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पत्रकारों पर कार्रवाई से नेपाल में हंगामा, प्रेस संगठनों ने बताया स्वतंत्रता पर प्रहार

nidhi
31 Oct 2026 9:33 AM IST
पत्रकारों पर कार्रवाई से नेपाल में हंगामा, प्रेस संगठनों ने बताया स्वतंत्रता पर प्रहार
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पत्रकारों की रिहाई के बाद भी जवाबदेही की मांग
काठमांडू: नेपाल की राजधानी काठमांडू में विभिन्न मीडिया संस्थानों के कार्यालयों में पुलिस के प्रवेश और तीन पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने से विवाद खड़ा हो गया है। शुक्रवार, 30 अक्टूबर को हुई कार्रवाई का पत्रकार संगठनों, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज ने विरोध किया। आलोचकों ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता तथा पत्रकारों की पेशेवर सुरक्षा पर हमला बताया। विरोध के बीच हिरासत में लिए गए पत्रकारों को शुक्रवार शाम पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया। हालांकि, कार्रवाई के कारण और उसके कानूनी आधार को लेकर सवाल बने हुए हैं।
प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल प्रेस के पत्रकार विश्वमणि सुवेदी, मोटिवेट न्यूज के संपादक शोभराज बराल और डीएनए खबर के प्रधान संपादक धीरज बस्नेत को पुलिस ने हिरासत में लिया था। इसके अलावा अन्य मीडिया संस्थानों में भी पत्रकारों की तलाश में पुलिस पहुंची। इस घटनाक्रम के बाद समाचार संस्थानों ने सवाल उठाया कि प्रकाशित खबरों से संबंधित शिकायतों के लिए उपलब्ध संस्थागत प्रक्रिया अपनाने के बजाय पुलिस को सीधे समाचार कक्षों तक क्यों भेजा गया। नेपाल प्रेस के पत्रकार सुवेदी को उनके कार्यालय से पूछताछ के लिए साइबर ब्यूरो ले जाया गया। दूसरी ओर, नया पत्रिका दैनिक के कार्यालय में पुलिस पत्रकार नवराज मैनाली की तलाश में पहुंची। अनामनगर स्थित दियो पोस्ट के कार्यालय में भी पुलिसकर्मियों ने प्रधान संपादक सुदीप विश्वकर्मा और समाचार संयोजक मदन ढुंगाना के बारे में पूछताछ की। वहां संबंधित पत्रकारों के नहीं मिलने पर टीम लौट गई। इसलिए सभी संस्थानों में पुलिस के पहुंचने को सभी संबंधित पत्रकारों की गिरफ्तारी के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा।
कार्रवाई का विरोध करने वाले पत्रकारों और प्रेस स्वतंत्रता के समर्थकों ने समाचार स्रोतों की गोपनीयता का मुद्दा भी उठाया। उनका आरोप है कि पत्रकारों को साथ ले जाकर खबरों के स्रोत जानने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्रवाई से स्वतंत्र रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर दबाव पड़ सकता है। रिपोर्टों में सरकारी और न्यायिक अधिकारियों से संबंधित प्रकाशित समाचारों की पृष्ठभूमि का उल्लेख है, लेकिन प्रत्येक पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई की वजह और औपचारिक आरोपों का स्पष्ट विवरण शुरुआती दौर में सार्वजनिक नहीं हुआ था। प्रेस काउंसिल नेपाल ने आपात बैठक के बाद पुलिस कार्रवाई पर आपत्ति जताई। काउंसिल ने कहा कि हिरासत के कारण, गिरफ्तारी वारंट और अदालत की अनुमति की स्थिति स्पष्ट नहीं की गई थी। उसने अधिकारियों से पत्रकारों की स्थिति तथा उन्हें रोकने का कानूनी आधार सार्वजनिक करने की मांग की। काउंसिल का कहना था कि यदि उन्हें हिरासत में रखने का वैध आधार नहीं है तो तत्काल रिहा किया जाना चाहिए। प्रकाशित सामग्री से जुड़ी शिकायतों का समाधान निर्धारित प्रक्रिया के तहत करने पर भी जोर दिया गया।
राजनीतिक स्तर पर भी कार्रवाई की आलोचना हुई। नेपाली कांग्रेस के महासचिव प्रदीप पौडेल ने पत्रकारों की रिहाई की मांग की। नेपाल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय प्रसाद मिश्र ने समाचार कक्षों में प्रवेश कर पत्रकारों को हिरासत में लेने के तरीके पर सवाल उठाए। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के प्रवक्ता जगदीश खरेल ने भी रिपोर्टिंग के कारण पत्रकारों को डराने या गिरफ्तार करने को प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया। इस तरह विरोध मीडिया संगठनों तक सीमित नहीं रहा और सार्वजनिक जवाबदेही का मुद्दा बन गया।
विवाद बढ़ने के बाद प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की ओर से पत्रकारों को तत्काल रिहा करने के निर्देश दिए गए। उनकी सलाहकार दीपा दाहाल के अनुसार, प्रधानमंत्री ने संबंधित अधिकारियों से समाचार कक्षों में प्रवेश करके पत्रकारों को गिरफ्तार या हिरासत में लेने से बचने को भी कहा। दाहाल ने दावा किया कि प्रधानमंत्री, उनके सचिवालय और प्रधानमंत्री कार्यालय को इस कार्रवाई की पूर्व जानकारी नहीं थी तथा इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी। उनके मुताबिक, घटना की जानकारी मिलते ही प्रधानमंत्री ने निर्देश जारी किए।
पुलिस का पक्ष पत्रकार संगठनों के आरोपों से अलग है। काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल पुलिस साइबर ब्यूरो के प्रवक्ता दीपक राज अवस्थी ने औपचारिक गिरफ्तारी से इनकार करते हुए कहा कि तीन लोगों को पूछताछ के लिए बुलाया गया था। वहीं, पत्रकार संगठनों ने कार्यालयों से पुलिस के साथ ले जाए जाने के तरीके पर आपत्ति जताई है। इस अंतर के कारण विवाद केवल पूछताछ तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे अंजाम देने की प्रक्रिया और पत्रकारों के अधिकारों से भी जुड़ा है। पत्रकारों की रिहाई से तत्काल राहत मिली है, लेकिन कार्रवाई की जिम्मेदारी तय करने की मांग समाप्त नहीं हुई है। प्रेस संगठनों ने स्पष्ट करने को कहा है कि पुलिस किस शिकायत और आदेश के आधार पर मीडिया कार्यालयों तक पहुंची थी। उनके लिए समाचार स्रोतों की सुरक्षा और बिना भय के काम करने का वातावरण केंद्रीय मुद्दे हैं। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री कार्यालय ने अपनी संलिप्तता से इनकार किया है। अब कार्रवाई के आधार और प्रक्रिया पर स्पष्ट आधिकारिक जवाब इस विवाद में आगे की स्थिति तय करेगा।
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