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नाटो के लिए बड़ा सिरदर्द बना तुर्की, फैसले में डाल रहा अड़ंगा
Rounak Dey
1 July 2022 8:47 AM IST

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जब तक कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वादा नहीं किया कि रासमुसेन के डिप्टी के तौर पर किसी तुर्क को नियुक्त किया जाएगा।
अंकारा: नाटो ने मैड्रिड शिखर सम्मेलन के दौरान फिनलैंड और स्वीडन को गठबंधन में शामिल होने के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित कर दिया है। यह फैसला तुर्की के आपत्ति को हल करने के बाद लिया गया है। तुर्की ने आरोप लगाया था कि ये दोनों देश कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी को समर्थन देते हैं, जो उनके देश में आतंक और अलगाववाद को बढ़ावा दे रहा है। हालांकि, नाटो महासचिव जेन्स स्टोलटेनबर्ग की मध्यस्थता के बाद फिनलैंड और स्वीडन ने अपने कानूनों में संशोधन कर कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी को समर्थन बंद करने का भरोसा दिया है। जिसके बाद खुद फिनलैंड के राष्ट्रपति सौली निनिस्टो ने ऐलान किया कि तुर्की ने उनके देश और स्वीडन की सदस्यता का समर्थन किया है। इस कदम को रूस के लिए एक बड़ा झटका बताया जा रहा है।
फिनलैंड-स्वीडन के मामले में खुद की जीत बता रहे एर्दोगन
फिनलैंड और स्वीडन के साथ ही समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर को तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने अपनी जीत बताया है। उन्होंने खुद की पीठ थपथपाते हुए कहा कि नाटो एक सदस्य के रूप में तुर्की को खोने का जोखिम नहीं उठा सकता है। यही कारण है कि इन दोनों नॉर्डिक देशों को तुर्की के आगे झुकना पड़ा। लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की नाटो के लिए सिरदर्द बन गया है। हाल की भू-राजनीतिक घटनाओं ने दिखाया है कि तुर्की के नखरों को सहन करना नाटो की मजबूरी बन गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि एर्दोगन यह अच्छी तरह से जानते हैं और उन्होंने नाटो में अपने देश के स्थान का इस्तेमाल अपने राष्ट्रीय हितों को साधने के लिए किया है।
नाटो के लिए मजबूरी क्यों बना हुआ है तुर्की
यूक्रेन युद्ध के कारण नाटो और रूस दूसरे के जानी दुश्मन बन चुके हैं। इसके बावजूद तुर्की इस सैन्य गठबंधन का सदस्य होते हुए खुद को तटस्थ रखे हुए है। उसने खुद को प्रतिबंध लगाने वाले नाटो देशों से अलग करते हुए युद्धरत दोनों देशों में मध्यस्थता की भी कोशिश की। हालांकि उसे दोनों देशों के बीच कई दौर की बैठकों को आयोजित करने के बाद भी कोई सफलता हाथ नहीं लगी। तुर्की ने युद्ध में यूक्रेन का समर्थन किया है, लेकिन इस बात का ध्यान रखा है कि वह मास्को का विरोध न करे। विशेषज्ञों का कहना है कि तुर्की आज नाटो के लिए पहले से कहीं अधिक मूल्यवान है। यह देश नाटो गठबंधन में दक्षिण-पूर्वी हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है, जो रूस और पश्चिमी देशों के बीच एक बफर जोन है।
एर्दोगन के पहले सबकुछ था ठीक, अब ढूंढ रहा फायदा
नाटो गठबंधन में शामिल देशों में तुर्की के पास अमेरिका के बाद दूसरी सबसे बड़ी सेना है। राजनीतिक अस्थिरता के इतिहास रखने वाले तुर्की की सीमा मध्य पूर्वी देशों से भी मिलती है, जहां पश्चिमी देशों के प्रमुख हित निहित हैं। हालांकि अंकारा हमेशा से नाटो गठबंधन में कांटा नहीं रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नाटो के गठन के तीन साल बाद 1952 में तुर्की को सदस्यता मिल गई थी। तुर्की नाटो गठबंधन को अपनी रक्षा और सुरक्षा नीति की आधारशिला मानता है। विश्लेषकों और इतिहासकारों का कहना है कि तुर्की ने ऐतिहासिक रूप से नाटो के कई हितों की रक्षा की है, लेकिन यह एर्दोगन के शासन के तहत एक विघटनकारी ताकत बन गया है। एर्दोगन 2003 से 2014 तक प्रधानमंत्री और 2014 से लगातार राष्ट्रपति के रूप में पदस्थ हैं।
नाटो के कई मुद्दों पर अलग रुख अपना चुका है तुर्की
एर्दोगन ने सीरिया और लीबिया सहित कई मुद्दों पर नाटो सहयोगियों से असहमति जताई है। उन्होंने पड़ोस के संघर्ष से घिरे देशों से आने वाले शरणार्थियों के लिए यूरोप के दरवाजों को खोलने की धमकी देकर यूरोपीय यूनियन और नाटो से कई तरह की रियायतें पाई हैं। एर्दोगन को पता है कि तुर्की का रणनीतिक स्थान नाटो और दूसरे यूरोपीय देशों की कमजोर नस है, जिसे दबाने पर वह सहायता करने के लिए तुरंत मजबूर हो सकते हैं। 2009 में, तुर्की ने डेनमार्क के एंडर्स फोग रासमुसेन को नाटो के प्रमुख के रूप में नियुक्त करने का विरोध किया, जब तक कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वादा नहीं किया कि रासमुसेन के डिप्टी के तौर पर किसी तुर्क को नियुक्त किया जाएगा।
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