्भर शीर्ष पांच देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। हालांकि, यह टैरिफ अपने आप लागू नहीं होगा। अंतिम फैसला राष्ट्रपति के पास रहेगा। विधेयक में ऐसे देशों को निशाना बनाने का प्रावधान है जो रूसी ऊर्जा खरीद के जरिए मॉस्को की अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं।
भारत और चीन पर सबसे ज्यादा नजर
इस प्रावधान के चलते भारत और चीन पर विशेष नजर है। दोनों देश रूसी तेल के बड़े खरीदारों में शामिल हैं। अमेरिकी सांसदों का तर्क है कि रूसी तेल और गैस से होने वाली आय रूस की युद्ध क्षमता को आर्थिक आधार देती है। इसलिए केवल रूस पर प्रतिबंध लगाने के बजाय उसके बड़े ऊर्जा खरीदारों पर दबाव बनाना जरूरी है।
अमेरिकी सीनेट में इस विधेयक के समर्थकों ने साफ कहा है कि रूस की ऊर्जा बिक्री से मिलने वाला राजस्व उसकी युद्ध मशीन के लिए महत्वपूर्ण है। अमेरिकी सांसद जॉन बैरासो ने कहा कि रूस का सबसे बड़ा ग्राहक चीन और उसके बाद भारत है तथा ये देश इस कानून के तहत दबाव में आ सकते हैं।
भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले वर्षों में भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदा है। पश्चिमी देशों द्वारा रूसी ऊर्जा पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भारत रूसी तेल के प्रमुख खरीदारों में उभरा है। इससे भारतीय रिफाइनरियों को अपेक्षाकृत सस्ता कच्चा तेल हासिल करने में मदद मिली है। यदि भविष्य में अमेरिकी राष्ट्रपति भारत जैसे किसी देश पर अतिरिक्त टैरिफ लागू करते हैं तो इसका असर दोनों देशों के व्यापार संबंधों पर पड़ सकता है।
रूस पर सीधे भी कसेगा शिकंजा
विधेयक केवल रूस के तेल खरीदारों को निशाना बनाने तक सीमित नहीं है। इसमें रूस के अधिकारियों, बड़े कारोबारी समूहों, उनके परिवारों, रूसी बैंकों और वित्तीय संस्थानों तथा रूस के तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ पर भी प्रतिबंधों का प्रावधान है। शैडो फ्लीट उन जहाजों के नेटवर्क को कहा जाता है जिनका इस्तेमाल रूस से जुड़े ऊर्जा व्यापार को पश्चिमी प्रतिबंधों से बचाने के लिए किए जाने का आरोप है।
विधेयक में उन विदेशी संस्थाओं और व्यक्तियों को भी निशाना बनाने की व्यवस्था है जो रूस को लगाए गए प्रतिबंधों से बचने में मदद करते हैं। इसके अलावा ईरान के ऊर्जा और हथियार क्षेत्रों से जुड़े प्रतिबंधों को जारी रखने का प्रावधान भी इसमें शामिल है। इस तरह यह विधेयक रूस और ईरान दोनों पर अमेरिकी आर्थिक दबाव को बढ़ाने की व्यापक कोशिश है।
दिवंगत सीनेटर ग्राहम के नाम पर बिल
इस विधेयक का नाम रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ओ. ग्राहम के नाम पर रखा गया है। ग्राहम रूस के खिलाफ कड़े प्रतिबंधों और यूक्रेन के समर्थन के मुखर समर्थक रहे थे। उनकी मृत्यु के बाद उनके सहयोगियों ने इस विधेयक को उनकी विरासत के तौर पर आगे बढ़ाने का फैसला किया। जुलाई के अंत में दोनों दलों के सांसदों ने विधेयक को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी।
रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों के सांसदों के समर्थन के कारण विधेयक को सीनेट में व्यापक समर्थन मिला। इससे संकेत मिलता है कि रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने के मुद्दे पर अमेरिकी संसद में अभी भी पर्याप्त द्विदलीय सहमति मौजूद है।
ट्रंप के सामने बड़ा फैसला
अब इस कानून की दिशा काफी हद तक राष्ट्रपति ट्रंप के फैसलों पर निर्भर करेगी। विधेयक उन्हें रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदार देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति देता है। हालांकि, राष्ट्रपति के पास यह तय करने की गुंजाइश रहेगी कि कब, किस देश पर और किस स्तर का टैरिफ लगाया जाए।
इसका मतलब यह है कि सीनेट से विधेयक पारित होने के बावजूद भारत या चीन पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं हो गया है। पहले प्रतिनिधि सभा में इस पर विचार होगा और इसके बाद कानून बनने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसके अलावा कानून बनने के बाद भी टैरिफ लगाने का निर्णय राष्ट्रपति के हाथ में रहेगा।
भारत-अमेरिका संबंधों पर असर की आशंका
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि रूस से ऊर्जा कारोबार और अमेरिका के साथ बढ़ते रणनीतिक संबंधों के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए। भारत लंबे समय से रूस से अपने रक्षा और ऊर्जा संबंधों को अलग-अलग रणनीतिक जरूरतों के आधार पर देखता रहा है। ऐसे में यदि अमेरिकी प्रशासन रूसी तेल खरीद को लेकर कठोर कदम उठाता है तो नई दिल्ली के सामने आर्थिक और कूटनीतिक चुनौती बढ़ सकती है।
वहीं अमेरिका का तर्क है कि रूस से ऊर्जा खरीद जारी रहने से मॉस्को को युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक संसाधन मिलते हैं। अमेरिकी सांसदों का मानना है कि रूस पर प्रभावी दबाव बनाने के लिए उसके ऊर्जा ग्राहकों को भी संदेश देना जरूरी है।
अब निगाहें अमेरिकी प्रतिनिधि सभा पर हैं। यदि वहां भी विधेयक पारित होता है और राष्ट्रपति इसे मंजूरी देते हैं, तो रूस के साथ कारोबार करने वाले बड़े देशों के लिए अमेरिकी बाजार में व्यापार की लागत काफी बढ़ सकती है। ऐसे में यह कानून केवल रूस की अर्थव्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा व्यापार और अमेरिका के चीन व भारत जैसे बड़े व्यापारिक साझेदारों के साथ संबंधों पर भी असर डाल सकता है।





