विश्व
भारत बांग्लादेश गंगा संधि पर घमासान बिहार के रुख से बढ़ी मुश्किल
Ratna Netam
5 Sept 2026 2:34 PM IST

x
नई दिल्ली। भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के पानी के बंटवारे का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। वर्ष 1996 में दोनों देशों के बीच हुई गंगा जल संधि दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है। संधि के नवीनीकरण को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही है, लेकिन इस बार मामला केवल नई दिल्ली और ढाका तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल के बाद बिहार की चिंताओं ने भी इस समझौते को अधिक जटिल बना दिया है। बिहार चाहता है कि बांग्लादेश के साथ किसी नए समझौते से पहले राज्य की पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक जरूरतों को पर्याप्त महत्व दिया जाए। केंद्र सरकार ने भी भरोसा दिया है कि कोई फैसला बिहार के हितों को ध्यान में रखकर ही किया जाएगा।
इस घटनाक्रम ने बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। गंगा का पानी बांग्लादेश के लिए कृषि, सिंचाई और सूखे मौसम में जल उपलब्धता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में मौजूदा संधि में बड़ा बदलाव या नई शर्तें ढाका के लिए चिंता का विषय बन सकती हैं।
आखिर क्या है गंगा जल संधि?
भारत और बांग्लादेश ने 12 दिसंबर 1996 को गंगा नदी के पानी के बंटवारे को लेकर एक महत्वपूर्ण समझौता किया था। इसे सामान्य तौर पर गंगा जल संधि या फरक्का संधि कहा जाता है। समझौते का मुख्य उद्देश्य सूखे मौसम के दौरान फरक्का के पास उपलब्ध गंगा जल को दोनों देशों के बीच निर्धारित व्यवस्था के अनुसार बांटना था।
यह समझौता 30 वर्षों के लिए किया गया था। इसलिए इसकी मौजूदा अवधि दिसंबर 2026 में पूरी हो रही है। अब सवाल यह है कि क्या इसे मौजूदा स्वरूप में आगे बढ़ाया जाएगा, इसकी शर्तों में बदलाव किया जाएगा या दोनों देश किसी नई व्यवस्था पर सहमत होंगे।
फिलहाल भारत सरकार ने यह नहीं कहा है कि संधि खत्म कर दी जाएगी। विदेश मंत्रालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि नवीनीकरण को लेकर चर्चा चल रही है। इसलिए अभी किसी अंतिम नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
बिहार ने क्यों उठाई आपत्ति?
बिहार की चिंता गंगा में उपलब्ध पानी और राज्य की भविष्य की जरूरतों से जुड़ी है। राज्य का तर्क है कि गंगा उसके लिए केवल एक नदी नहीं बल्कि पेयजल, सिंचाई, उद्योग और आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पानी बांटने से पहले नदी के ऊपरी हिस्से में स्थित भारतीय राज्यों की जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
बिहार से राज्यसभा सांसद और जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने इस मुद्दे को विदेश मंत्री एस. जयशंकर के सामने उठाया। इसके जवाब में विदेश मंत्री ने भरोसा दिया कि संधि से संबंधित फैसला लेते समय बिहार की जल आवश्यकताओं और हितों का ध्यान रखा जाएगा।
यही आश्वासन बांग्लादेश के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। इसका अर्थ यह है कि नई दिल्ली अब समझौते पर फैसला लेते समय केवल पिछली संधि की शर्तों को आधार नहीं बनाएगी बल्कि भारतीय राज्यों की मौजूदा और भविष्य की जरूरतों को भी बातचीत का हिस्सा बनाया जा सकता है।
पश्चिम बंगाल क्यों है अहम?
फरक्का बैराज पश्चिम बंगाल में स्थित है। इसलिए गंगा जल बंटवारे की किसी भी व्यवस्था में पश्चिम बंगाल का पक्ष स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण रहता है। राज्य में नदी के प्रवाह, सिंचाई, पेयजल, बंदरगाह और पर्यावरण से जुड़ी चिंताएं लंबे समय से उठती रही हैं।
यानी केंद्र सरकार के सामने एक तरफ बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय समझौते की जिम्मेदारी है तो दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों की मांगों को संतुलित करने की चुनौती है।
यही वजह है कि 2026 का नवीनीकरण 1996 की तुलना में अधिक जटिल साबित हो सकता है। तीन दशकों में आबादी, पानी की मांग, औद्योगिक जरूरतें और पर्यावरणीय परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं।
बांग्लादेश की टेंशन क्यों बढ़ी?
बांग्लादेश के लिए गंगा का पानी विशेष रूप से शुष्क मौसम में बेहद महत्वपूर्ण है। नदी का प्रवाह कम होने पर कृषि और सिंचाई से लेकर पर्यावरण तक कई क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है। इसलिए ढाका ऐसी व्यवस्था चाहेगा जिसमें उसे पानी की उपलब्धता को लेकर दीर्घकालिक भरोसा मिले।
अगर भारत नई संधि में बिहार और पश्चिम बंगाल की अतिरिक्त जरूरतों को ज्यादा महत्व देता है तो स्वाभाविक रूप से बांग्लादेश यह देखेगा कि उसके हिस्से की व्यवस्था पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।
हालांकि अभी यह कहना सही नहीं होगा कि भारत बांग्लादेश का पानी कम करने जा रहा है। कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। मौजूदा घटनाक्रम केवल यह बताता है कि नई संधि तैयार करना आसान नहीं होगा और भारतीय राज्यों की मांगों को नजरअंदाज करना केंद्र के लिए मुश्किल होगा।
तारिक रहमान सरकार क्या करेगी?
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के लिए यह मामला महत्वपूर्ण कूटनीतिक परीक्षा बन सकता है। उनकी सरकार चाहेगी कि भारत के साथ बातचीत के जरिए ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे बांग्लादेश में पानी की उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता पैदा न हो।
तारिक रहमान फरवरी 2026 में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी जीत के बाद उन्हें बधाई देते हुए दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों का उल्लेख किया था। भारत ने द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत करने की प्रतिबद्धता भी दोहराई थी।
ऐसे में गंगा जल संधि दोनों देशों के संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा होगी। ढाका को नई दिल्ली के साथ कूटनीतिक बातचीत के साथ यह भी समझना होगा कि भारत सरकार को अपने राज्यों की मांगों का जवाब देना है।
क्या भारत संधि खत्म कर सकता है?
फिलहाल ऐसा कोई फैसला नहीं हुआ है। यही पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है।
बिहार ने अपनी चिंताएं जरूर रखी हैं और केंद्र ने उन्हें ध्यान में रखने का भरोसा दिया है, लेकिन भारत सरकार ने यह घोषणा नहीं की है कि 1996 की संधि का नवीनीकरण नहीं होगा।
संभव है कि दोनों देश मौजूदा व्यवस्था में संशोधन करें, नई शर्तें जोड़ें या विस्तृत बातचीत के बाद नया समझौता तैयार करें। अंतिम तस्वीर दोनों देशों के बीच होने वाली वार्ता से ही साफ होगी।
मोदी सरकार के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को इस मामले में तीन स्तर पर संतुलन बनाना होगा।
पहला है बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के जल हित। राज्यों की मांगों को नजरअंदाज करके कोई दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तैयार करना राजनीतिक और व्यावहारिक रूप से मुश्किल होगा।
दूसरा है बांग्लादेश के साथ संबंध। भारत के लिए बांग्लादेश महत्वपूर्ण पड़ोसी है और सुरक्षा, व्यापार, संपर्क, ऊर्जा तथा पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी जैसे कई क्षेत्रों में दोनों देशों के हित जुड़े हुए हैं।
तीसरा पहलू नदी में वास्तविक जल उपलब्धता है। समझौता ऐसा होना चाहिए जो बदलती जल परिस्थितियों, घरेलू जरूरतों और दोनों देशों की आवश्यकताओं के बीच व्यावहारिक संतुलन स्थापित कर सके।
अब आगे क्या होगा?
मौजूदा संधि दिसंबर 2026 तक प्रभावी है। इसलिए अगले कुछ महीने भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। दोनों देशों के अधिकारियों के बीच बातचीत जारी रहने की संभावना है। भारत की ओर से बिहार और पश्चिम बंगाल समेत संबंधित पक्षों की चिंताओं को बातचीत में शामिल किया जा सकता है।
अंतिम निर्णय केंद्र सरकार को ही लेना है क्योंकि किसी दूसरे देश के साथ अंतरराष्ट्रीय संधि भारत सरकार के स्तर पर होती है। हालांकि राज्यों की राय राजनीतिक और व्यावहारिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होगी।
यही कारण है कि फिलहाल गेंद मोदी सरकार के पाले में दिखाई दे रही है। उसे एक तरफ बिहार और पश्चिम बंगाल के जल हितों को सुरक्षित करना है और दूसरी तरफ बांग्लादेश के साथ ऐसा रास्ता निकालना है जिससे द्विपक्षीय रिश्तों में नया तनाव पैदा न हो।
तारिक रहमान सरकार के लिए भी चुनौती कम नहीं है। उसे अपने देश में यह भरोसा दिलाना होगा कि गंगा के पानी को लेकर बांग्लादेश के हित सुरक्षित रहेंगे और साथ ही भारत के साथ बातचीत को टकराव की बजाय समझौते की दिशा में आगे बढ़ाना होगा।
इसलिए गंगा जल संधि का अगला अध्याय केवल पानी के बंटवारे की कहानी नहीं है। इसमें बिहार और पश्चिम बंगाल की घरेलू जरूरतें, भारत-बांग्लादेश कूटनीति और दोनों देशों के भविष्य के रिश्ते भी जुड़े हुए हैं। आने वाले महीनों में होने वाली बातचीत तय करेगी कि 30 साल पुरानी व्यवस्था नए स्वरूप में आगे बढ़ती है या गंगा के पानी के बंटवारे के लिए पूरी तरह नया फॉर्मूला तैयार किया जाता है।
Next Story





