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तुर्किए का S-400 दांव: F-35 प्रोग्राम में वापसी की तैयारी

Saba Naaz
15 July 2026 4:34 PM IST
तुर्किए का S-400 दांव: F-35 प्रोग्राम में वापसी की तैयारी
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अंकारा: अंतरराष्ट्रीय रक्षा राजनीति और कूटनीति के गलियारों में इस समय एक बेहद चौंकाने वाली खबर चर्चा का विषय बनी हुई है। तुर्किए (तुर्की) अपने सबसे विवादित सैन्य सौदे यानी रूसी S-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम को किसी खाड़ी देश (Gulf Country) को बेचने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। अंकारा का यह संभावित कदम न केवल पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के हवाई सुरक्षा समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है, बल्कि अमेरिका के साथ उसके बिगड़े रिश्तों को सुधारने का एक बड़ा जरिया भी बन सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्किए इस मिसाइल डिफेंस सिस्टम से पीछा छुड़ाकर अमेरिका के सबसे अत्याधुनिक F-35 फाइटर जेट कार्यक्रम में अपनी वापसी की राह तलाश रहा है।

नाटो और अमेरिका के बीच 7 साल पुराना विवाद

तुर्किए का रूसी S-400 सिस्टम पिछले सात सालों से उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) और अमेरिका के बीच सबसे बड़े विवाद की वजह रहा है। अंकारा ने साल 2017 में रूस के साथ इस बेहद एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम को खरीदने का सौदा किया था, जिसकी डिलीवरी 2019 में हुई थी। चूंकि तुर्किए एक नाटो सदस्य देश है, इसलिए अमेरिका ने इस सौदे का कड़ा विरोध किया था। वाशिंगटन का तर्क था कि रूसी S-400 सिस्टम नाटो के सुरक्षा तंत्र के अनुकूल नहीं है और इसके जरिए रूस नाटो के अत्याधुनिक F-35 फाइटर जेट्स की गुप्त तकनीकी जानकारियां हासिल कर सकता है। इस एक फैसले की वजह से अमेरिका ने तुर्किए को F-35 ज्वाइंट स्ट्राइक फाइटर प्रोग्राम से बाहर का रास्ता दिखा दिया और उस पर कड़े सीएएटीएसए (CAATSA) प्रतिबंध भी लगा दिए।

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर रेस में सबसे आगे

लंबे समय से तुर्किए के सैन्य ठिकानों में बिना इस्तेमाल के पड़े इस S-400 सिस्टम को लेकर अब अटकलें सातवें आसमान पर पहुंच गई हैं। खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, तुर्किए इसे किसी तीसरे देश को बेचने के लिए बातचीत कर रहा है, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का नाम सबसे आगे चल रहा है। इसके अलावा कतर भी इस रेस में शामिल बताया जा रहा है।

यूएई के इस सौदे में दिलचस्पी दिखाने के पीछे का सबसे बड़ा कारण ईरान से बढ़ता क्षेत्रीय खतरा है। खाड़ी क्षेत्र में भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और यूएई अपनी हवाई सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए S-400 जैसी घातक प्रणाली को अपने बेड़े में शामिल करना चाहता है। यदि यह सौदा अमलीजामा पहनता है, तो खाड़ी देशों की रक्षा क्षमता में एक अभूतपूर्व इजाफा देखने को मिलेगा।

F-35 प्रोग्राम में वापसी की उम्मीद, लेकिन राह आसान नहीं

तुर्किए के लिए यह सौदा एक तीर से दो निशाने साधने जैसा है। S-400 को किसी अन्य देश को सौंपकर अंकारा अमेरिका को यह भरोसा दिलाना चाहता है कि वह अब रूसी तकनीक पर निर्भर नहीं है, जिससे उसके F-35 फाइटर जेट हासिल करने के बंद हो चुके दरवाजे फिर से खुल सकें। तुर्किए की वायुसेना को अपनी ताकत बढ़ाने के लिए इन फिफ्थ-जनरेशन विमानों की सख्त जरूरत है।

हालांकि, यह पूरी रणनीतिक चाल जितनी आसान दिखती है, उतनी है नहीं। इस सौदे के आड़े कई जटिल कानूनी और राजनीतिक अड़चनें हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि रूस ने जब तुर्किए को यह सिस्टम बेचा था, तो उसमें 'एंड-यूज़र सर्टिफिकेट' (End-User Certificate) की शर्त शामिल थी, जिसके तहत तुर्किए बिना रूस की लिखित अनुमति के इसे किसी तीसरे देश को नहीं बेच सकता। इसके अलावा, अमेरिका इस बात को लेकर भी सशंकित रहेगा कि क्या खाड़ी देशों में इस सिस्टम की मौजूदगी से उसके सैन्य हितों को कोई नुकसान पहुंचेगा या नहीं। अब देखना यह होगा कि अंकारा का यह S-400 दांव उसे F-35 दिला पाता है या अंतरराष्ट्रीय राजनीति के नए चक्रव्यूह में फंसा देता है।

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